अव्यवस्था और उदासीनता के शिकार शौचालय

शौचालय
Image caption मुंबई के रेलवे स्टेशनों पर टूटे-फूटे और गंदे शौचालय प्रशासन के उदासीन रवैये को दिखाते हैं

थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ओआरएफ़) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ हर दिन 60 लाख से ज़्यादा लोग मुंबई की लोकल रेल से सफ़र करते हैं, लेकिन रेलवे स्टेशनों पर स्थित शौचालयों की स्थिति काफ़ी दयनीय है.

मुंबई की लोकल रेलवे जैसे इस शहर की रफ़्तार की परिचायक है, लेकिन इन शौचालयों को देखकर लगता है कि यहां की रेलवे व्यवस्था में अव्यवस्था, गंदगी और उदासीनता का राज है.

लाखों लोगों के लिए हैं सिर्फ़ 355 टॉयलट सीटें और 673 पेशाबघर जो कि नाकाफ़ी हैं. जो शौचालय हैं भी उनमें से कई गंदे हैं और कुछ बंद.

रिपोर्ट के मुताबिक़ लोकल ट्रेनों पर पड़ रहे बोझ को देखते हुए स्टेशनों पर कम से कम 12 हज़ार छह सौ टॉयलट सीटों की व्यवस्था होनी चाहिए, यानि कमी 12 हज़ार से ज़्यादा की है.

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन की इस रिपोर्ट को तैयार करने वाली वर्षा राज कहती हैं, "वर्ष 2008-2009 में नए शौचालयों को बनाने का केंद्रीय रेलवे का वार्षिक बजट 14 लाख रुपए था, लेकिन एक ग़ैर-सरकारी संस्था के मुताबिक़ एक शौचालय बनाने में क़रीब 12 लाख रुपए का ख़र्च आता है. इसका मतलब साफ़ है कि हर साल सिर्फ़ एक शौचालय बनेगा और अधिकारी नए शौचालयों को बनाने को लेकर गंभीर नहीं हैं."

उदासीनता

रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष 2006-07 में पश्चिमी रेलवे ट्रेन नेटवर्क पर लोगों की सुविधाओं के लिए क़रीब डेढ़ करोड़ की पूंजी लगी, लेकिन इसमें से एक रुपए सफ़ाई सुधारने के लिए आवंटित नहीं किए गए थे.

रिपोर्ट के मुताबिक़ रेलवे स्टेशनों पर गंदे शौचालयों के होने का एक बड़ा कारण है-आस पास झोपड़पट्टियों में रह रहे लोगों का इन शौचालयों को इस्तेमाल करना. दरअसल, शौचालयों की कमी का मुद्दा सिर्फ़ मुंबई के रेलवे स्टेशनों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ये मुंबई के लाखों लोगों के लिए परेशानी का सबब है.

बहरहाल, बात करें रेलवे स्टेशनों पर स्थित शौचालयों की तो सबसे ज़्यादा परेशानी महिलाओं को होती हैं. कई महिलाओं ने हमें बताया कि वो इन शौचालयों का प्रयोग नहीं करती हैं, और अपने दफ़्तर या फिर किसी रिश्तेदार के घर पहुँचने का इंतज़ार करती हैं.

बीमारी

पेशे से डॉक्टर कामाक्षी भाटे के मुताबिक़ ये बाद में चलकर महिलाओं के लिए और बड़ी समस्याओं को जन्म दे सकती हैं.

वो कहती हैं, "बहुत देर तक शौचालय नहीं जाने से युरीनरी ट्रैक्ट इन्फ़ेक्शन हो जाता है. किसी भी इन्फ़ेक्शन के बार-बार होने से एनिमिया या किडनी स्टोन की संभावना भी बढ़ जाती है."

हमने जब रेलवे अधिकारियों से उनका पक्ष जानना चाहा और उनसे बात करनी चाही, चाहे वो पश्चिमी रेलवे के डिविज़नल रेलवे मैनेजर गिरीश पिल्लई हों, या फिर केंद्रीय रेलवे के मुंबई डिवीज़न के डिवीज़नल रेलवे मैनेजर एमसी चौहान, उन्होंने बात करने के वायदे तो किए, लेकिन बात नहीं की.

वर्षा राज कहती हैं, "लोगों को गंदे शौचालयों की इतनी आदत हो गई है कि वो इस बारे में अब सोचते भी नहीं. उन्हें पता है कि अधिकारी कुछ करेंगे भी नहीं तो इसलिए उन्होंने अपने हक़ की बात करनी भी बंद कर दी है."

रिपोर्ट के मुताबिक़ वीटी, चर्चगेट, दादर, कुर्ला, बांद्रा, ठाणें, कल्याण जैसे बड़े स्टेशनों में भी शौचालयों की हालत ख़स्ता है, हालांकि नवी मुंबई में स्थिति थोड़ी बेहतर है.

रिपोर्ट में भविष्य के लिए पब्लिक प्राइवेट मॉडल पर ज़ोर दिया गया है जिसके मुताबिक़ सरकार शौचालय के लिए ज़मीन मुहैया करे और निजी क्षेत्र की ज़िम्मेदारी इन शौचालयों को चलाने और देखभाल की हो.

स्थिति में सुधार

पश्चिमी रेलवे उपनगरीय नेटवर्क की ओर से दिए गए जवाब के मुताबिक़ उन्होंने शौचालयों की स्थिति सुधारने के लिए क़दम उठाए हैं.

जवाब के मुताबिक़,"जिन स्टेशनों पर यात्रियों की संख्या ज़्यादा है, वहाँ डीलक्स शौचालयों का फ़ैसला किया गया है. ऐसे शौचालय बांद्रा टर्मिनस, अंधेरी स्टेशनों पर पहले ही चल रहे हैं, और दादर, बोरिवली, भयंदर, वसई और विरार स्टेशनों पर भी ऐसे ही शौचालयों को बनाने पर विचार चल रहा है. कई शौचालयों की मरम्मत का काम चरणों में किया जा रहा है. इसकी शुरुआत रेलवे बजट में आदर्श स्टेशनों के लिए नामांकित किए गए स्टेशनों से होगा."

जवाब के मुताबिक़, "इनमें से कुछ को मरम्मत की वजह से और कुछ को पानी की कमी की वजह से बंद रखना पड़ा है. कुछ स्थानों पर सुरक्षा या फिर शौचालयों के दुरुपयोग की वजह से उन्हें बंद रखना है."

पश्चिमी रेलवे का कहना है कि उनकी लाईन पर महिलाओं के लिए 75 शौचालय हैं.

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