47 साल बाद मां से मुलाकात

मां के साथ तंबी
Image caption 47 साल बाद पहली बार तंबी अपनी मां से मिले.

असल जिंदगी की कहानी पर तो अक्सर फ़िल्में बनती हैं लेकिन फ़िल्मी सी लगने वाली कोई कहानी अगर जिंदगी में सच हो जाए तो क्या अनुभव होगा.

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहने वाले 50 वर्षीय राजेंद्र कुमार अय्यर ऊर्फ तंबी की जिंदगी किसी पटकथा से कम नहीं. 47 साल पुरानी एक धुंधली सी याद ने उन्हें किस तरह अपनों से जोड़ा, ‘तंबी’ की इस कहानी को खुद उनकी ज़ुबानी हम आप तक पहुंचा रहे हैं.

इस कहानी में अब तक आपने पढ़ा कि तीन साल की उम्र में तंबी के माता-पिता के बीच झगड़ा हुआ, और पिता उन्हें लेकर घर से निकल पड़े. 47 साल बाद तंबी ने अपनी मां के गांव का पता लगाया और उन्हें ढूंढने निकल पड़े. क्या तंबी अपनी मां से मिल पाए? जानने के लिए पढ़िए इस आपबीती की अंतिम कड़ी...

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मां के गांव से निराश होकर लौटने के कोई डेढ़ साल बाद की बात है. एक दिन शाम के वक्त जब होटल में ग्राहकों की संख्या बहुत थी, मेरे सेलफोन की घंटी बजी. सामने वाले ने जानना चाहा कि क्या मैं राजेंद्र कुमार बोल रहा हूं. मैंने रांग नंबर कह कर फोन काट दिया. थोड़ी देर बाद फिर फोन आया- “आप कौन बोल रहे हैं ?”

मैंने विनम्रता से जवाब दिया- ‘तंबी’, क्योंकि मैं तो तंबी के नाम से ही जाना जाता था.

सामने वाले ने फिर कुछ जानना चाहा लेकिन फोन कट गया. घंटे-दो घंटे बाद एक महिला का फोन आया- “मैं पठानकोट से आपकी छोटी बहन बोल रही हूं.” महिला ने लगभग रोते हुये कहा- “भैया, मैं आपसे मिली नहीं हूं. मां ने आज आपके बारे में बताया कि आप तोंडंगकूर्ची गये थे.”

अब मेरे चौंकने की बारी थी. मैं हड़बड़ा गया था. पल भर में ही मैं सब कुछ समझ गया. मैंने कहा- “मेरी मां से बात कराओ.”

फोन पर एक दूसरी महिला ने जब हैलो कहा तो मैंने रोते हुए पूछा- “अम्मा, एंगा इरिकर ? ” (कहां हो मां?)

उधर से भी रोने की आवाज़ आने लगी- “एंगे-एंगे तेड़ना” (कहां-कहां तुम्हें खोजा).

हम दोनों बहुत देर तक रोते रहे.

उस शाम मैं बहुत देर तक अपनी मां से बतियाता रहा.

Image caption पठानकोट में अपनी बहनों के साथ तंबी.

पता चला कि पिता जी से झगड़े के बाद वे मायके लौट गई थीं. जब पिताजी साल भर तक नहीं लौटे तो उन्होंने कन्नन स्वामी नामक आदमी से शादी कर ली. इसके बाद वे अपने पति के साथ पठानकोट बस गई थीं.

पाली गांव में मामा-मामी को डर था कि 50 सालों बाद फिर से पहले बेटे के पहुंचने से उम्र के इस आखरी पड़ाव में उनके परिवार में कोई कलह की स्थिति न बन जाए. लेकिन जब कन्नन स्वामी और उनकी पांच बेटियों और इकलौते बेटे को पता चला तो वे अपने इस भाई से मिलने के लिए बेताब हो गए.

मैं जल्दी से जल्दी अपनी मां से मिलने के लिए पठानकोट पहुंचना चाह रहा था. लेकिन यह सब कुछ इतना आसान नहीं था. पहले तो मेरी बेटी बीमार पड़ी और उसके बाद फिर पत्नी. मेरी कुल जमा पूंजी खत्म हो गई. हालत ये थी कि मेरे लिए घर चलाना मुश्किल हो गया था.

उधर मां और मेरे भाई-बहनों का फोन हर रोज आने लगा- “कब आ रहे हो’’.

मैं संकोच में किसी से कुछ कह नहीं पा रहा था. दिन-हफ्ते और महीने गुजरते रहे. एक दिन मुझे जानने वाले कुछ पत्रकारों को मैंने जब अपना किस्सा बताया तो उन्होंने उसी दिन मेरे लिये पैसे इकट्ठे किए और अगले दिन मैं ट्रेन में सवार हो कर पठानकोट के पास चक्की बैंक के लिये रवाना हो गया.

मैं अपनी मां और परिवार वालों से संपर्क में तो था ही. जब मैं चक्की बैंक स्टेशन पहुंचा तो दो नौजवान लड़कों ने आ कर मेरे पैर छुए. एक मेरा भतीजा था, दूसरा भांजा. मैंने पूछा कि मुझे पहचाना कैसे ? भांजे ने कहा- “आपकी शक्ल तो एकदम नानी से मिलती है.”

मैं क्या कहता. मुझे तो अपनी मां की शक्ल भी याद नहीं थी.

Image caption अपने नए पिता के साथ तंबी.

स्टेशन पर मेरी बहन भी आई थी. हम सब मिल कर वहां रोते रहे.

घर पहुंच कर मैंने आवाज़ लगाई- अम्मा?

आंखों पर चश्मा लगाये एक वृद्ध महिला बाहर निकली. वह मेरी मां थी. 47 बाद उनके सामने मैं खड़ा था. कहां 3 साल का छोटा बच्चा और कहां 50-51 साल का एक प्रौढ़ आदमी. फिर तो घंटों हम दोनों के बीच केवल आंसुओं में ही बात हुई. मैं कभी उन्हें चुप कराता और कभी वो मुझे. फिर हम दोनों रोने लगते. 47 साल की दूरी धीरे-धीरे आंसुओं में घुलती और धुलती रही.

मेरे नये पिता, हमारी पांच बहने, एक भाई, उनके बेटे-बेटियां, सब मिल कर कई दिनों खाते-पीते और बतियाते रहे और अपना दुख-सुख साझा करते रहे. उनके साथ रहते हुए लगा ही नहीं कि मैं अपने सगे भाई-बहनों के साथ नहीं हूं, और मां तो मां ही थी.

मैं 9-10 दिन तक उनके साथ रहा लेकिन जिन दुखों के साथ मैंने अपनी उम्र के 47 साल निकाले थे, उससे कहीं अधिक दुखी करने वाला समय था अपनी मां से विदा लेने का. एक बार फिर आंसुओं का सिलसिला शुरु हुआ.

मैंने मां से विदा ली. भाई-बहनों से फिर मिलने का वादा किया और अपने को दिलासा देते हुए बिलासपुर लौट आया.

इन दिनों अपनी मां और भाई-बहनों से बात होती रहती है. सोचता हूं, अगली बार जब भी थोड़े पैसे इकट्ठे होंगे, अपनी पत्नी और दोनों बेटियों के साथ मां से मिलने जाउंगा.

(हमारी ये कोशिश आपको कैसी लगी. क्या आप तंबी से कुछ कहना चाहेंगे? हम पहुंचाएंगे आपकी बात तंबी तक. हमें लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर.)

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