नालंदा को पुनर्जीवित करने की कोशिश

अमर्त्य सेन
Image caption अमर्त्य सेन ने चीन से सहयोग की उम्मीद जताई है

बौद्ध दर्शन का गढ़ और कभी दुनिया में ज्ञान-विज्ञान के सबसे बड़े केन्द्र रहे नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने का प्रयास जोरशोर से चल रहा है.

पंद्रह सौ साल पहले स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय को पुर्नजीवित करने के लिये नालंदा संरक्षक समूह का गठन किया गया था. अब इस समूह की कोशिशें ठोस रुप लेने लगीं हैं.

इस समूह के अध्यक्ष, नोबल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर अमर्त्य सेन का कहना है, ''हम तीन साल से इस मुद्दे पर विचार विमर्श कर रहे हैं और अब हम अंतिम निर्णय लेने की स्थिति में हैं कि विश्वविद्यालय में विभाग कौन-कौन से हों और राजगीर के पास जहाँ पुराना विश्वविद्यालय था, उसे स्थापित किया जाएगा.''

इस विश्वविद्यालय में ऐसी कई विशेषताएँ होंगी जिससे कि यहां दुनिया भर से छात्र पढ़ने आएंगे.

सेन ने बिहार सरकार की प्रशंसा करते हुए कहा कि राज्य सरकार इस मामले में सक्रिय भूमिका निभा रही है और उसने इसके लिये ज़मीन अधिग्रहण भी कर लिया है.

साथ ही उनका कहना था कि नालंदा के पुस्तकालय को भी पुनर्जीवित किया जाएगा.

इस समूह में शामिल सिंगापुर के विदेश मंत्री जॉर्ज यो का कहना है कि ये एक ऐसी परियोजना है जिसकी गूँज पूरे क्षेत्र में सुनाई दे रही है.

पिछले साल हुए पूर्वी एशियाई देशों की शिखर बैठक में देशों ने भारत की इस पहल का स्वागत किया था.

उनका कहना है, ''एशिया में जो भी इस परियोजना के बारे में सुनता है उसकी दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं. एक बार जब इसकी रुपरेखा तैयार हो जाएगी तो उस नए एशिया में हमारा भी योगदान होगा जो अभी बन रहा है.''

चीन की भागीदारी

इस समूह का गठन केंद्र सरकार ने जून 2007 में किया था. ये उम्मीद की जा रही है कि नालंदा विश्वविद्यालय को स्थापित करने के लिए सरकार इसी सत्र में बिल लाएगी.

समूह की कोशिशों में विश्वविद्यालय के लिये धन इकट्ठा करना भी है.

समूह पूरी दुनिया आर्थिक सहयोग की अपेक्षा कर रहा है बशर्ते कि वो काला धन न हो.

अमर्त्य सेनका कहना था कि इस संदर्भ में चीन की भूमिका अहम है.चीन पूर्वी एशियाई देशों के सम्मेलन का सदस्य भी है और इस तरह से इस विश्वविद्यालय का संस्थापक सदस्य भी है. उन्होंने कहा, "चीन से हम सहयोग की उम्मीद करते हैं."

नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ गोपा सबरवाल को बनाया गया है.

उनका कहना है कि ये बहुत ही रोचक होने के साथ साथ बेहद जिम्मेदारी भरा काम है.

उन्होंने कहा, ''मेरा प्राथमिक काम नालदा मैंटर समूह ने जो रुपरेखा सोची है उसे सच्चाई में तब्दील करना है. साथ ही ये मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मैं इन प्रतिभावान लोगों के मार्गदर्शन पर काम करुंगीं.''

ऐतिहासिक

भारत के मानचित्र पर बिहार के नालंदा ज़िले का अलग से स्थान रहा है.

पांचवीं सदी से बारहवीं सदी तक पूरी दुनिया में नालंदा विश्वविद्यालय शिक्षा का गढ़ माना जाता था.

इस विश्वविद्यालय में दुनिया भर से आए दस हज़ार छात्र पढ़ते थे और 1500 शिक्षक हुआ करते थे.

बिहार के नालंदा ज़िले के पास राजगीर शहर में नालदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के गठन के लिए कई बैठकें हो चुकी हैं. इसकी पहली बैठक 2007 में हुई थी.

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने बिहार का दौरा किया था तब उन्होंने इस विश्वविद्यालय को पुर्नस्थापित करने का प्रस्ताव दिया था इसके बाद समूह का गठन किया गया.

प्रस्तावित विश्वविद्यालय में बौद्ध अध्ययन, दर्शन शास्त्र और धर्म, इतिहास, अंतरराष्ट्रीय संबंध एवं शांति, प्रबंधन, भाषा, साहित्य और पर्यावरण जैसे विषयों के स्कूल होंगे.

बिहार सरकार ने राजगीर में इस विश्वविद्यालय के लिए 500 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया है.

जिस जगह भूमि अधिग्रहण किया गया है, कभी ऐतिहासिक नालंदा विश्वविद्यालय वहीं हुआ करता था.

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