रसोइयों को लेकर जातीय विद्वेष उभरा

कन्नौज
Image caption गांव के लोगों ने एक महीने से इस स्कूल का बहिष्कार कर रखा है

कन्नौज जी टी रोड पर स्थित छिबरामऊ से कुछ दूरी पर है सौरिख. बहादुरपुर मझिगवां सौरिख से कुछ ही दूर पक्की सड़क के किनारे बसा है.

गाँव में घुसते ही सबसे पहले सरकारी मिडिल स्कूल पडता है. अच्छी पक्की बिल्डिंग है, अध्यापक भी हैं. मगर स्कूल में छात्र-छात्राएं नहीं हैं. पूरे गाँव ने करीब एक महीने से स्कूल का बहिष्कार कर रखा है.

स्कूल में हुए उपद्रव को लेकर पुलिस ने बलवा, तोड़फोड़, अनुसूचित जाति उत्पीड़न अधिनियम और नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम में मुक़दमे कायम करके कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया है.

इसलिए गाँव के बाकी लोग पुलिस के डर से फरार हैं. गाँव की गलियों में सन्नाटा पसरा है.

दलित बस्ती में रहने वाली शांति देवी वाल्मीकि को अभी तक नहीं पता कि स्कूल में झाड़ू लगाते-लगाते आखिर अचानक वह अपने ही गाँव में अशांति का कारण कैसे बन गयी?

स्कूल के अध्यापकों ने उन्हें बच्चों के लिए खाना पकाने के लिए कहा था.

डरी सहमी शांति ने मामला कुछ इस तरह बयान किया, "हमने सबके हाथ जोरे कही कि हम खाना न खवैये. जो अधिकारी रहें वो कहे कि मुझे खिलाओ. तो उनको हमने खिलाय दई. चाहे इसमें गलती हमार होय. चाहे कुछ और."

गांव में नाराजगी

गांव के लोगों ने बताया कि ग्राम प्रधान और हेडमास्टर ने औपचारिकताएं पूरी किए बिना ही मेहतरानी शांति को चुपचाप रसोइया बना दिया.

इससे गाँव में सबको नाराजगी थी और फिर बड़े अधिकारियों ने उससे जबरदस्ती खाना खिलवा दिया, जिससे सारा बवाल हो गया.

गौरतलब बात यह है कि इन दिनों सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर छात्र गरीब, पिछड़े और दलित समुदाय के होते हैं. लेकिन शांति के मोहल्ले में रहने वाले कठेरिया, धोबी एवं अन्य दलित जाति के बच्चों ने भी खाने का बहिष्कार किया और वे अब भी स्कूल जाने को तैयार नहीं.

बच्चे तो बच्चे हैं, मगर उनके माँ बाप भी छुआछूत छोड़ने को तैयार नहीं हैं. यह मसला केवल तथाकथित ऊँची और नीची जातियों के बीच सीमित नहीं है. बल्कि अनुसूचित जातियों में भी लोग आपस में छुआछूत मानते हैं.

शांति के पड़ोस में रहने वाले धोबी और कठेरिया परिवारों के लोगों ने कहा कि वे मेहतर का बनाया खाना नहीं खा सकते. ऐसा करने से उनके बच्चों के शादी ब्याह भी नहीं हो पाएंगे.

मिड डे मील में छुआछूत का यह विवाद तुरंत आसपास के गाँवों और ज़िलों में फैल गया.

सामाजिक बहिष्कार

Image caption शांति से बच्चों के लिए खाना पकाने के लिए कहा गया था

बहादुरपुर मझिगवां स्कूल के हेडमास्टर बाबू सिंह कुशवाहा के गाँव हरिभानपुर में उनके ही स्वजातीय ठाकुर बिरादरी के लोगों ने उनका सामाजिक बहिष्कार शुरू कर दिया.

हरिभानपुर में जाटव लोगों का भी कहना था कि दलित जातियां आपस में छुआछूत मानती हैं. कन्नौज में प्रशासन का कोई भी अधिकारी मिड डे मील में दलित रसोइयों के इस विवाद पर बात करने के लिए उपलब्ध नहीं हुआ.

लखनऊ में मिड डे मील प्राधिकरण के संयुक्त निदेशक संतोष कुमार राय इस बवाल के लिए असामाजिक तत्वों को जिम्मेदार बताते हैं.

उनका कहना है, "बच्चों के मस्तिष्क में इस तरह की कोई बात नहीं होती. लेकिन जो हमारा सामाजिक ढांचा है उसमें कहीं कहीं कुछ लोग अराजक तत्व के रूप में होते हैं, जो इस तरह की चीजें बनाने की कोशिश करते हैं. ऐसे ही तीन चार अवांछित तत्व थे जिन्होंने इस तरह की हरकत की. उनके खिलाफ एफ आई आर भी दर्ज़ की गई है."

कन्नौज के बाद कानपुर देहात, एटा, औरैया, सोनभद्र, लखनऊ और दूसरे ज़िलों में भी जब मिड डे मील पकाने में दलित रसोइयों का विरोध होने लगा तो मायावती सरकार ने घबराकर अपने उस आदेश को संशोधित कर दिया जिसमें रसोइयों की नियुक्ति में आरक्षण का रोस्टर लागू करने और पहला रसोइया अनिवार्य रूप से दलित समुदाय से रखने की बात कही गयी थी.

सरकार के इस कदम से मिड डे मील का उग्र विरोध थम गया. तमाम विद्यालयों से दलित रसोइयों को हटा दिया गया, उनको झाड़ू पोंछे के काम में लगा दिया गया या कहा गया कि वह घर बैठे अपना वेतन ले लें, स्कूल में न दिखें.

लेकिन अभी भी छिटपुट विरोध और तनाव की ख़बरें आ रही हैं. कई जगह पिछड़े बनाम अगड़े के विवाद भी हो रहे हैं.

दलितों ने की प्रतिक्रिया

Image caption सामाजिक कार्यकर्ता एस आर दारापुरी मायावती सरकार के फ़ैसले को राजनीतिक मानते हैं

लेकिन रसोइयों की नियुक्ति में आरक्षण रोस्टर समाप्त करने की दलित समाज में तीखी प्रतिक्रिया हुई है.

अम्बेडकर महासभा द्वारा बुलाई गयी एक सभा में इसे देश के क़ानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन बताया गया.

दलित सामाजिक कार्यकर्ता एस आर दारापुरी उत्तर प्रदेश सरकार के अपने आदेश वापस लेने को दलित हित विरोधी मानते हैं. दारापुरी का कहना है, "इससे छुआछूत और दलित उत्पीड़न को और बढ़ावा मिलेगा जिसके लिए सरकार जिम्मेदार होगी. सिर्फ वोटों की खातिर यह आदेश वापस लिया गया."

उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष श्रीराम अरुण को इस बात का अफ़सोस है कि सामाजिक अथवा राजनीतिक संगठनों ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर कोई सक्रियता नहीं दिखाई. अरुण का कहना है कि यह एक बड़ी सामाजिक बुराई है और इसलिए इस पर चौतरफा कार्यवाही होनी चाहिए.

मायावती सरकार ने अभी तक इन तमाम आलोचनाओं का जवाब नहीं दिया है.

मिड डे मील योजना लागू करने के पीछे एक मक़सद यह भी था कि इससे सामाजिक समरसता की भावना बढ़ेगी. लेकिन रसोइयों की नियुक्ति में आरक्षण पर हुए विवाद से गांवों में सदियों से चली आ रही ऊंच नीच की भावनाएं उभरकर और सामने आ गयी हैं.

अम्बेडकर महासभा के अध्यक्ष लालजी प्रसाद निर्मल इसे नस्लभेद से भी खराब कह रहे हैं. लेकिन कोई संस्था या व्यक्ति सामाजिक धरातल पर इसके खिलाफ संघर्ष करता दिखाई नहीं देता.

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