कश्मीरी इंतिफ़ादाः कौन ज़िम्मेदार?

कश्मीरी युवक
Image caption कश्मीरी युवाओं में आक्रोश साफ़ देखा जा सकता है

भले ही उनकी आवाज़ सुनी जा रही हो या नहीं, भारत प्रशासित कश्मीर की जनता पिछले दो महीने से लगातार एक ही बात दोहरा रही है-वह यथास्थिति से ऊब चुकी है.

कश्मीर घाटी में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर बीस साल पहले बंदूक़ों का साया पड़ने के बाद से--चाहे वे बंदूक़धारी कश्मीरी हों या विदेशी--लोग फिर सड़क पर उतर आए हैं.

और इसकी वजह भी है.

ग्यारह जून को ट्यूशन पढ़ कर घर लौट रहे श्रीनगर के एक किशोर तुफ़ैल अहमद मट्टू की आँसूगैस के गोले से मौत हो जाने के बाद पुलिस की छिटपुट गोलीबारी से अबतक लगभग 50 लोग मारे जा चुके हैं. इनमें से अधिकतर छात्र थे.

मट्टू जो 29 जून को अपनी 18वीं वर्षगांठ मनाने के लिए जीवित नहीं बचा, उन युवाओं का प्रतीक है जो पिछले दो महीनों में श्रीनगर और कश्मीर के अन्य इलाक़ों में भारतीय पुलिस की गोलियों का निशाना बने हैं.

हिम्मत का सुबूत

हमने पिछले कुछ समय में विरोध प्रदर्शनों, मौतों, दफ़नाने के समय हिंसा और फिर और मौतों का एक लंबा सिलसिला देखा है. यही नहीं, भारत प्रशासित कश्मीर भर में आम लोगों ने चाहे वे बच्चे हों, महिलाएँ या पुरुष, केंद्रीय पुलिस बलों को आक्रोश का सामना करने में जीवट का सुबूत दिया है.

इनकी समस्या क्या है?

नंवबर-दिसंबर, 2008 के चुनाव के बाद, जहाँ भारतीय कश्मीर में 60 प्रतिशत मतदान देखा गया, आधुनिक कश्मीर के संस्थापक शेख़ अब्दुल्लाह के पोते उमर अब्दुल्लाह के नेतृत्व में एक लोकप्रिय सरकार ने सत्ता संभाली.

उस समय केंद्र को लगा कि कश्मीरी अब पूरी तरह भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा बन चुके हैं.

इन चुनावों से ठीक पहले अमरनाथ धाम की भूमि के अधिग्रहण को लेकर विरोध हो चुका था, और फिर मई, 2009 में घाटी इन आरोपों से गूँज उठी कि शोंपियाँ में दो महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और फिर उनकी हत्या कर दी गई.

रमज़ान का महीना शुरू होने वाला है. इस बात के आसार हैं कि उन दिनों कश्मीर में जारी विरोध प्रदर्शनों में कुछ सुस्ती आए. लेकिन भारत सरकार को जो संदेश गया है वह बहुत सीधा-सपाट है. किसी व्यक्ति या पार्टी के पक्ष में गया वोट भारत सरकार के लिए किया गया मतदान नहीं है.

भारत प्रशासित कश्मीर के एक पूर्व मुख्य सचिव वजाहत हबीबुल्लाह ने बीबीसी से कहा, "हम जो देख रहे हैं वह है अंसतोष का एक बढ़ता हुआ तूफ़ान जो बग़ावत में तब्दील हो सकता है. इससे यह पता चलता है कि कश्मीरी नेताओं का वहाँ की जनता के साथ जुड़ाव टूट चुका है".

यथास्थिति बनी हुई है

दिल्ली में काम कर रहे एक युवा कश्मीरी पत्रकार सरवर काशानी का मानना है कि जब 1989 के अंत में घाटी के लोगों ने भारतीय चुनावों का बहिष्कार किया था, उस समय उनकी जो भावनाएँ थीं वे वहीं थीं जो आज हैं. काशानी ने मुझसे कहा, "यथास्थिति से इंकार आज भी बरक़रार है".

बीस वर्ष तक भारत चरमपंथियों से निपटने में जूझता रहा, अब उसे जनता का सामना करना है. बिना किसी स्पष्ट नेतृत्व का यह हुजूम, जो बात उमर अब्दुल्ला भी स्वीकार करते हैं, आसानी से क़ाबू में आने वाला नहीं है.

Image caption कश्मीरियों ने कई बार शक की उंगली पुलिस की ओर उठाई

इन बीस साल में कई प्रधानमंत्रियों और नेताओं ने कश्मीर की जनता को विभिन्न मात्राओं में स्वायत्तता दिलाने के वायदे किए. 2006 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कश्मीरियों की समस्याओं से निपटने के लिए पाँच अलग-अलग समितियाँ बनाईं.

लेकिन इस सबका कोई नतीजा नहीं निकला. कश्मीरी नेताओं से बातचीत बंद है, पाकिस्तान के साथ शांति प्रक्रिया खटाई में है.

कश्मीर टाइम्स अख़बार की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन ने मुझे बताया, "कश्मीर की जनता को स्वायत्तता दिलाने के मामले में कुछ भी तो नहीं हुआ है. यह सब ठंडे बस्ते में बंद है. भारत सरकार इस मामले में गंभीर ही नहीं है".

काशानी का तर्क है कि कश्मीरियों की नई पीढ़ी जो कर्फ़्यू और धरपकड़ के माहौल में पली-बढ़ी, उसके लिए भारत की पहचान केवल ख़ाकी वर्दी और बंकर ही हैं. यही वह पीढ़ी है जो भारतीय सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर बरसा रही है.

श्रीनगर स्थित एक विश्लेषक रऊफ़ रसूल इस धारणा को अस्वीकार करते हैं कि प्रदर्शनों के लिए प्रेरणा नियंत्रण रेखा के पार से यानी पाकिस्तान से मिल रही है. वह कहते हैं कि इन प्रदर्शनों पर असर डाल रहे हैं वे तत्व जिनका सरकार से कोई लेनादेना नहीं है.

रसूल कहते हैं, "भारत सरकार अंगारों का सामना कर रही है. उसे अंगारों पर ख़ुद हाथ डालने के बजाय कश्मीर के अलगाववादी नेताओं जैसे हथियारों का इस्तेमाल करना चाहिए".

Image caption कश्मीरी सुरक्षाबलों से लोगों की नारज़गी बनी हुई है

कश्मीर में 90 के दशक में चरमपंथ की समस्या से जूझ चुके पूर्व पुलिस अधिकारी ईएन राम मोहन ने बीबीसी से कहा का स्थिति से निबटना मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह के बस की बात नहीं है.

उनका कहना है, "राज्य सशस्त्र पुलिस बल की वे बीस से अधिक बटालियन कहाँ हैं? हमने तो उन्हें सड़कों पर नहीं देखा. हमें तो सिर्फ़ केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल ही नज़र आ रहा है".

नाम नहीं बताने की शर्त पर एक भारतीय खुफ़िया अधिकारी ने कहा, "अगर आप पथराव करती भीड़ पर गोली चलाएँगे तो इसका मतलब आप आफ़त को बुलावा दे रहे हैं".

भारत सरकार सौभाग्यशाली है कि कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय फ़ोकस लगभग नहीं के बराबर है. कुछ साल पहले यह एक बड़ा मुद्दा होताः ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने हाल की अपनी भारत यात्रा के दौरान 'क' (कश्मीर) अक्षर का इस्तेमाल नहीं किया बल्कि 'प' (पाकिस्तान) चुना.

मायने बदले

नब्बे के दशक में पश्चिमी देश संपूर्ण जम्मू-कश्मीर के विवादित क्षेत्र की मिसाल इस्तेमाल करते थे, लेकिन 9/11 के बाद की दुनिया में चरमपंथ के मायने बदल चुके हैं.

एक समय में कश्मीरी हितों का हिमायती, पाकिस्तान जिसकी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने 1990 के दशक में चरमपंथी गुटों को बढ़ावा दिया, बहुत हद तक अपनी अंतरराष्ट्रीय साख खो चुका है.

संक्षेप में कहा जाए तो, अब दुनिया को कश्मीर या कश्मीरियों में कोई दिलचस्पी नहीं है.

भारतीय अर्थव्यवस्था में विस्तार एक अन्य कारण है जिसकी वजह से दुनिया के देश भारत को रुष्ट नहीं करना चाहते हैं. अपनी संवेदनशीलता के लिए जाने जाने वाला भारतीय अधिकारीवर्ग बहुत जल्दी बुरा मान जाता है. शायद यही वजह है कि पश्चिमी अधिकारी कश्मीर मामले पर भारत के रुख़ को अनुकूल मानते नज़र आ रहे हैं.

अंत में, भारत की कश्मीर नीति कैसी हो इसकी ज़िम्मेदारी इस बात पर न हो कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसे कैसे ( या कैसे नहीं ) देख रहा है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को समझना चाहिए कि पत्थर का मुक़ाबला गोली से नहीं किया जा सकता है.

कश्मीर की जनता इससे बेहतर व्यवहार की हक़दार है...कहीं बेहतर व्यवहार की...

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