अपराध यहाँ, सज़ा वहाँ

फ़ाइल फ़ोटो

पैट्रिक का कहना है कि उनके साथ अन्याय हुआ है क्योंकि उन्हें हिंदी नहीं आती.

पिछले दस वर्ष से भारत की जेल में सज़ा काट रहे एक ब्रितानी नागरिक ने गुहार लगाई है कि उनकी बाक़ी सज़ा उन्हें अपने देश में काटने की अनुमति दी जाए.

पैट्रिक मलुजो को भारत में मादक पदार्थ क़ानून के अपराध में दोषी पाया गया था.

बत्तीस वर्षीय पैट्रिक को 2006 में कोटा की एक अदालत ने 10 वर्ष की सज़ा के साथ एक लाख रुपए का जुर्माने भी लगाया था. वो तब से कोटा के केंद्रीय कारागार में सज़ा काट रहे हैं.

पैट्रिक की चार साल की सज़ा अभी बाक़ी है और वो चाहते हैं कि उन्हें प्रत्यर्पण के तहत ब्रिटेन भेज दिया जाए.

पैट्रिक के प्रत्यर्पण के लिए ब्रिटेन का ग़ैरसरकारी संगठन फ़ेयर ट्रायल अभियान चला रहा है.

फ़ेयर ट्रायल के वकील निशीथ दीक्षित ने कहा कि पैट्रिक के प्रत्यर्पण के लिए उन्होंने भारत सरकार को आवेदन किया था. उन्होंने कहा ," भारत सरकार तो लगभग तैयार है, लेकिन अभी ये मुद्दा ब्रिटेन के न्याय मंत्रालय के पास विचाराधीन है."

राजस्थान में जेल विभाग के महानिदेशक ओमेंद्र भारद्वाज ने बीबीसी से कहा कि वो अभी इतना ही बता सकते हैं कि सरकार ने पैट्रिक मलुजो के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट माँगी थी, वो रिपोर्ट भेजी जा चुकी है.

प्रत्यर्पण के लिए आवेदन

भारत सरकार तो लगभग तैयार है, लेकिन अभी ये मुद्दा ब्रिटेन के न्याय मंत्रालय के पास विचाराधीन है.

निशीथ दीक्षित, पैट्रिक के वकील

मलुजो के वकील का कहना है कि पैट्रिक मलुजो प्रत्यर्पण इसलिए चाहते हैं क्योंकि उन्हे लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है. पैट्रिक का मानना है कि उन्हें हिंदी भाषा न जानने का खा़मियाज़ा भुगतना पड़ा है क्योंकि अदालत की सारी कार्यवाही हिंदी में हुई थीं.

फ़ेयर ट्रायल का कहना है कि पैट्रिक मलुजो किसी साज़िश का शिकार हुए हैं.

पैट्रिक मलुजो भारत घूमने के लिए आए थे और उसी दौरान वो इस मामले में शामिल पाए गए.

वर्ष 2004 में उन्हें मुंबई हवाईअड्डे से ग़िरफ़्तार कर लिया गया था और वो तब से ही जेल में बंद हैं.

मलुजो ख़ुद को बेगुनाह बताते हैं. उन्होंने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ राजस्थान हाई कोर्ट में भी अपील की थी लेकिन हाई कोर्ट ने 23 फ़रवरी, 2010 को निचली अदालत के फ़ैसले को ठीक बताया.

ग़ैर सरकारी संगठन फ़ेयर ट्रायल के अनुसार पैट्रिक मलुजो सुप्रीम कोर्ट में भी अपील करना चाहते थे लेकिन न्याय की रफ़्तार धीमी होने के कारण उन्हें प्रत्यर्पण के लिए अपील करना ही बेहतर विकल्प लगा.

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