बीबीसी विशेष: कैसी आज़ादी

Nagendra bother of Manoj
Image caption नरेन्द्र की लड़ाई के चलते न्यायालय ने इस मामले में एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया.

भारत की आज़ादी की 63वीं सालगिरह पर बीबीसी आप तक पहुंचा रहा है कुछ विशेष कहानियाँ.

ये कहानियां हैं उन लोगों की, जो आज़ाद भारत में भी व्यवस्था के गुलाम हैं. वो इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या वो वाकई आज़ाद है?

शादी की सज़ा मौत कब तक...

मेरा नाम नरेन्द्र सिंह है और मैं हरियाणा के कैथल ज़िले का रहने वाला हूं. भारत को आज़ादी मिले 63 साल हो गए हैं लेकिन मैं और मेरा परिवार खुद को आज़ाद नहीं मानता.

7 अप्रैल 2007 को मेरे भाई मनोज ने बबली नाम की एक लड़की से प्रेम-विवाह किया. बबली के घरवाले इस शादी के ख़िलाफ थे. गांव में अपनी जान का ख़तरा देखते हुए वो दोनों भाग कर कैथल आ गए.

इस बीच बबली के घरवालों ने मनोज पर बबली को अगवा करने का मुक़दमा दायर कर दिया. 15 जून 2007 को कैथल में एक जज के सामने बबली ने ये बयान दिया कि वो बालिग है और ये शादी उसने अपनी मर्ज़ी से की है.

कोर्ट ने हमें मामले से बरी कर दिया और ये फ़ैसला सुनाया कि मनोज और बबली को पुलिस सुरक्षा में चंडीगढ़ पहुंचा दिया जाए.

गांव के सरपंच का मानना था कि एक ही गोत्र का होने की वजह से इन दोनों को शादी का हक नहीं है, लेकिन हम नहीं जानते थे कि वो इन दोनों को मार डालेंगे.

रुढ़ियों के गुलाम

मनोज और बबली को अपनी हिफ़ाज़त में चंडीगढ़ ले जाते हुए पुलिस ने बबली के घरवालों को बस में चढ़ा लिया. फिर उन दोनों से कहा कि वो अपनी जान बचाने के लिए बस से उतर कर भाग जाएं. बस से उतरते ही मनोज को बबली के घर वालों के हवाले कर दिया गया.

Image caption मनोज को पीट-पीट कर मार डाला गया, बबली की लाश खेतों में मिली.

बबली के भाईयों ने मनोज को पीट-पीट कर मार डाला. बबली को वो अपने साथ ले गए और बाद में उसकी लाश खेतों में मिली.

मैंने ठान लिया कि मैं दोषियों को सज़ा दिलवा कर रहूंगा. मैंने उन सभी लोगों के ख़िलाफ़ केस दायर किया जो इस घटना में शामिल थे. मामला दर्ज होते ही मुझे धमकियां मिलने लगीं. मुझे पैसे का लालच भी दिया गया.

आख़िरकार 30 मार्च 2010 को करनाल की एक अदालत ने इस मामले में एक एतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए सरपंच सहित पांच लोगों को मौत की सज़ा सुनाई.

मैं इस फैसले से खुश हूं लेकिन आज भी देश के हज़ारों-लाखों मनोज और बबली कानून के बावजूद अपनी मर्ज़ी से शादी नहीं कर सकते. हम स्वतंत्रता दिवस की खुशियां मनाते हैं लेकिन जिस देश में कानूनी तरीके से शादी करने वालों को मौत के घाट उतार दिया जाता है वो देश क्या वाकई आज़ाद है?

आज़ादी के सही मायने को अगर समझना है तो ज़रूरत इस बात की है कि हम परंपराओं और रूढ़ियों की गुलामी छोड़ें. ये ज़रूरी है कि जिन खाप पंचायतो को कानूनी मान्यता नहीं उन पर सरकार किसी तरह लगाम कसे. तभी सबके लिए आज़ादी के मायने होंगे.

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