नियंत्रण रेखा के पार व्यापार का लाभ

एलओसी
Image caption वर्ष 2008 में भारत और पाकिस्तान प्रशासित जम्मू कश्मीर में व्यापार शुरू हो गया

भारत और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के बीच शुरु हुए व्यापार का फ़ायदा स्थानीय लोगों की बजाय राज्य के बाहर के व्यापारियों को अधिक हो रहा है. दोनों इलाक़ों के बीच व्यापार दिसंबर 2008 में शुरु किया गया था.

नियंत्रण रेखा के आर-पार व्यापार पर सीमा शुल्क नहीं लागू होता है इसलिए पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के व्यापारी एजेंटों द्वारा व्यापार करते हैं. पंजाब में वाघा बॉर्डर से व्यापार पर सीमा शुल्क लगता है.

वर्ष 2005 में कश्मीर के दोनों भागों में रह रहे हज़ारों बंटे हुए परिवारों को जोड़ने के लिए नियंत्रण रेखा के आर-पार आने-जाने के रास्ते खोल दिए गए और वर्ष 2008 से जम्मू में पूँछ जिला में चकां दा बाग़ और कश्मीर घाटी में सलामाबाद से नियंत्रण रेखा के आर-पार व्यापार की शुरूआत हुई.

दोनों तरफ इस व्यापार को लेकर काफी जोश था. इससे इन पिछड़े हुए क्षेत्रों में आर्थिक लाभ के साथ-साथ रोज़गार के अवसरों की भी बात हो रही थी. इसके अलावा इस व्यापार से दोनों तरफ की भावनाएं भी जुडी थी.

पुंछ के वरिष्ठ नागरिक डॉक्टर सुभाष रैना ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "हम पुंछ के लोगों में इस व्यापार को लेकर काफी जोश था क्योंकि यह सीबीएम (विश्वास बहाली के क़दम) का महत्वपूर्ण भाग था. तो एक दूसरे के विश्वास बढ़ाने की नेक नियति की जो बातें हो रही थी यह उस के साथ जुडी थी."

उन्होंने बताया कि पुंछ और रावलकोट (पाकिस्तान) के बीच भारत और पाकिस्तान के विभाजन के पूर्व भी व्यापार हुआ करता था इसलिए इसके साथ अधिक भावनाएं जुडी थी.

लेकिन पुंछ के ही एक वकील इफ्तिकार बज्मी का कहना था, "जिस मकसद के लिए ये व्यापार या सीबीएम शुरू हुआ था वो कामयाब नहीं रहा. इससे नियंत्रण रेखा के पास रह रहे लोगों को कोई लाभ नहीं हुआ है. न ही आर्थिक लाभ और न ही कोई अन्य.

पुंछ के एक व्यापारी निशु गुप्ता ने कहा , "बाहर के बड़े बड़े व्यापारी यहाँ से एजेंटों के ज़रिए सामान का आयात और निर्यात करते हैं. वो लोग अब वाघा से व्यापार नहीं करते क्योंकि वहां सीमा शुल्क लगता है. बाहर के व्यापारी यहाँ के पंजीकृत व्यापारियों को कुछ हिस्सा देकर यहाँ से व्यापार करते हैं."

व्यापार से फायदा

नियंत्रण रेखा के आर-पार व्यापार यहाँ के स्थानीय व्यापारी ही कर सकते है जिन्हें पंजीकृत किया जाता है. पूँछ में इस समय 169 पंजीकृत व्यापारी हैं.

यह व्यापार पैसे से नहीं बल्कि बार्टर सिस्टम यानी सामान के बदले सामान से होती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अभी तक इस व्यापार में इस्तेमाल होने वाली मुद्रा पर सहमति नहीं हो पाई है.

यहाँ के एक वरिष्ठ नेता शमीम डार कहते हैं कि अगर पाकिस्तान से आयात सामान में से कुछ हिस्से को पुंछ में ही 'फ़ेयर प्राईस शापों' में बेचा जाए तो यहाँ के स्थानीय लोगो को कुछ फायदा हो सकता है.

वे कहते हैं,"होना तो यह चाहिए था कि पाकिस्तान से आयात सामान की पुंछ में बिक्री होती. बाहर के व्यापारी यहाँ से खरीदारी करते तो यहाँ लोगों को कुछ फायदा होता."

पूँछ में व्यापारी संगठन के राजीव टंडन का कहना है कि स्थिति इतनी ख़राब नहीं है. "केवल पुंछ में ही करीब 5000 लोगों का रोज़गार इस व्यापार के साथ जुड़ा है. कोई मज़दूर है, कोई ट्रांसपोर्टर हैं, कोई हिसाब किताब रखने वाला है, कोई खाना खिलाने वाला है... ऐसे कई है. लेकिन यह बात भी सच है कि बाहर अमृतसर और दिल्ली के व्यापारियों ने यहाँ लोगों के नाम अपना पंजीकरण करवाया है और व्यापार चला रहे हैं."

इस सबके जवाब में पुंछ जिला के उपायुक्त कुलदीप लाल खजुरिया का कहना था, "हमारे पास जो पंजीकृत हैं वो जम्मू कश्मीर के व्यापारी ही है. कुछ बातें मेरे सामने भी आई है और हम इस सब का अवलोकन कर रहे है. हर व्यापारी पर नज़र रखे हुए है. अगर पहले कुछ हुआ भी होगा तो अब हम कुछ ऐसा नहीं होने देगें."

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