झोपड़पट्टी वालों को आशियाने का इंतज़ार

झोपड़पट्टी

भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई की ड़ेढ करोड़ से ज़्यादा आबादी में से 55 फ़ीसदी लोग झोपड़पट्टियों में रहते हैं.

कहते हैं कि इस सपनों की नगरी में सब कुछ मिलता है, लेकिन यहाँ सबसे महंगी चीज़ है ज़मीन.

वर्ष 1995 में करीब डेढ़ दशक पहले भाजपा-शिवसेना ने लोगों से वादा किया कि क़रीब 40 लाख झोपड़पट्टी में रहने वाले लोगों के लिए पाँच साल में आठ लाख घर बनाए जाएंगे, और उन्हें मुफ़्त घर दिए जाएंगे.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अभी तक मात्र सवा लाख घर बने हैं.

भ्रष्टाचार, नौकरीशाही और राजनीतिज्ञों के बीच सांठगांठ के आरोपों के बीच मुंबई को झोपड़पट्टियों से छुटकारा दिलाने के मक़सद से बनी इस योजना पर बहस जारी है.

हाल ही में भाजपा के एकनाथ खडसे ने सरकार पर बिल्डरों को फ़ायदा देने का आरोप लगाया और उनके मुताबिक ये घोटाला कई हज़ार करोड़ का है.

उन्होंने बीबीसी को बताया,'' हमने सरकार को 10 ऐसे प्रकरणों के बारे में बताया है जिनमें बड़े-बड़े घोटाले हुए. अभी भी हमारे पासे ऐसे 21 प्रस्ताव हैं जिनमें सरकार ने अनियमितता की है. इनमें बिल्डरों को लाभ देने की कोशिश की गई है.''

मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने इससे इनकार किया है. सरकारों पर ऐसे आरोप नए नहीं हैं.

बहरहाल, भाजपा-शिवसेना ने 1995 के विधानसभा चुनाव जीते, अफ़जलपुरकर कमेटी बनी जिसने एक पुरानी स्कीम में थोड़े बदलाव के बाद एक रिपोर्ट सरकार को दी.

गठन हुआ स्लम रिहैबिलिटेशन अथॉरिटी या एसआरए का. इसकी भूमिका एक फेसेलिटेटर की थी.

ऐलान हुआ झोपड़पट्टियों में रहने वाले लोगों को 225 वर्ग फ़ीट के मुफ़्त घर दिए जाएंगे, लेकिन उन्हें साबित करना था कि उनके झोपड़े जनवरी 1995 से पहले के हैं.

उन्हें एक सोसाइटी बनानी होगी जिसके 70 प्रतिशत लोगों के राज़ी होने पर एक बिल्डर के साथ इलाके को दोबारा विकसित करने पर करार किया जाएगा.

भ्रष्टाचार का आरोप

बिल्डर ज़मीन के एक हिस्से में एक इमारत बनाएगा जिसमें झोपड़पट्टी वालों को मुफ़्त घर दिए जाएंगे. बाकी की ज़मीन पर बिल्डर घर बनाकर बाज़ार में बेच सकता है.

Image caption ज़ॉकिन अरपुथम कहते हैं कि कार्यक्रम तो अच्छा है लेकिन इसके क्रियान्वयन में समस्या है

यानि सोच थी कि एक तरह के घरों से हो रहे मुनाफ़े से झोपड़पट्टी वालों के लिए मुफ़्त घर बनाए जाए.

इस स्कीम के तहत बिल्डरों को कई नियमों के तहत छूटें दी गईं जिनमें ये भी था कि वो ज़मीन पर निर्धारित घरों से ज़्यादा का निर्माण कर सकते थे. मक़सद था बिल्डरों को मुनाफ़े के बहाने आकर्षित करना.

भाजपा-शिवसेना के बाद कांग्रेस एनसीपी की सरकार आई, लेकिन करीब 15 साल बाद भी सिर्फ़ सवा लाख के करीब ही घर बन पाए हैं.

इसके लिए भ्रष्टाचार, राजनीतिज्ञों, बिल्डरों और सरकारी अफ़सरों की आपसी मिलीभगत को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है.

एसआरए के पूर्व प्रमुख और म्हाडा (महाराष्ट्र हाउसिंग ऐंड एरिया डवलपमेंट अथॉरिटी) के सीईओ और उपाध्यक्ष गौतम चटर्जी कहते हैं,'' जब हमने 1996 में स्कीम की शुरूआत की तो हमने आठ लाख परिवारों के लिए घर बनाने की बात की थी. हम सवा लाख घर बना पाए हैं. सवा लाख और घरों पर काम चल रहा है. दरअसल अगर कोई परियोजना बाज़ार पर निर्भर है, तो ये बिल्डरों पर निर्भर करता है कि परियोजना की रफ़्तार क्या हो. हमने जो हासिल किया है वो काफ़ी खराब लगेगा, लेकिन ये कोई छोटी मोटी बात नहीं है.''

लेकिन जिस तरह से ये योजना चल रही है, उसे लेकर लोगों में बहुत बेचैनी है.

योजना पर सवाल

कुछ का मानना है कि ये योजना शुरुआत से ही गलत थी. मुंबई जैसे महंगे शहर में लोगों को मुफ़्त घर देना भ्रष्टाचार को हवा देने जैसा ही था.

Image caption एकनाथ खडसे कहते हैं कि झोपड़पट्टियों के लोगों को जो घर दिए जाते हैं वो बेहद घटिया स्तर के होते हैं.

जो लोग 1995 के बाद झोपड़पट्टियों में रह रहे थे, उन्होंने झूठे कागज़ बनवाए, बिल्डरों ने महंगे इलाके में झोपड़पट्टियों में रह रहे लोगों पर दबाव डाला कि वो उन्हें ही चुने, उन्हें धमकाया ताकि उन्हें मुफ़्त ज़मीन मिल जाए और वो मुनाफ़ा कमा सकें.

ज़ॉकिन अरपुथम वर्षों से धारावी में रहने वाले लोगों के लिए काम कर रहे हैं.

वो कहते हैं,'' ऐसा भी हुआ है कि किसी झोपड़पट्टी वाले को मुफ़्त घर दिए गया, तो उस घर को बेच दिया गया और फिर वही परिवार किसी दूसरे झोपड़े में जाकर रहने लगा. या फिर बिल्डर ने झोपडपट्टी वाले को कुछ पैसे देकर घर खाली करवा लिए, और फिर ऊंचे दामों में पर किसी और को बेच दिया. कुछ मामलों में एक परिवार ने घूस खिलाकर और गलत कागज़ बनवाकर एक से ज़्यादा घरों को हासिल कर लिया. उन्हें कुछ नहीं बस एक घर चाहिए. वो चाहे कैसा भी हो. इन सबका मुख्य कारण राजनीतिक भ्रष्टाचार है.''

जॉकिन कहते हैं कि कार्यक्रम तो अच्छा है लेकिन इसके क्रियान्वयन में समस्या है.

एकनाथ खडसे कहते हैं कि झोपड़पट्टियों के लोगों को जो घर दिए जाते हैं वो बेहद घटिया स्तर के होते हैं.

वो कहते हैं,'' घर बनाने का काम निजी बिल्डरों के बजाए सरकारी एजेंसियाँ जैसे म्हाडा क्यों नहीं करतीं जबकि उनका काम आम लोगों के लिए सस्ते घर बनाना है. अगर ऐसा होता तो ये काम सस्ते में हो जाता. ज़्यादातर ऐसी स्कीमें सरकारी ज़मीनों पर होती हैं क्योंकि उन्हें हथियाना आसान होता है. हर स्कीम में राजनीतिक हिस्सेदारी होती है.''

इस योजना पर मध्यम वर्ग में भी बहुत गुस्सा है. उनका कहना है कि एक तरफ़ जहाँ उनके परिवार में पति-पत्नी दोनो काम करते हैं और फिर भी उन्हें ठीक-ठाक घर मुश्किल से नसीब होता है, दूसरी तरफ़ ग़ैर-कानूनी रूप से ज़मीन पर रह रहे लोगों को मुफ़्त घर दिए जा रहे हैं.

उधर इस पूरे मुद्दे पर बिल्डरों का कहना है कि हालांकि कुछ लोग हैं जो सिर्फ़ मुनाफ़े के लिए काम करते हैं और अनियमितताएं भी हुई हैं, ज़्यादातर की कोशिश है शहर की हालत को सुधारा जाए और लोगों को सस्ते घर उपलब्ध करवाए जाएं.

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