दलित ग्राम प्रधान को गाँव से निकाला

उत्तराखंड की दलित महिला ग्राम प्रधान
Image caption पंचायत चुनावों में जीतने वाली महिलाओं के बारे में इस तरह का ख़बरे लगभग भारत के हर राज्य से आती रहती हैं.

उत्तराखंड की एक दलित महिला ग्राम प्रधान को गाँव के तथाकथित ऊंची जाति के लोगों ने गाँव से बाहर निकाल दिया है.

विधो देवी नाम की इस ग्राम प्रधान ने अपने साथ हुई इस ज़्यादती की शिकायत शासन से करते हुए दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की है.

घटना को हुए 10 दिन से ज़्यादा हो चुके हैं लेकिन इस मामले में प्रशासन के स्तर पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

निर्वोरोध प्रधान

इस पहाड़ी राज्य में दलितों के साथ भेदभाव कोई नई बात नहीं हैं लेकिन राजधानी देहरादून से क़रीब 90 किलोमीटर दूर इस दलित महिला ग्राम प्रधान को जिस तरह दर-दर भटकना पड़ रहा है उससे पंचायती राज व्यवस्था की सार्थकता पर सवाल उठ रहे हैं.

विधो देवी ने प्रशासन को जो शिकायत पत्र दी है उसके मुताबिक़ वे कालसी तहसील के गैंग्रो गांव की आरक्षित सीट से निर्विरोध प्रधान चुनी गई थीं.

उनका कहना है कि गाँव के तथा कथित ऊँची जाति के प्रभावशाली लोग यह बात सहन नहीं कर पाए और उन्होंने विधो देवी को प्रधान मानने से ही इनकार कर दिया.

पंचायत की बैठकों की अध्यक्षता करने की बात तो दूर उन्हें सरेआम अपमानित कर बैठकों में घुसने ही नहीं दिया जाता था.

उनकी अनुपस्थिति में ही योजनाएँ बनाई जाने लगीं और बैठक की कार्यवाही पर कथित तौर पर उनसे जबरन दस्तख़त करा लिए जाने लगे.

इन तथाकथित ऊँची जाति के लोगों ने उन पर सामूहिक भोज देने का दंड लगाकर उस दिन उन्हें गाँव से निकाल दिया जिस दिन पूरा देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा था.

विधो देवी आज अपने पति मंगल दास और बच्चों के साथ दर-दर भटक रही हैं .

बीबीसी से उन्होंने कहा, ''मुझे गांव की प्रधानी नहीं चाहिए. मेरा निवेदन है कि मेरे परिवार के रहने की व्यवस्था की जाए.''

वे कहती हैं, ''जिन लोगों ने मेरे साथ ऐसा किया है वे दबंग लोग हैं, हम तो छोटे लोग ठहरे. मुझे तो अब वहाँ लौटने में भी डर लग रहा है.''

गाँव वालों की चुप्पी

उधर, गैंग्रो गाँव में लोग इस घटना के बाद से चुप्पी साधे हुए हैं. इस पर बात करने को कोई तैयार नहीं है.

इस संबंध में संपर्क करने पर कालसी के एसडीएम इला तोमर ने कहा, ''यह बहुत दुखद घटना है.जल्द ही इसकी जांच कराकर दोषियों को सज़ा दी जाएगी.''

घटना को शर्मनाक बताते हुए दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं, ''उत्तराखंड में दलितों की भयावह स्थिति है. इस विषय पर सरकार और बुद्धिजीवियों की भूमिका भी संदिग्ध है.''

उन्होंने कहा, ''कोई इस पर बात करने को तैयार नहीं है. इसे बहुत स्वाभाविक ढँग से लिया जाता है. इस तरह के मामलों पर वे चुप हैं और सवर्णों के ही साथ है.''

पंचायती राज के लिए काम कर रहे ग़ैर सरकारी संगठन 'रूलक' के अध्यक्ष अवधेश कौशल कहते हैं, ''ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण मामला है. यह न्याय व्यवस्था और सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह उस दलित महिला को उसके पद पर दुबारा बहाल कराए. यह सुनिश्चित किया जाए कि वह गाँव में सम्मानजनक तरीके से रह सके.”

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