उल्टी घूमती हैं ये घड़ियाँ !

उल्टी घड़ी

इन घड़ियों के कांटे दाईं से बाईं ओर घूमते हैं.

आस्कर सम्मानित फिल्म ‘द क्यूरियस केस ऑफ बेंजामिन बटन’ में उल्टी घूमती घड़ी भले ही निर्देशक की कल्पना से उपजी हो लेकिन छत्तीसगढ़ में पिछले कई सालों से आदिवासी बड़ी संख्या में उल्टी दिशा में घूमने वाली घड़ियों का इस्तेमाल करते आ रहे हैं.

आम तौर पर जिन घड़ियों का इस्तेमाल हम करते हैं उनके कांटे बाईं से दाईं ओर घूमते हैं लेकिन छत्तीसगढ़ के कोरबा, कोरिया, सरगुजा, बिलासपुर और जशपुर ज़िलों में आदिवासी लंबे समय से उल्टी दिशा में चलने वाली घड़ी का इस्तेमाल करते आ रहे हैं. इन घड़ियों के कांटे दाईं से बाईं ओर घूमते हैं.

उल्टी घड़ियां

पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में भी उल्टी दिशा में घूमने वाली ये घड़ियाँ गोंड समेत दूसरे आदिवासी समूहों में काफी लोकप्रिय हैं.

धरती दाईं से बाईं ओर सूर्य की परिक्रमा करती है, हल-बैल भी जुताई के लिये दाएं से बाएं ही घूमते हैं. आदिवासी विवाह और मृत्यु के समय लिए जाने वाले फेरे भी दाएं से बाएं ही होते हैं. ऐसे में दाईं से बाईं ओर घूमने वाली घड़ी गलत कैसे हो सकती है.

हीरा सिंह मरकाम

ये घड़ियाँ पहली बार कब चलन में आईं, इसका कोई ब्यौरा उपलब्ध नहीं है लेकिन माना जाता है कि 1980 के दशक में पृथक गोंडवाना आंदोलन ने जब जोर पकड़ा, उसी दौरान ये घड़ियां पहली बार आदिवासियों के बीच बांटी गईं.

शुरु में अटपटी-सी लगने वाली इन घड़ियों में ठीक-ठीक समय देखना भी सबके बस की बात नहीं थी लेकिन धीरे-धीरे ये घड़ियां लोकप्रिय होती चली गईं.

कोरबा के कटघोरा इलाके में रहने वाले 70 साल के झम्मन सिंह अपने हाथ में बंधी हुई ऐसी ही घड़ी को दिखाते हुये कहते हैं- “अब ऐसी घड़ी के बिना समय बता पाना मुश्किल है. शहरी घड़ी देखना तो हमने बरसों पहले बंद कर दिया.”

‘प्राकृतिक’ घड़ी

छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल इलाके में पृथक गोंडवाना राज्य का आंदोलन चलाने वाले गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के नेता हीरा सिंह मरकाम मानते हैं कि उल्टी दिशा में घूमने वाली घड़ी ही ‘असली भारतीय’ और ‘प्राकृतिक’ घड़ी है.

हीरा सिंह मरकाम

मरकाम इन घड़ियों को ‘प्राकृतिक’ और ‘भारतीय’ मानते हैं.

मरकाम का तर्क है कि प्रकृति के सारे काम दाईं से बाईं दिशा में होते हैं. ऐसे में बाईं से दाईं दिशा में घूमने वाली घड़ी उल्टी और यूरोप के नकल वाली घड़ी है.

मरकाम कहते हैं- “हमारी धरती सूर्य के चारों ओर दाईं से बाईं ओर परिक्रमा करती है. भारत में खेती के लिये चलाये जाने वाले हल-बैल भी जुताई के लिये दाएं से बाएं ही घूमते हैं. सारी लताएं दाईं से बाईं ओर ही घूमती हुई बढ़ती हैं. खेत-खलिहानों की लिपाई-पुताई, अनाजों को पीसने वाली हाथ चक्की, आदिवासी विवाह और मृत्यु के समय लिए जाने वाले फेरे, यह सब कुछ दाएं से बाएं ही होते हैं. ऐसे में दाईं से बाईं दिशा में घूमने वाली घड़ी गलत कैसे होगी?”

इन घड़ियों को दीवार पर लगाने या कलाई पर बांधने वाले अधिकांश लोगों के पास इसी तरह के तर्क हैं.

आदिवासियों के बीच काम करने वाले नारायण सिंह राज अपने तर्क को इतिहास की कसौटी पर कसने की कोशिश करते हुए कहते हैं- “सिंधु घाटी की लिपि भी दाईं से बाईं ओर लिखी जाने वाली लिपि है. ऐसे में अगर आदिवासियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली घड़ियों के कांटे दाईं से बाईं ओर घूमते हैं तो इसे एक खास परंपरा से जोड़ कर देखने की जरुरत है. ”

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