फिर खुलेगा भोपाल गैस केस

भोपाल गैस काँड

भोपाल गैस कांड पर सुप्रीम कोर्ट ने 14 साल पहले अपने ही फ़ैसले के ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया है. सीबीआई की सुधारात्मक याचिका पर कोर्ट ने सात भारतीय अभियुक्तों के ख़िलाफ़ केस को दोबारा खोलने का आदेश दिया है.

सीबीआई ने साल 1996 में भोपाल गैस कांड पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ एक सुधारात्मक याचिका दायर की थी. सीबीआई का कहना था कि इस केस में पीड़ितों को इंसाफ़ नहीं मिल पाया है इसलिए अभियुक्तों की सज़ा को बढ़ाना चाहिए.

इस मामले को दोबारा से खोलने का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी अभियुक्तों के ख़िलाफ़ नोटिस जारी किया है.

सीबीआई की सुधारात्मक याचिका पर जजों की तीन सदस्यीय बेंच ने सुनवाई की. इस बेंच में मुख्य न्यायाधीश एस एच कपाड़िया, अल्तमस कबीर और आर वी रवींद्र शामिल थे.

सीबीआई की तरफ़ से सुधारात्मक याचिका को तैयार करने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील देवदत्त कामत ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, "हमारा यही कहना था कि 14 साल पहले जब फ़ैसला सुनाया गया था तब हो सकता है गवाहों में कमी रही हो लेकिन आज इस बात को साबित करने के लिए हमारे पास बहुत गवाह हैं कि भोपाल गैस कांड के इन सात अभियुक्तों को गैस प्लांट ख़तारनाक और जोखिमभरा होने की पहले से पूरी जानकारी थी. इसलिए उनको सज़ा लापरवाही से मौत की धारा में नहीं बल्कि ग़ैर इरादतन हत्या की धारा के अनुसार मिलनी चाहिए."

पीड़ितों को राहत

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का भोपाल गैस कांड पीड़ितों ने खुलकर स्वागत किया है.

लंबे समय से भोपाल गैस त्रासदी पीड़ितों के अधिकारों के लिए लड़ते आ रहे सत्तीनाथ षाड़ंगी ने पत्रकारों से कहा ," हम इस ख़बर को सुनकर बहुत ख़ुश हैं और अब हमें उम्मीद है कि आख़िरकार हमें इंसाफ़ मिलेगा. जिस त्रासदी को महज़ एक हादसे में बदल दिया गया था कम से कम वो तो बदलेगा. सरकार को ये कदम जनता की नाराज़गी और मीडिया के दबाव में आकर उठाना पड़ा है."

Image caption यूनियन कार्बाइड इंडिया के पूर्वाध्यक्ष केशब महिंद्रा और छह अन्य अभियुक्तों को पहले दो साल की सज़ा दी गई थी.

मध्य प्रदेश सरकार में गैस राहत विभाग के मुख्य सचिव एस आर मोहंती ने कहा कि वो चाहते थे कि सीबीआई को सुप्रीम कोट में सुधारात्मक याचिका दायर करनी चाहिए जिससे सज़ा की अवधि को बढ़ाया जा सके और वो इस आदेश का स्वागत करते हैं.

इंसाफ़ के 14 साल

दरअसल साल 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड इंडिया के पूर्वाध्यक्ष केशब महिंद्रा और अन्य छह अभियुक्तों के ख़िलाफ़ जिन आरोपों पर फ़ैसला सुनाया था वो मज़बूत नहीं थे.

सीबीआई की सुधारात्मक याचिका में कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट अपने ही फ़ैसले पर पुनर्विचार करे. सीबीआई की मांग थी कि सातों अभियुक्तों की सज़ा पर पुनर्विचार किया जाए और उसे आईपीसी की धारा 304 के दूसरे भाग में बदला जाए.

14 साल पहले इन अभियुक्तों को 'लापरवाही से मौत' की धारा के तहत सज़ा सुनाई गई थी. लेकिन सीबीआई की सुधारात्मक याचिका में कहा गया था कि इन अभियुक्तों के आरोप की धारा को बदलकर 'ग़ैर इरादतन हत्या' के आरोप में दोबारा केस को खोला जाए.

इस नई धारा के तहत दोषी पाए जाने पर ज़्यादा से ज़्यादा 10 साल की सज़ा का प्रावधान है.

जिन सात अभियुक्तों के ख़िलाफ़ ये केस दोबारा खोला गया है वो हैं यूनियन कार्बाइड इंडिया के पूर्वाध्यक्ष केशब महिंद्रा, यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के पूर्व प्रबंधन निदेशक विजय गोखले, पूर्व उपाध्यक्ष किशोर कामदार, पूर्व वर्क मैनेजर जे एम मुकुंद, पूर्व प्रोडक्शन मैनेजर एस पी चौधरी, पूर्व प्लांट सुपरिंटेंडेंट के वी शेट्टी और पूर्व प्रोडक्शन एसिस्टेंट एस आई क़ुरैशी.

इन्हें भोपाल की एक निचली अदालत ने दोषी करार देते हुए दो साल की सज़ा सुनाई थी.

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