घना पक्षी विहार में लौटी रौनक

सारस (फ़ाइल फ़ोटो)
Image caption घना पक्षी विहार में बड़ी तादाद में सुदूर देशों से पक्षी आते रहे हैं

राजस्थान में परिंदों की पनाहगाह बचाने के लिए बाँध का पानी कोई नब्बे किलोमीटर चल कर आया.

करौली के पांचना बाँध से फूटी जलधारा बल खाती हुई भरतपुर के विश्व प्रसिद्ध केवलदेव अभ्यारण्य पहुंची तो पक्षियों ने अपने उजड़े दयार को निहारा और देर तक कलरव किया.

इस पानी से घना अभ्यारण्य का विश्व धरोहर का दर्जा सलामत रह गया. कई दिनों बाद जब पक्षी विहार में रौनक लौटी तो न केवल परिंदे, बल्कि वो गाइड भी हर्षित हुए जो सैलानियों को इन पक्षियों की अठखेलियां दिखाने लाते रहे हैं.

अभ्यारण्य के निदेशक अनूप का कहना है, ''इस पनाहगाह पर बड़ा संकट था. यूनेस्को ने साफ़ कह दिया था कि अगर पानी नहीं आया तो ये अभ्यारण्य उजड़ जाएगा और अगले साल ये विश्व धरोहर का तमगा खो देगा. अब सरकार ने बाँध से पानी छोड़ दिया है. इससे पनाहगाह को जीवनदान मिल गया है."

पिछले कई सालों से राज्य में अच्छी बारिश न होने से इस बाँध के सामने अपने वजूद का संकट खड़ा हो गया था.

ये अभ्यारण्य कोई चार सौ प्रजातियों के पक्षियों की प्रणय स्थली रहा है.

इनमें मध्य एशिया, रूस, चीन और अफ़ग़ानिस्तान जैसे मुल्क़ों से हज़ारों किलोमीटर की उड़ान भर कर सर्दियों में इस अभ्यारण्य में आकर बसेरा करने वाले पक्षी शामिल हैं.

कभी इन परिंदों में बड़ी तादाद में रूस के ठंडे इलाक़ों से आने वाले साइबेरियाई सारस होते थे. मगर इस खूबसूरत पक्षी ने अब लगता है कि सदा के लिए इस विहार से किनारा कर लिया.

पानी की तंगी

अनूप कहते हैं, "साइबेरियाई सारस का आखिरी जोड़ा साल 2001 में देखा गया था. वैसे तो ये पक्षी जुलाई के आखिरी सप्ताह में यहाँ प्रजनन करते हैं. मगर इस बार पानी की तंगी थी. लिहाजा अब पानी आया है तो दूसरे दौर में शायद अगले दो माह में पक्षी प्रजनन करे."

पर्यटन के सुनहरे त्रिकोण पर स्थित ये पनाहगाह देशी विदेशी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र रही है.

हर साल कोई एक लाख सैलानी यहाँ जाड़े में रंग बिरंगे पखेरुओं की क्रीड़ा देखने आते थे. इनमें कोई तीस हज़ार तो विदेश से आते थे. ये स्थानीय अर्थव्यवस्था का बड़ा सम्बल बन गया था. पर अभ्यारण्य की वीरानी ने इस उद्योग को हाशिये पर ला छोड़ा.

भरतपुर के पर्यावरण कार्यकर्ता त्रिगुणायत कहते हैं, "हमें उम्मीद है कि अब सब ठीक होगा. पानी आया है तो पक्षी विहार का प्राकृतिक रूप बहाल होगा. सब इसके पीछे ही हैं. हाँ हाल के वर्षों में इसको बड़ी क्षति पहुंची है क्योंकि पानी नहीं था."

त्रिगुणायत का कहना है, "पांचना का पानी राजनैतिक कारणों से नहीं छोड़ा जा रहा था, अब सरकार ने मजबूत इच्छा शक्ति का परिचय दिया है.शायद अभ्यारण्य का खोया हुआ गौरव लौट आएगा."

राजनीति

पांचना बाँध इसी दशक में तैयार हुआ है. जब इसके पानी को परिंदों के लिए देने की बात आई तो राजनीति ने इसका प्रवाह रोक लिया. विवाद इतना बढ़ा कि पानी जातियों में बंट गया. पक्षियों की भी प्रजातियां हैं. मगर वे इंसानों से इतर एक ही घाट पर पानी पी लेते हैं.

ये पनाहगाह कभी भरतपुर के राजाओं ने रियासती दौर में शाही शिकारगाह के बतौर विकसित की थी. तब यहाँ शिकार के बड़े-बड़े आयोजन होते थे.

आज़ादी के बाद 1981 में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया और बाद में यूनेस्को ने इसके माथे विश्व धरोहर की कलगी लगा दी. ये खिताब अभी संकट में था लेकिन पानी ने इसे बचा लिया.

कोई 29 वर्ग किलोमीटर में फैले इस अभ्यारण्य में जब पानी का संकट नहीं था, लोग बड़ी तादाद में भांति-भांति के पंख पखेरुओं की क्रीड़ाएं देखकर रोमांचित होते थे.

अब लगता है ये उजड़ा दयार फिर से परिंदों के कलरव से निनादित होगा क्योंकि जल है तो जीवन है.

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