मुंडा फिर झारखंड के मुख्यमंत्री

शपथ लेते हुए अर्जुन मुंडा
Image caption अर्जुन मुंडा पहले भी दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता अर्जुन मुंडा ने झारखंड के आठवें मुख्यमंत्री के रुप में शपथ ली है.

वे झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और अन्य दलों के साथ मिलकर सरकार चलाएँगे.

शायद पहली बार हुआ कि एक राज्य में भाजपा के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ और पार्टी के शीर्ष नेता इस शपथ समारोह में शामिल नहीं हुए.

संसदीय दल के चेयरमैन लालकृष्ण आडवाणी, पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी, लोकसभा में पार्टी नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में पार्टी नेता अरूण जेटली कोई भी इस समारोह में नहीं थे.

झारखंड के प्रभारी के रुप में पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह वहाँ ज़रुर मौजूद थे.

उल्लेखनीय है कि पिछले अप्रैल में कटौती प्रस्ताव पर वोट को लेकर झामुमो और भाजपा के बीच राजनीतिक खींचतान शुरु हुई थी जो मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के इस्तीफ़े और आख़िरकार राज्य में राष्ट्रपति शासन पर ख़त्म हुई थी. यह सरकार सिर्फ़ पाँच महीने चल सकी थी.

साढ़े तीन महीने के राजनीतिक गतिरोध के बाद अर्जुन मुंडा ने झामुमो, जदयू, एजेएएसयू और दो निर्दलीय विधायकों के साथ मिलकर सरकार बनाने का फ़ैसला किया.

विवाद

इस बात पर भाजपा के भीतर विवाद रहा है कि झामुमो के साथ सरकार के गठन के लिए भरोसा किया जाना चाहिए या नहीं.

वैसे तो कहा जा रहा है कि ईद और गणेश चतुर्थी एक साथ पड़ने की वजह से लालकृष्ण आडवाणी शपथ ग्रहण समारोह में नहीं गए. लेकिन चर्चा है कि वे इस तरह सरकार के गठन से ख़ुश नहीं हैं और इसलिए वे इस समारोह में नहीं गए.

वे चाहते थे कि झामुमो के साथ पुराने अनुभव के बाद उसके साथ मिलकर सरकार का गठन नहीं किया जाना चाहिए.

पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के बारे में भी कहा गया है कि वे गणेश चतुर्थी के समारोहों की वजह से शपथ ग्रहण में नहीं गए. लेकिन उनके न जाने का फ़ैसला भी आडवाणी के न जाने के फ़ैसले के बाद हुआ.

जो नेता इस समारोह में थे उनमें पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह थे क्योंकि वे पार्टी में झारखंड के मामलों के प्रभारी हैं.

इसके अलावा रविशंकर प्रसाद, राजीव प्रताप रूडी, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए.

जोड़तोड़

Image caption शिबू सोरेन ने राजनीति में अपनी विश्वसनीयता खो दी है

अर्जुन मुंडा ने गत सात सितंबर को राज्यपाल से मिलकर सरकार के गठन का दावा पेश किया था.

उन्होंने 45 विधायकों की एक सूची भी राज्यपाल को सौंपी थी.

इसके बाद केंद्र सरकार ने राज्य में राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफ़ारिश की थी.

लगभग साढ़े तीन महीने के बाद राज्य में सरकार का गठन हुआ.

झारखंड में राजनीतिक खींचतान तब शुरु हुआ जब अप्रैल के आख़िरी सप्ताह में संसद में कटौती प्रस्ताव में शिबू सोरेने ने कांग्रेस का साथ दिया. जबकि वे राज्य में भाजपा के समर्थन से सरकार चला रहे थे.

इसके बाद भाजपा ने समर्थन वापसी की घोषणा की तो शिबू सोरेन थोड़े झुके.

लंबी राजनीतिक खींचतान के बाद आख़िर 18 मई को दोनों दलों ने एक समझौते की घोषणा की थी जिसके अनुसार कहा गया था कि दोनों दलों ने 28-28 महीने सत्ता का बँटवारा करेंगे.

लेकिन आख़िर कोई फ़ैसला नहीं हो सका था और शिबू सोरेन ने 30 मई को इस्तीफ़ा दे दिया था.

राजनीतिक विकल्प के अभाव में पहली जून से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था.

झारखंड विधानसभा में कुल 82 विधायक हैं. एंग्लो-इंडियन समुदाय के एक नामित विधायक जोसेफ़ पी गालसटोन की जून में मौत हो गई थी.

सूची में भाजपा और झामुमो के 18-18 विधायक हैं जबकि जदयू के दो और एजेएएसयू के पाँच और दो निर्दलीय विधायक शामिल हैं.

झारखंड विधानसभा में कांग्रेस के 14 विधायक हैं. लेकिन कांग्रेस ने इन गतिविधियों से ख़ुद को दूर रखा है.

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