हरी मस्जिद कांड के पीड़ितों की दास्तां

फ़ारूक़ मापकर
Image caption फ़ारूक़ मापकर को 16 साल तक अदालतों के चक्कर काटने पड़े

10 जनवरी 1993 की दोपहर याद करते हुए फ़ारुक़ मापकर भावुक हो जाते हैं, क्योंकि वो कहते हैं कि उस दिन की घटना ने उनकी ज़िंदगी बदल दी.

घटना के बारे में जब वो बोलना शुरू होते हैं तो वो बिना रुके एक-एक बिंदु के बारे में इतनी बारीकी से बताते हैं कि जैसे पिछले 16 सालों का हर एक पल वो कई बार बाँट चुके हों.

उन पर सेशंस कोर्ट में करीब 16 साल मुक़दमा चला. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सीबीआई को छह महीने के भीतर 10 जनवरी 1993 की हरी मस्जिद घटना की रिपोर्ट देने को कहा है. घटना में छह लोग मारे गए थे.

वापस 10 जनवरी 1993 की ओर लौटते हैं. करीब एक बजे का वक्त हुआ होगा. हिंदू चरमपंथियों के बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के बाद मुंबई के कई हिस्सों में दंगे भड़क उठे थे.

वडाला रोड स्टेशन के पास स्थित हरी मस्जिद में लोग नमाज़ पढ़ रहे थे. 24 वर्षीय फ़ारुक़ भी नमाज़ियों में शामिल थे.

आरोप

फ़ारुक़ के मुताबिक करीब मस्जिद के पास ही एक पुलिस वैन रुकी. उसके बाद पुलिसवाले मस्जिद में कथित तौर पर घुस गए और अंधाधुंध गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं. नमाज़ी जान बचाने के लिए इधर उधर भागने लगे. फ़ारुक़ के मुताबिक मुताबिक निखिल कापसे नाम के एक सब-इंस्पेक्टर ने कथित तौर पर गोलियाँ चलाईं जिसमें दो लोग मारे गए. एक गोली फ़ारुक़ की पीठ में भी लगी.

फ़ारुक़ बताते हैं,"मस्जिद में मौजूद लोगों को पुलिस वाले गालियाँ दे रहे थे. लोग अपनी जान बचाने के लिए अलग-अलग जगह छुप गए थे. उस वक्त भी पुलिस गोलियाँ बरसा रही थी. हमारे बाहर आने के बाद शम्सुद्दीन नाम के एक ज़ख्मी व्यक्ति को, जिसे पहले ही पैर में गोली लगी थी, उसकी छाती में एक और गोली मार कर ख़त्म कर दिया गया. हमें किदवई नगर पुलिस स्टेशन लेकर गए. हमारे ऊपर पुलिस ने झूठे केस दायर किए. पुलिस ने हिंदू दंगाईयों पर कोई कार्रवाई नहीं की, बल्कि निहत्थे नमाज़ियों पर पुलिस ने गोलियाँ बरसाई."

मरने वालों में शम्सुद्दीन, इस्माई और आदम सय्यद फ़ारुक़ के जानने वाले थे.

फ़ारुक़ के साथ मस्जिद में मोहम्मद शाकिर अली भी मौजूद थे. वो कहते हैं कि वो घटना के बाद इतना डर गए थे कि उन्होंने सिर्फ़ बीबीसी के नाम पर घटना के बारे में विस्तार से बताया है.

वो कहते हैं कि मस्जिद में उन्हें बंदूकों के बट से बेरहमी से इतना मारा गया कि आज भी वो कोई मेहनत वाला काम नहीं कर सकते. वो कहते हैं,"जब निखिल कापसे ने देखा कि मैं अधमरा सा हूँ तो उसने मेरी कनपटी पर रिवॉल्वर लगा दी. मैं तुरंत चौकन्ना हो गया. मैने उनसे कहा कि सर मैं मरने जैसा नहीं हूँ, मैं चल सकता हूँ, और मैं मज़बूत हूँ. तब उसने मेरी कनपटी से बंदूक हटाई."

सफ़ाई

Image caption सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को छह महीने के भीतर जाँच रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा है

उधर पुलिस का कहना था कि उन्हें सूचना मिली की दो से ढाई हज़ार लोग दंगा कर रहे हैं और जब पुलिस पर हथियारों से हमला हुआ तो उन्होंने जवाब में गोलियाँ चलाईं. पुलिस के मुताबिक दंगाई कथित तौर पर पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगा रहे थे.

1992 दिसंबर और जनवरी 1993 के दंगों की जाँच के लिए बनी श्रीकृष्ण आयोग के मुताबिक दंगों में करीब 900 लोग मारे गए गए थे, जिसमें 575 मुस्लिम और 275 हिंदू थे. आयोग के मुताबिक दंगों में पुलिस और प्रशासन ने हिंदू मानसिकता के तहत कई बार दंगाईयों के खिलाफ़ कदम नहीं उठाए.

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में हरी मस्जिद घटना में भी पुलिस के विवरण पर ‘गंभीर संदेह’ व्यक्त किया. आयोग के अनुसार ऐसा कुछ नहीं मिला जिसके आधार पर कहा जा सके कि दूसरी तरफ़ से गोलियाँ चलीं हों और कई गवाहों ने सुबूत दिए हैं कि किस तरह पुलिस ने बिना कारण गोलियाँ चलानी शुरू कर दी. आयोग ने निखिल कापसे की भूमिका की निंदा की, बल्कि ये भी कहा कि उन्होंने रेकॉर्ड में हेराफेरी की. आयोग के मुताबिक कापसे न सिर्फ़ अनुचित गोलीबारी के आरोपी हैं, बल्कि घटना के दौरान उनका व्यवहार अमानवीय और बर्बर था.

मुक़दमे

बहरहाल, घटना के बाद फ़ारुक़ के खिलाफ़ विभिन्न धाराओं के अंतर्गत मुक़दमे दर्ज हुए और सेशंस कोर्ट में करीब 16 साल मुक़दमा चला.

फ़ारुक़ कहते हैं,"कई बार हफ़्ते के सातों दिन हमें अदालत जाना पड़ता था. कभी महीने में चार-पाँच बार अदालत के चक्कर काटने पड़ते थे. इस घटना के बाद हमारे गाँव के एक अख़बार में ख़बर छपी कि नमाज़ पढ़ते वक्त मुझे गोली लगी जिसमें मेरी जान चली गई. इससे रिश्तेदार परेशान हो गए. माता-पिता भी डर गए थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करना चाहिए. अपनो ने भी मुझे अकेला छोड़ दिया."

इस मामले में फ़ारुक़ की दायर याचिका पर पहले हाईकोर्ट ने सीबीआई जाँच के आदेश दिए, जिसका सरकार ने विरोध किया. लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फ़ैसले को उचित ठहराया और सीबीआई को अगले छह महीने में रिपोर्ट देने को कहा है.

यानि फ़ारूक को अभी भी रिपोर्ट का इंतज़ार है. वो पूरी घटना के लिए पुलिस को कथित तौर पर ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

वो कहते हैं,"यहाँ पास ही में एक मंदिर भी है, लेकिन किसी ने वहाँ एक पत्थर तक नहीं फेंका. दंगे के दौरान न किसी हिंदू व्यक्ति की जान गई और न ही किसी हिंदू के घर या दुकान को निशाना बनाया गया. जितना भी ज़ुल्म हुआ, पुलिसवालों की तरफ़ से हुआ. 26 जुलाई 2005 में जब मुंबई में ज़बरदस्त बाढ आई हुई थी तो श्रावण मल्हारी किल्लारी नाम के एक गवाह ने कहा कि उसे पुलिस की फ़ायरिंग में गोली लगी और ज़ख्मी हालत में मुसलमान उन्हें अस्पताल लेकर गए."

दूसरे मामले

फ़ारुक़ कहते हैं कि वो अब पुलिस से पीड़ित लोगों की मदद करते हैं. वो कहते हैं कि उन्हें पुलिस पर थोड़ा बहुत भरोसा हेमंत करकरे जैसे लोगों की वजह से है.

वो कहते हैं,"मस्जिद में जो लोग मारे गए वो बेगुनाह थे. मैं चाहता था कि गुनाहगारों को सज़ा मिले मुझे कांग्रेस सरकार से उम्मीद थी क्योंकि पार्टी ने कहा था कि सत्ता में आने के बाद वो श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट को कार्यान्वित करेंगे लेकिन पार्टी ने लोगों को बेवकूफ़ बनाया."

फ़ारुक़ मापकर के वकील शकील अहमद कहते हैं कि वर्ष 1992-93 के दंगों के लिए आज तक किसी को भी सज़ा नहीं मिली और श्रीकृष्ण कमीशन की सिफ़ारिशों को आज तक लागू नहीं किया, हालाँकि कांग्रेस-एनसीपी ने अपने घोषणापत्र में ऐसा करने का वायदा किया था लेकिन वो अपने वायदों से मुकर गए.

वो कहते हैं,"कानून की प्रक्रिया कुछ ही मामलों में चल रही है, करीब 1600 मामले बिना क़ानून की प्रक्रिया अपनाए बिना बंद कर दिए गए. पुलिस ने पूरे मुस्लिम समाज के ऊपर कानून की तलवार टाँगकर दहशत में रखा. आज भी कई लोगों पर केस चल रहे हैं. कई मामलों में लोगों को मारा गया, और फिर बचे-खुचे लोगों को आरोपी बनाकर उन्हें सालों साल अदालतों के चक्क़र लगवाए गए. ऐसे केसों के बारे में सरकार ने एक स्पेशल टास्क फ़ोर्स बनाया गया जो कि रेकॉर्ड में तो है लेकिन बंद पड़ा है."

शकील अहमद के मुताबिक इस घटना में कई और लोगों को भी कथित तौर पर मार दिया गया, लेकिन उनका आज तक पता नहीं चला.

उधर शाकिर कहते हैं कि वो आज तक डर कर जी रहे हैं और अगर सरकार और पुलिस का रवैया ऐसा ही रहा, तो वो आगे भी डरकर ही जीते रहेंगे.

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