सत्ता तंत्र की भाषा नहीं है हिंदी

हिंदी के अख़बार
Image caption हिंदी के अख़बारों की प्रसार संख्या पिछले एक दशक में बहुत बढ़ी है

भाषा का सवाल सत्ता के साथ बदलता है.

अंग्रेज़ी के साथ सत्ता की मौजूदगी हमेशा से रही है. उसे सुनाई ही अंग्रेज़ी पड़ती है और सत्ता चलाने के लिए उसे ज़रुरत भी अंग्रेज़ी की ही पड़ती है.

इसलिए अंग्रेज़ी के अख़बार सत्ता के अख़बार हैं. उनका दबदबा होने की वजह भी वही है.

कुछ चुनिंदा शहरों से प्रकाशित होने वाले अंग्रेज़ी के अख़बार पूरे देश में चाहे न बिकते हों लेकिन वे फिर भी देश के महानतम अख़बार हैं. इसकी वजह साफ़ है कि सत्ता के केंद्र भी उन्हीं शहरों में केंद्रित हैं.

लेकिन इतिहास की कई घटनाओं ने यह ज़ाहिर कर दिया है कि जनता को अगर कोई चीज़ सुनानी हो तो अंग्रेज़ी से काम नहीं चलता. तब हिंदी चाहिए होती है या फिर कोई दूसरी स्थानीय भाषा.

हिंदी अख़बारों की बात करें तो वह सत्ता तंत्र की भाषा का अख़बार नहीं है. इसलिए वह सत्ता तंत्र का माध्यम नहीं है.

वह स्थानीय तंत्र का अख़बार है. वह किसी पार्टी के सांसद को चुनाव में मदद या नुक़सान कर सकता है. लेकिन सरकार चलाने में उसकी मदद बिल्कुल नहीं चाहिए.

सांसद को अपने क्षेत्र की जनता को यह बताने के लिए हिंदी का अख़बार चाहिए कि उसने संसद में अपने चुनाव क्षेत्र की कौन सी बात उठाई. लेकिन सत्ता के गलियारे में यश कमाने के लिए वह हिंदी के अख़बारों को उपयोगी नहीं मानता.

उदाहरण के तौर पर नीतीश कुमार को चुनाव जीतने के लिए अपनी फ़ोटो स्थानीय अख़बारों में छपवानी पड़ती है. वे जानते हैं कि ये फ़ोटो दिल्ली के किसी बड़े अंग्रेज़ी अख़बार में छप जाए तो बिहार की जनता को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. लेकिन कुछ चीज़ें वे दिल्ली के अख़बारों में छपवाना चाहते हैं. केंद्र में दबाव बनाना हो तो अंग्रेज़ी के अख़बार चाहिए. संसद में शोर अंग्रेज़ी के अख़बारों से मचता है. हिंदी के अख़बारों को संसद में कोई नहीं पूछता.

बदलाव और उपयोगिता

ऐसा नहीं है कि सत्ता के गलियारों में हिंदी के अख़बारों की कोई पूछ परख ही नहीं है. सत्ता ने उसकी उपयोगिता भी समझ ली है. राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तो पहली बार हुआ कि प्रधानमंत्री के साथ अंग्रेज़ी के नामचीन पत्रकारों के अलावा स्थानीय भाषा के संपादकों को मौक़ा दिया गया. उन संपादकों ने लौटकर अपने अख़बारों के पन्ने रंग दिए.

चीन से लौटे तो चीन की दीवार के साथ अपनी और प्रधानमंत्री की फ़ोटो छापी. लिखा कि चीन की दीवार कैसी दिखती है, वहाँ प्रधानमंत्री कैसे दिखते हैं, आदि. ये सत्ता के लिए पक्षधर क़िस्म की बात थी. सत्ता को लगा कि इसका इस्तेमाल होना चाहिए. इसलिए उसने हिंदी के अख़बारों को भी महत्व देना शुरु कर दिया.

इससे अख़बारों में गुणात्मक परिवर्तन भले ही न आया हो लेकिन संपादक के चेहरे में चमक आ गई. उसके तौर-तरीक़े बदल गए.

इस बीच अख़बारों में भी बहुत कुछ बदला. ख़ासकर तकनीक बहुत बदल गई. उसकी प्रसार संख्या बढ़ गई. इसके पीछे अर्थव्यस्था मे आया बदलाव, शिक्षा और आम लोगों की माली हालत भी रही. लेकिन सच कहें तो इसके पीछे बाज़ार का हाथ सबसे अधिक है.

बाज़ार को लगा कि उपभोक्ता वर्ग बढ़ रहा है और उस तक पहुँचने के लिए उसे माध्यम की ज़रुरत है तो उसने हिंदी के अख़बारों को चुन लिया. अख़बारों का कलेवर बदल गया. वैसे इस परिवर्तन की वजह को हिंदी समाज की इच्छाओं और सपनों में भी देखा जा सकता है.

लेकिन यह भी सच है कि हिंदी का कोई अख़बार कितना भी बड़ा क्यों न हो गया हो, मर्सिडीज़ कार का विज्ञापन उसे अभी भी नहीं मिल सकता. बाज़ार जानता है कि इन अख़बारों का पाठक मर्सिडीज़ नहीं ख़रीदेगा. मर्सिडीज़ का विज्ञापन किसी ब़डे शहर के अंग्रेज़ी दैनिक को ही मिलता है.

बाज़ार के हिसाब से तो हिंदी के अख़बार फिर भी बड़े हो गए. लोगों की सूचना की भूख को भी उसने एक हद तक शांत कर दिया. लेकिन हिंदी के अख़बारों ने विश्लेषण और भविष्य की योजनाओं की ओर ध्यान नहीं दिया. जब उसके सामने सवाल आया कि वह अपनी विश्वसनीयता बचा ले या फिर व्यावसायिक रुप से मज़बूत हो जाए तो उसने मज़बूत होने का विकल्प चुना.

इसीलिए उसकी पत्रकारिता भी विकसित नहीं हो सकी और दबदबा अभी भी अंग्रेज़ी के पत्रकारों का है. जहाँ पचास पत्रकार सवाल पूछ रहे हों वहाँ हिंदी के पत्रकार सवाल पूछते हुए भी हिचकते दिखते हैं.

हिंदी के पत्रकार अभी भी स्थानीय सरपंच के ख़िलाफ़ लंबे समय तक कुछ नहीं लिख पाते कि कहीं संतुलन न बिगड़ जाए. लेकिन बुश के ख़िलाफ़ वे धड़ल्ले से और कुछ भी छाप लेते हैं.

हिंदी के अख़बारों की दुनिया बदलने में अभी वक़्त लगेगा. कम से कम एक दशक इंतज़ार करना पड़ेगा.

(यशवंत व्यास 'अमर उजाला' पत्र समूह के सलाहकार संपादक हैं.)

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