फ़ैसला टालने वाली याचिका रद्द

बाबरी मस्जिद
Image caption इससे पहले बातचीत का कोई हल नहीं निकल सका था

हाईकोर्ट की विशेष पीठ ने सारे अयोध्या के ऐतिहासिक रामजन्म भूमि- बाबरी मस्जिद विवाद का फैसला टालने की याचिका ख़ारिज करते हुए , 24 सितम्बर को ही अपना फैसला सुनाने का आदेश दोहराया है. साथ ही याचिकाकर्ता रमेश चंद्र त्रिपाठी पर पचास हजार रूपये का भारी जुरमाना भी लगाया है.

अदालत का कहना था कि मुकदमे के चारों पक्ष में से जब कोई पक्ष बातचीत या समझौते के लिए तैयार नहीं है तो फ़ैसला टालने का कोई औचित्य नहीं बनता.

अदालत ने यह भी कहा कि एक बार जजमेंट की तारीख तय होने के बाद मामले को टाला नहीं जा सकता.

1950 से चल रहे इस मुकदमें में चार मुख्य दावेदार हैं—सुन्नी वक्फ़ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा, राम जन्म भूमि न्यास और ( स्वर्गीय) गोपाल सिंह विशारद. इन चारों के वकीलों का कहना था कि वे कोई समझौते की बात नही चला रहे हैं. केवल निर्मोही अखाड़ा ने जजमेंट की तारीख तीन दिन बढाकर 27 सितम्बर करने की बात की , लेकिन अदालत ने नही माना.

अदालत की कार्यवाही तीसरे पहर शुरू हुई तो सबसे पहले याचिकाकर्ता रमेश चंद्र त्रिपाठी के वकील ने इस बात की जोरदार बहस की अदालती प्रक्रिया से यह मामला हल नहीं हो सकता और इससे हारने एवं जीतने वाले समुदायों के बीच टकराव से देश में अशांति हो सकती है. इस सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने जजमेंट का हवाला देते हुए श्री प्रशांत चंद्र ने सुझाव दिया कि इस मामले को आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड और शंकराचार्य जैसे लोगों को समझौते के लिए सौंप दिया जाए. श्री प्रशांत चंद्रा

लेकिन अदालत ने श्री चंद्रा से कहा कि याचिकाकर्ता मुक़दमे के दौरान कभी गंभीर नही रहे. वह न तो इससे पहले 26 जुलाई को बुलाने के बावजूद अदालत में आये, न बहस की और न कोई गवाही पेश की. अदालत ने यह भी पूछा कि क्या याचिकाकर्ता ने किसी सम्बन्धित पक्ष से कोई ठोस बात की है तो उनका कहना था नही.

इसके बाद अदालत ने बाक़ी पक्षकारों से उनकी राय पूछी कि क्या वह समझौते से मामले को हल करने का प्रयास कर रहे हैं और इसके लिए जजमेंट टालना चाहते हैं. सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी के अनुसार सभी वकीलों ने जजमेंट टालने के प्रार्थनापत्र का विरोध किया.

विश्व हिंदू समर्थित राम जन्म भूमि न्यास के वकील मदन मोहन पांडे ने कहा कि विवादित स्थल उनकी आस्था का केंद्र है और उसके बारे में कोई लेनदेन संभव नहीं है.

इसी तरह की दलील शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद द्वारा संचालित राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति की वकील रंजना अग्निहोत्री ने दी.

लेकिन इन सबसे हटकर निर्मोही अखाड़ा के वकील रंजीत लाल वर्मा ने अदालत से अनुरोध किया किया वह जजमेंट की तारीख बढ़ाकर 27 सितम्बर कर दे ताकि इन दस दिनों में सम्बंधित पक्षों को आपसी बातचीत से मामले हल करने का एक और मौक़ा मिल जाए.

सुनवाई के दौरान अदालत ने याद दिलाया कि कोर्ट ने सभी पक्षकारों को हमेशा आपसी सुलह से मामले को हल करने की सलाह दी मगर कोई परिणाम नही आया.

इसी के साथ अदालत ने याचिका खारिज कर दी और याचिकाकर्ता रमेश चंद्र त्रिपाठी पर भारी जुर्माना भी लगा दिया. याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत चंद्र का कहना है कि हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील हो सकती है.

अब अदालत को केवल उस स्थान के मालिकाना हक पर फैसला देना है जहां छः दिसंबर को विवादित मस्जिद तोड़कर अस्थायी राम मंदिर बना दिया गया था. हिंदू महासभ के वकील हरिशंकर जैन के अनुसार मुख्य मुद्दा यही है कि क्या वहाँ पहले कोई मंदिर था.

अदालती इतिहास में यह न केवल साठ साल तक लंबा चलने वाला बल्कि एक ऐसा मुकदमा है जिसमे पांच सौ साल पहले हुए किस कथित अन्याय का फैसला अब होना है और दोनों पक्षों की भावनाएं उससे जुड गई हैं.

अब अदालत के संभावित फैसले को देखते हुए सरकार जरुरी सुरक्षा व्यवस्था कर रही है , हालाकि अभी याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं.

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