'नहीं जानते कि शिक्षा है क़ानूनी अधिकार'

बच्चों के अधिकारों के लिए काम कर रही एक ग़ैर सरकारी संस्था ने एक रिपोर्ट जारी कर दावा किया है कि भारत में ज़्यादातर लोगों को शिक्षा के अधिकार के क़ानून के बारे में जानकारी नहीं है.

इसी साल पहली अप्रैल से भारत सरकार ने शिक्षा का क़ानून लागू किया था जिसके तहत देश में सभी बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देना अनिवार्य हो गया. बचपन बचाओ आंदोलन नाम की गैर-सरकारी संस्था ने नौ राज्यों में 30 हज़ार लोगों के बीच 125 जन सुनवाईयां के आधार पर ये रिपोर्ट जारी की है.

शिक्षा के अधिकार पर विशेष रिपोर्ट सुनें

अपनी रिपोर्ट में उन्होंने बताया कि बिहार, दिल्ली, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के जिन इलाकों में उन्होंने लोगों की बात सुनी, उन इलाकों में औसतन 6 में से 5 लोगों को शिक्षा के अधिकार की जानकारी ही नहीं है.

शिक्षा है एक सहस्राबदी लक्ष्य

संयुक्त राष्ट्र ने सभी को प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराना एक सहस्राबदी लक्ष्य माना है. ये लक्ष्य साल 2015 तक पूरे किए जाने हैं.

सोमवार को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र का एक अधिवेशन शुरु हो रहा है जिसमें सहस्राबदी लक्ष्यों को पाने में हर देश कितनी पहल कर पाया है, इसके बारे में चर्चा होगी.

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी सरकार का रिपोर्ट कार्ड पेश करेंगे. इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट को अधिवेशन में रखा जाएगा.

जानकारी के इस आदान-प्रदान से उम्मीद है, शिक्षा के अधिकार के बारे में जानकारी बढ़ाने को लेकर ही नहीं बल्कि इस बारे में सुविधाएं उपलब्ध कराने को भी फिर प्राथमिकता मिलेगी.

शहरों में भी जानकारी का अभाव

दिल्ली के बदरपुर खादर गांव में रहने वाले 85 साल के ज़ऊर शाह, उनके 60 साल के बेटे निज़मुद्दीन और उनकी बेटियां 11 साल की नाहिद और 10 साल की नाज़िया कभी स्कूल नहीं गए. तीनों पीढ़ियां अशिक्षित हैं.

शाह के मुताबिक उनके गांव के आसपास सात-आठ मील तक कोई स्कूल ना होने की वजह से वो ना ख़ुद स्कूल गए और ना ही उनके परिवार का कोई सदस्य स्कूल गया है. नाहिद औऱ नाज़िया ने तो कभी स्कूल देखा भी नहीं, केवल टीवी या मैगज़ीन में और स्कूली बच्चों की झलक देखी है.

यानि ज़्यादातर लोग ये नहीं जानते कि घर के पास स्कूल ना होने या उसमें किताबें, मेज़-कुर्सी, शौचालय जैसी सुविधाएं ना होने या पढ़ाई का स्तर सही ना होने पर प्रशासन को शिकायत की जा सकती है.

इन मामलों के लिए स्थानीय स्तर पर ग्रामीण शिक्षा समिति और स्कूल मैनेजमेंट समिति, और राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर भी बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए समितियां हैं.

ग़ैर सरकारी संस्था बचपन बचाओ आंदोलन के प्रमुख कैलाश सत्यार्थी कहते हैं, "ये बात तय है कि हर बच्चे को अच्छी शिक्षा प्रदान करने की जो इमानदार राजनीतिक इच्छा शक्ति होनी चाहिए, वो नहीं है."

उन्होंने ये भी बताया कि गांवों में शिक्षा मुहैया कराने के लिए ज़िम्मेदार जिन पंचायतों के पास संसाधन हैं, उन तक भी क़ानून की जानकारी नहीं पहुंची है.

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