उड़ीसा हैज़ा की चपेट में, 75 की मौत

Image caption बरसात के महीनों में साफ़ पेयजल के अभाव से हैज़ा का प्रसार होता है

उड़ीसा के रायगड़ा जिले में हैज़ा फैलने से अब तक 75 लोगों की जानें जा चुकी हैं. हालाँकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार केवल 40 लोगों की ही मौत हुई है.

वैसे सरकार स्वीकार कर रही है कि ज़िले के 300 गांवों के 1500 से भी अधिक लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं.

स्थिति कि गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने तीन सदस्यों की एक टीम भेजी है, जो स्थिति का जायज़ा लेने इस समय दो दिनों के रायगड़ा दौरे पर है.

रायगड़ा में शुक्रवार रात भी एक व्यक्ति हैज़े का शिकार हुआ. कल्याण सिंघपुर के एक पीड़ित व्यक्ति की हालत बिगड़ने के बाद उसे रायगड़ा जिला अस्पताल में पहुँचाया गया जहाँ उसकी मौत हो गई.

कल्याण सिंघपुर के डॉक्टर ने इसे हैज़ा का मामला बताया था, लेकिन रायगड़ा पहुँचते-पहुँचते यह एनीमिया का क़िस्सा बन गया.

रायगड़ा में हैजा के मामले अगस्त के तीसरे सप्ताह से ही आने शुरू हो गए थे. लेकिन 10-12 लोगों कि मौत के बाद भी राज्य सरकार ने यही रट लगा रखा था कि जिले में फैल रही बीमारी हैज़ा नहीं, बल्कि डायरिया है.

हैज़े का ख़तरनाक रूप

लेकिन पिछले सप्ताह भुवनेश्वर स्थित क्षेत्रीय आयुर शोध केंद्र यानी आरएमआरसी में रायगड़ा से लाए गए मल नमूनों के परीक्षण के बाद पाया गया कि ज़िले में फैल रही बीमारी वाक़ई में हैज़ा ही है. यही नहीं, जांच के बाद यह भी पाया गया कि रायगड़ा से लिए गए नमूनों में आम तौर पर पाए जाने वाले ओ-वन जीवाणु नहीं बल्कि एल्टर-जीवाणु पाए गए, जो कहीं ज्यादा खतरनाक होते हैं.

Image caption नमूनों में हैज़े का ख़तरनाक रूप पाया गया है

आरएमआरसी के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि इस क़िस्म के हाइब्रिड जीवाणु केवल छह घंटों में ही बीमार के शरीर से सारा पानी निचोड़ लेते हैं, जिससे मौत का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है.

आरएमआरसी ने जब हैज़ा की पुष्टि कर दी, तब कहीं राज्य सरकार हरकत में आई. जल्दी ही 30 डॉक्टरों और 50 स्वास्थ्य सहायकों का एक दल रायगड़ा भेजा गया.

स्थिति का जायज़ा लेने के लिए ख़ुद स्वास्थ्य मंत्री प्रसन्ना आचार्य ने भी रायगड़ा का दौरा किया. वहाँ से लौट कर आचार्य ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को एक रिपोर्ट सौंपी जिसमें प्रदूषित पानी को हैज़े का मुख्य कारण बताया गया है.

रायगड़ा ज़िले के अंदरुनी इलाक़ों में सरकार क़ी ओर से लोगों को शुद्ध पेयजल मुहैया नहीं कराया गया है. अधिकांश गांवों में नल नहीं हैं. जहाँ हैं भी वहाँ महीनों से काम नहीं कर रहे हैं. ऐसे में लोग मजबूरन पहाड़ी झरनों का पानी पीते हैं, जो बारिश के दिनों में अक्सर प्रदूषित होता है.

अंदरूनी गांवों और अस्पतालों के बीच दूरी और यातायात संबंधी दिक़क़्तों के कारण लोगों को स्वास्थ्य सेवा नहीं मिल पाती.

ख़स्ताहाल स्वास्थ्य सेवा

वैसे भी अधिकांश अस्पतालों में डॉक्टर हैं ही नहीं. राज्य सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि इस जिले में डॉक्टरों के 122 पद खाली हैं. ऐसे में स्वास्थ्य सेवा के अभाव में लोगों का मरना शायद कोई आश्चर्य की बात नहीं है.

वर्ष 2007 में रायगड़ा और पड़ोसी कालाहांडी ज़िलों में हैज़ा फैलने से सौ से भी अधिक लोगों की मौत हो गई थी. तब भी समस्या वही थी- प्रदूषित पानी और स्वास्थ्य सेवा का अभाव. ज़ाहिर है सरकार ने उस हादसे से कोई सीख नहीं ली.

रायगड़ा पहुँचे केंद्रीय दल के नेता और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. जगबीर सिंह ने शनिवार को सबसे अधिक प्रभावित कल्याण सिंघपुर के कुछ गांवों में गए और स्थिति का जायज़ा लिया.

कुछ पीड़ित लोगों के रेक्टल स्वाब लिए गए जिन्हें डॉ. सिंह जाँच के लिए नई दिल्ली ले जाएंगे. दल के दूसरे सदस्य रविवार को रायगड़ा के सबसे अधिक प्रभावित इलाक़ों का दौरा करेंगे.

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