याचिका रद्द करने के फ़ैसले पर सवाल

बाबरी मस्जिद

हाईकोर्ट की अयोध्या विशेष पूर्ण पीठ ने शुक्रवार को मुक़दमे का फैसला स्थगित करने और मामले को आपसी सहमति से तय करने का निर्देश देने का प्रार्थनापत्र ख़ारिज करने का जो आदेश सुनाया था, उस पर तीन में से केवल दो जजों जस्टिस एसयू ख़ान और जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने हस्ताक्षर किए हैं.

तीसरे जज जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने शनिवार की शाम तक न तो उस फ़ैसले पर हस्ताक्षर किए हैं और न ही अपना कोई अलग आदेश दिया है.

इस बात को लेकर फ़ैसले की वैधानिकता पर सवाल उठाये जा रहे हैं.

इस आदेश में फैसला टालने की याचिका को शरारत पूर्ण बताते हुए याचिकाकर्ता पर पचास हज़ार का जुर्माना ठोका था.

वैधता का सवाल

पूर्ण पीठ ने शुक्रवार को मामला सुना. सुनवाई के दौरान जस्टिस एसयू खान और जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने वकीलों से कुछ सवाल पूछे , जबकि जस्टिस शर्मा शांत रहे.

इसके बाद पीठ के सीनियर जज जस्टिस एसयू खान ने खुली अदालत में अर्ज़ी को हर्जाने के साथ ख़ारिज करने का आदेश सुनाया और कोर्ट उठ गई.

कुछ देर बाद कोर्ट के राम जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद अनुभाग के सेक्शन ने केवल दो जजों जस्टिस खान और जस्टिस अग्रवाल के हस्ताक्षर वाला आदेश प्रमाणित करके जारी कर दिया.

आदेश में इस बात का भी जिक्र है कि यह याचिका नौ सितंबर तक तब नहीं दी गई जब वे दोनों जज लखनऊ में मौजूद थे. और 13 सितम्बर को जब वह इलाहाबाद में कोर्ट कर रहे थे, तब यह प्रार्थना पत्र अचानक दिया गया और एक जज ने अकेले ही उसी दिन उसे रजिस्टर कर निर्णय के लिए बेंच के सामने प्रस्तुत करने का आदेश दे दिया.

जानकारों का कहना है कि सामान्यतया तीनों जजों का फ़ैसला एक साथ जारी होता है. तीसरे जज को यह विकल्प था कि या तो वह दोनों जजों द्वारा दिए गए आदेश पर हस्ताक्षर करते या फिर सहमति अथवा असहमति का अपना अलग आदेश जारी करते.

मुकदमे के संबंधित पक्षों के वकील शनिवार को दिन भर हाईकोर्ट कार्यालय से पता करते रहे कि जस्टिस शर्मा ने क्या आदेश दिया. मगर शाम तक यही बताया गया कि उन्होंने न तो दोनों जजों के उस फ़ैसले पर हस्ताक्षर किए हैं और न ही अपना अलग आदेश दिया है.

अदालत के एक अधिकारी का कहना है कि जस्टिस शर्मा संभवतः सोमवार को अपना अलग आदेश देंगे. वकीलों में इस बात को लेकर चर्चा रही कि ऎसी स्थिति में क्या फ़ैसला कानूनी दृष्टि से वैध है?

एक सीनियर वकील का कहना है कानून की दृष्टि में यह आदेश वैध नही है. केवल दो जजों के आदेश को जारी करने पर भी सवाल उठाये जा रहे हैं.

दूसरी ओर यह तर्क दिया जा रहा है कि प्रार्थनापत्र को ख़ारिज करने का आदेश चूँकि खुली अदालत में सुनाया गया और उस समय जस्टिस शर्मा ने कोई अलग बात नहीं कही इसलिए यह आदेश पूर्ण पीठ का है. अब अगर जस्टिस शर्मा अपना असहमति का आदेश देते हैं तो भी दो जजों का आदेश बहुमत से मान्य होगा.

उधर याचिकाकर्ता रमेश चंद्र त्रिपाठी कहना है कि वह अपनी अर्ज़ी ख़ारिज होने के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे.

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