सौ रुपए में दस किताबें

माया मृग
Image caption माया मृग का कहना है कि लंबे समय में सस्ती किताबें बेचने का बहुत फ़ायदा है.

सुनने में अटपटा लगे लेकिन है बिल्कुल सही.. जी हां सौ रुपए में हिंदी साहित्य के अच्छे लेखकों की दस किताबें पढ़ने को मिल रही हैं.

राजस्थान के एक प्रकाशक माया मृग ने पिछले दिनों एक अनोखी पहल की है जिसके तहत दस किताबें मात्र सौ रुपए में बेची जा रही हैं. उनकी किताबें सस्ती भले ही हों लेकिन गुणवत्ता में कोई समझौता नहीं किया गया है.

इन पुस्तकों में लेखक नासिरा शर्मा, चंद्रकांत देवताले, महीप सिंह जैसे बड़े नाम हैं. किताबों की छपाई और कागज़ से भी कोई समझौता नहीं किया गया है.

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माया मृग बोधि प्रकाशन के मालिक हैं और सौ रुपए में दस किताबों की श्रृंखला को उन्होंने बोधि पुस्तक पर्व नाम दिया है.

लेकिन ये फ़ैसला किया क्यों माया मृग ने. वो कहते हैं, ‘‘असल में हिंदी के पाठकों की संख्या कम हो रही है. लोग पुस्तकें ख़रीद नहीं रहे हैं. लेखक और प्रकाशक ये बात जानते हैं. मैं इससे चिंतित था.’’

लेकिन क्या सौ रुपए में दस किताबें देना मुश्किल नहीं है. वो कहते हैं, ‘‘ असल में बहुत मुश्किल नहीं है अगर लंबे समय के फ़ायदे देखे जाएं तो. मैं कोई घर लुटाने नहीं आया हूं. अभी मुझे इससे लाभ नहीं हो रहा है. लेकिन अगर बहुत सारी किताबें बिकती हैं तो मुझे लाभ भी होगा.’’

माया मृग बताते हैं कि उन्होंने बोधि पुस्तक पर्व के तहत सौ रुपए में दस किताबें देने की योजना पहले तो पब्लिसिटी के लिए शुरु की थी लेकिन बात कहीं से कहीं पहुंच गई.

वो कहते हैं, ‘‘ मामला थोड़ा पब्लिसिटी का था लेकिन मुझे उम्मीद नहीं थी कि पाठकों से और आम लोगों से ऐसी प्रतिक्रिया मिलेगी. आपको बताऊं कि जब पहली खेप आई क़रीब ग्यारह हज़ार पुस्तकों की तो वो हाथों हाथ एक हफ्ते में बिक गईं. अभी चार महीने हुए हैं योजना के और तीसरी बार मैं किताबें छपवा चुका हूं और वो भी आधी से अधिक बिक गई हैं.’’

हालांकि इस काम में माया मृग की मदद लेखकों ने भी की है. वो बताते हैं कि सौ रुपए में दस किताबों की योजना में जिन लेखकों की किताबें हैं उन्होंने रॉयल्टी नहीं ली है.

वो कहते हैं, ‘‘ कुछ मदद लेखकों ने की है, कुछ दिमाग हमने लगाया कि किताब 80 से 96 पन्नों की हो. मैंने अपना फ़ायदा नहीं देखा. बिना लाभ हानि के पुस्तक बेचने की कोशिश की.’’

इस तथ्य को आलोचक और लेखक भी मानते हैं कि हिंदी के पाठक वर्ग में कमी आई है और लोग किताबें खरीद कर नहीं पढ़ते हैं जिसके कई कारण हैं. इनमें से एक कारण किताबों की अधिक कीमत भी मानी जाती है.

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में हिंदी के सहायक प्रोफेसर गंगा सहाय मीणा कहते हैं कि ये एक अभूतपूर्व प्रयास है जिसका सभी को समर्थन करना चाहिए.

वो कहते हैं, ''ऐसा काम तो विरले लोग करते हैं. अगर ये सफल हुआ तो प्रकाशन की दुनिया में नई बात होगी. लोग इसका समर्थन भी कर रहे हैं.''

दूसरी ओर कई प्रकाशक माया मृग से नाराज़ भी हैं इस बारे में माया मृग कहते हैं, ‘‘ कुछ लोग नाराज़ ज़रुर हैं लेकिन मैं क्या कर सकता हूं. किताबों के धंधे में कई चीज़ें होती हैं. हम जब पुस्तकें बेचने जाते हैं तो लाइब्रेरी वाले कमीशन मांगते हैं. पत्रकार समीक्षा करने के लिए मुफ्त में पुस्तक मांगते हैं. ये सब बंद हो तो प्रकाशक भी ईमानदारी बरतेगा.’’

कम क़ीमत की पुस्तकों के बारे में सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर एक बहस के दौरान कुछ लोगों ने यहां तक कहा कि किताबों की क़ीमत कर के ज्ञान की महत्ता घटाई जा रही है लेकिन माया मृग इसको ग़लत ठहराते हैं और कहते हैं कि गीता और रामायण भी तीस तीस चालीस रुपए में मिलती है लेकिन इससे उनकी महत्ता कम नहीं हुई है.

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में वरिष्ठ प्रोफेसर रामबक्ष कहते हैं कि इस प्रयोग पर नज़र रखने की भी ज़रुरत है. वो कहते हैं, '' माया मृग की इस शुरुआत की तारीफ़ होनी चाहिए लेकिन इस पर ध्यान देने की भी ज़रुरत है कि यह योजना बस एक योजना बन कर न रह जाए क्योंकि इस योजना में वो ताकत है जो प्रकाशन, लेखन और पढ़ने लिखने की संस्कृति को बदलने की क्षमता रखती है.''

बोधि प्रकाशन की इस योजना को आने वाले दिनों में जांचा परखा ज़रुर जाएगा लेकिन फिलहाल यह एक ऐसी योजना है जिसकी सराहना हो रही है.

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