कोर्ट के फ़ैसले पर प्रतिक्रियाएं

बाबरी विध्वंस
Image caption अयोध्या फ़ैसले को टालने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक अपील की गई थी.

अयोध्या मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फै़सले को टालने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने ज़्यादातर पक्षों को हैरानी में डाल दिया है.

भारतीय जनता पार्टी के नेता और इस मामले में हिंदू पक्ष के वकील रवि शंकर प्रसाद ने खेद ज़ाहिर करते हुए कहा कि फ़ैसला टालने की अपील करने वाले याचिकाकर्ता रमेश त्रिपाठी इस मामले में एक गैर ज़रूरी पक्ष हैं.

उन्होंने कहा, ''जिस मामले पर पिछले 60 साल के दौरान आपसी सहमति से कोई फ़ैसला नहीं हो सका उसे लेकर अब इस तरह की कोई भी उम्मीद रखना और अपील दायर करना समय की बर्बादी है.''

रवि शंकर प्रसाद ने कहा कि इतने महत्वपूर्ण फ़ैसले के वक्त अचानक एक याचिकाकर्ता का इस तरह सामने आना अपने-आप में संदेह पैदा करता है.

'टालते रहना ठीक नहीं'

सीपीएम के नेता सीताराम येचुरी ने कहा, ''हम भले ही ये चाहते हैं कि ये मामला आपसी समझौते से हल हो जाए लेकिन जब परिस्थितियों के अनुसार ये असंभव दिखता हो तो फ़ैसले को टालते रहना ठीक नहीं.''

कोर्ट के इस निर्णय पर कांग्रेस का पक्ष सामने रखते हुए जनार्दन द्वीवेदी ने कहा, ''अगर इस मामले को लेकर कोई आम सहमति बन सकती है तो बहुत अच्छा है, लेकिन अगर ऐसा संभव नहीं है तो जो भी फै़सला अदालत में किया जाता है उसे सभी पक्षों को मानना चाहिए. ''

भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल सोली सोराबजी ने एक भारतीय टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा कि सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला ''तर्कहीन आशावाद लिए हुए है.''

उन्होंने कहा, ''पिछले कई सालों के दौरान समाज के अलग-अलग नुमाइंदों ने इस मामले में सुलह की पहल की है लेकिन कोई कामयाबी नहीं मिली. जो पक्ष सीधे इस फ़ैसले से जुड़े हुए हैं जब उन्होंने समझौते की पेशकश नहीं की तो हम कैसे ये मान सकते हैं एक हफ्ते के अंदर इस विवाद पर कोई आम सहमति बन जाएगी.''

सोराबजी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला हमेशा के लिए एक गलत मिसाल कायम करेगा.

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