अपह्त पुलिसकर्मियों के लिए कोई नहीं

Image caption छत्तीसगढ़ में माओवादियों और पुलिस के बीच बड़ा संघर्ष चलता रहा है.

कहते हैं मैदान-ए-जंग में ना तो कोई उसूल होता है और ना ही संवेदनाओं की कोई जगह. जंग के मैदान में आमने सामने की लड़ाई लड़ने वालों का सिर्फ एक ही काम है -- मारना और सिर्फ मारना.

माओवादी छापामारों और पुलिस के बीच चल रहे युद्ध की वजह से छत्तीसगढ़ के रक्त रंजित बस्तर संभाग में भी कुछ ऐसे ही हालात हैं.

यह वो इलाक़ा है जहाँ संवेदनाओं का कोई महत्त्व नहीं है. जहाँ इंसान की ज़िन्दगी का कोई मोल नहीं. जहाँ मौत बहुत आसान और ज़िन्दगी बहुत मुश्किल है. जहाँ की ख़बरों में किसी की दिलचस्पी नहीं है.

यहाँ अगर लोगों को अनाज नहीं मिल रहा है तो ना मिले. इससे किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. यहाँ अगर पुलिस के फ़र्ज़ी मुठभेड़ होते हैं तो हुआ करें. इसमें किसी की दिलचस्पी नहीं. यहाँ अगर अर्द्ध सैनिक बलों के जवान अपने कैम्पों में नारकीय हालात में रह रहे हैं तो रहा करें. इससे किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगती है.

बिहार में माओवादियों नें चार पुलिसकर्मियों का अपहरण किया था, उनमे से एक लुकास टेटे की हत्या कर दी गई थी जबकि छह सितम्बर को बाक़ी के अपह्रत पुलिस कर्मियों को लखीसराय के पास रिहा कर दिया गया था. कई दिनों तक सभी मीडिया चैनेलों और अख़बारों में यह ख़बर सुर्ख़ियों में छाई रही.

कहीं एक संवेदनशील मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अपील तो कहीं अपह्रत पुलिसकर्मियों के परिवारवालों का बयान, कई दिनों तक मीडिया में यही चलता रहा.

लेकिन 19 सितम्बर को छत्तीसगढ़ के सबसे संवेदनशील बीजापुर ज़िले के तर्लागढ़ से सात पुलिसकर्मियों का माओवादियों द्वारा अपहरण कर लिया गया. दो दिनों के बाद उनमे से तीन पुलिसकर्मियों की लाश देपला के जंगलों से बरामद की गई जबकि बाक़ी के चार पुलिसकर्मियों का अब तक कोई अता पता नहीं है.

बात संवेदनाओं की हो रही है इसलिए यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि घटना के बाद से अब तक छत्तीसगढ़ के पुलिस प्रशासन नें इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है. इस घटना के बारे में कोई कुछ नहीं कहना चाहता है. या तो अधिकारी फ़ोन नहीं उठाते हैं. और उठाते भी हैं तो कुछ भी कहने से इनकार करते हैं.

यह सभी पुलिसकर्मी बीजापुर के भद्रकाली पुलिस स्टेशन में पदस्थापित थे. 19 सितम्बर को भोपालपटनम के साप्ताहिक हाट से लौटने के क्रम में सशस्त्र माओवादियों नें उनका अपहरण कर लिया था.

शुक्रवार को घटना के छह दिन हो गए मगर राज्य के किसी पुलिस अधिकारी नें अपह्रत पुलिसकर्मियों की रिहाई के लिए कोई पहल नहीं की है. अलबत्ता शुक्रवार की शाम छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह नें माओवादियों के नाम एक अपील ज़रूर जारी की जो बहुत ही अनौपचारिक सी थी.

दूसरी तरफ़ अपने आप को बेबस महसूस कर रहे अपह्रत पुलिसकर्मियों के परिवार वालों नें माओवादियों से सबको छोड़ने की अपील की है

छत्तीसगढ़ के लोरमी में मातम पसरा हुआ है. पूरा माहौल ग़मगीन है. यहीं के रहने वाले हैं छत्तीसगढ़ पुलिस के जवान सुभाष पात्रे.

Image caption बस्तर के कई इलाक़े पूरी तरह से माओवादियों के कब्ज़े में है

इनकी पत्नी मंजू पात्रे नें माओवादियों के नाम से अपील जारी करते हुए कहा, "नक्सली भाइयों, मुझे बहन या बेटी समझकर मेरे पति को छोड़ दो. मेरी दो छोटी छोटी बच्चियां हैं जिनका एकमात्र सहारा मेरे पति हैं."

झारखण्ड से लगे जशपुर ज़िले के सन्ना ब्लाक के रहने वाले सुदरू राम भगत और बीचा ब्लाक में सिपाही बी टोप्पो के घरों का भी यही आलम है. इनका सुनने वाला कोई नहीं है.

ऐसी ख़बरें मिल रहीं हैं कि अब तक राज्य का कोई आला पुलिस अधिकारी इन पुलिसकर्मियों के परिवार वालों का हालचाल पूछने नहीं गया है.

टोप्पो के परिवार वाले बग़ल के दंतेवाड़ा और जगदलपुर ज़िले में डेरा डाल कर एक एक पुलिस अधिकारी का दरवाज़ा खटखटा रहे हैं.

यह हाल उन जवानों का है जिनपर नक्सल विरोधी अभियान का सारा दारोमदार है और जो अपनी जान की बाज़ी लगाकर सरकार के कथित "आपरेशन ग्रीनहंट" को सफल बनाने में लगे हुए हैं.

यही वजह है कि छत्तीसगढ़ पुलिस पर आरोप लगते रहे हैं कि बस्तर संभाग में कनीय पुलिसकर्मियों को दरअसल बलि का बकरा बनाया जा रहा है.

शायद यही कारण है कि राज्य के लगभग 78 पुलिसकर्मी ऐसे हैं जिनका तबादला नक्सल प्रभावित इलाक़ों में हुआ है मगर उन्होंने अब तक अपना योगदान नहीं दिया है. शुक्रवार को राज्य के पुलिस मुख्यालय नें इन 78 पुलिसकर्मियों को नोटिस जारी कर जल्द से जल्द योगदान देने को कहा है, मुख्यालय के सूत्र बताते हैं कि इनमे से ज़्यादातर पुलिसकर्मियों नें अपनी या अपने परिवार में किसी की बीमारी का बहाना बनाकर योगदान देने से इंकार किया है.

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