'अयोध्या पर सुलह की गुंजाइश नहीं'

अयोध्या

राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़े अधिकांश पक्षों ने स्पष्ट कर दिया है कि अब मामले में आपसी बातचीत से सुलह की कोई गुंजाइश नहीं है.

अयोध्या विवाद से जुड़े इन पक्षों का मानना है कि हाईकोर्ट का फैसला पहली अक्टूबर को जस्टिस धर्मवीर शर्मा के रिटायर होने से पहले आ जाना चाहिए.

हाईकोर्ट ने इससे पहले 24 सितम्बर को फ़ैसले की तारीख रखी थी और रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका रद्द कर दी थी, लेकिन त्रिपाठी ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन जजों की बेंच मंगलवार को अयोध्या के राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद मुकदमे के एक प्रतिवादी रमेश चंद्र त्रिपाठी की इस अपील पर सुनवाई करेगी कि हाईकोर्ट का फैसला टाल कर पक्षकारों को सुलह सफाई का मौक़ा दिया जाये क्योंकि अदालत में एक पक्ष की जीत से देश में हिंसा भड़क सकती है.

सुलह-सफ़ाई

फ़ैसले से एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपील की सुनवाई करना मंजूर किया और सभी पक्षकारों को नोटिस देकर मंगलवार को सुनवाई के लिए बुलाया है.

केवल निर्मोही अखाड़ा इस बात के पक्ष में है कि सुलह-सफाई के लिए तीन महीने का मौक़ा और दिया जाए.

निर्मोही अखाड़ा के वकील रंजीत लाल वर्मा कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट में हमारा कहना यही होगा कि समयबद्ध तरीके से तीन महीने में समझौता वार्ता हो. विवाद को मध्यस्थता और बातचीत से हल करने की प्रक्रिया पूरी की जाए. यह प्रक्रिया असफल हो जाए तो अदालत फैसला दे-दे, लेकिन इसके लिए बहुत ज़्यादा समय नहीं दिया जाए.''

वर्मा का कहना है कि पहली अक्टूबर को रिटायर होने वाले जज जस्टिस धर्म वीर शर्मा को एक साल का सेवा विस्तार दिया जा सकता है, इस तरह के उदाहरण पहले भी मौजूद हैं.

अविलम्ब फैसला सुनाये

लेकिन हिंदुओं कि अन्य संस्थाएं निर्मोही अखाड़ा से सहमत नहीं हैं और वे चाहती हैं कि हाईकोर्ट अविलम्ब अपना फैसला सुनाये.

मुक़दमे के एक पक्षकार शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती की संस्था राम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति के प्रवक्ता किशोर कुणाल चाहते हैं कि हाईकोर्ट का फैसला रोका न जाए.

कुणाल कहते हैं, ''मै तत्काल चाहता हूँ कोर्ट का फैसला. इसके बाद वार्ता हो. वार्ता से समाधान सबसे अच्छा है. कोर्ट में तो कोई जीतेगा कोई हारेगा. पर फैसला इसलिए जरूरी है कि दोनों पक्ष जान लें कि उनके तर्क में कितना दम है.''

हिंदू महासभा, विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी पहले ही कह चुकी हैं कि पहले कई बार की बातचीत बेनतीजा रही हैं इसलिए अब बातचीत में और समय बर्बाद न किया जाए. भारतीय जनता पार्टी ने तो अपना यह आरोप भी दोहराया है कि इस मामले में पहले ही बहुत ज़्यादा अदालती देर हो चुकी है.

उधर मुस्लिम पक्ष से सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी का कहना है कि वह भी रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका खारिज करने के पक्ष में हैं.

उन्होंने कहा, ''हम सुप्रीम कोर्ट को बता देंगे कि बातचीत से मुकदमे का फैसला होने की कोई उम्मीद नही हैं. इसके बाद भी अगर आप फैसले में देरी करें तो ये आप का फ़ैसला है.''

अटार्नी जनरल की राय

Image caption मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड का कहना है कि फैसला रोका न जाए.

मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड की तरफ से भी यही दलील दी गयी है कि हाईकोर्ट का फैसला रोका न जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के अटार्नी जनरल को भी नोटिस देकर सुनवाई में बुलाया है. माना जाता है कि इस मामले में अटार्नी जनरल की राय अहम होगी. कहा जाता है कि राष्ट्र मंडल खेल, कश्मीर के बिगड़े हालात और बिहार चुनावों के कारण केंद्र सरकार नहीं चाहती कि हाईकोर्ट तुरंत अपना फै़सला सुनाये.

मुस्लिम और हिंदू दोनों पक्षकारों ने आरोप लगाए हैं कि रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका के पीछे कांग्रेस का हाथ है, जबकि कांग्रेस ने इससे इनकार किया है. कांग्रेस का कहना है कि दोनों पक्ष या तो आपसी सुलह से मामले हल कर लें या फिर कोर्ट का फैसला मानें.

इस बीच अयोध्या में बड़े पैमाने पर सुरक्षा बंदोबस्त से तीर्थ यात्रियों की संख्या बहुत कम हो गयी है. सन्नाटे से लोगों की रोजी रोटी पर भी असर पड़ रहा है

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