अयोध्या: याचिका ख़ारिज, फ़ैसला गुरुवार को

भारत के सुप्रीम कोर्ट अयोध्या मामले पर हाईकोर्ट के फ़ैसले को टालने संबंधी याचिका को ख़ारिज कर दिया है. इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तय किया है वह रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के स्थल के बारे में मालिकाना हक़ के विवाद पर 30 सितंबर को फ़ैसला सुनाएगा.

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया की अध्यक्षता में तीन जजों की पीठ ने सर्वसम्मति से हाईकोर्ट का फ़ैसला टालने संबंधी याचिका ख़ारिज कर दी.

कांग्रेस, भाजपा, आरएसएस ने फ़ैसले का स्वागत किया

इससे पहले सु्प्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा- "याचिकाकर्ताओं की दलीलों को विस्तार से सुनने के बाद हमारा मत है कि ये याचिकाएँ ख़ारिज करने लायक हैं."

फ़ैसले के बाद महंत धर्मदास के वकील रविशंकर प्रसाद ने कहा,'' सभी पक्षों की सुनवाई हुई है. ये 60 साल पुराना मामला है और आज रास्ता खुल गया है. हम सभी ने कहा था कि निर्णय होना चाहिए. किसी पार्टी को आपत्ति होगी तो वो सुप्रीम कोर्ट जा सकता है. हमें इस देश के नागरिकों की परिपक्वता पर विश्वास करना चाहिए जिन्हें देश की न्याय प्रक्रिया पर भरोसा है.''

सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा,'' अब हाईकोर्ट के लिए रास्ता खुल गया है क्योंकि याचिका रद्द कर दी गई है.'' सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील ने कहा कि सुन्नी वक्फ़ बोर्ड इस याचिका के ख़ारिज होने से बहुत ख़ुश है.

विभिन्न पक्ष, क़ानूनी विशेषज्ञ संतुष्ट

इसके पहलेसुप्रीम कोर्ट में एटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए कहा था कि सरकार किसी भी तरह की अनिश्चितता की स्थिति नहीं चाहती है.

वाहनवती का कहना था,'' हम समझौते का स्वागत करेंगें. लेकिन हम अनिश्चितता की स्थिति के पक्ष में नहीं हैं. हम सुप्रीम कोर्ट के 1984 के फ़ैसले से बंधे हुए हैं जिसके तहत विवादित स्थल को सरकार की देखरेख में दिया गया था. साथ ही सरकार से कहा गया था कि जिसके भी पक्ष में फ़ैसला होता है, सरकार ज़मीन उसके सुपुर्द कर, फ़ैसले को लागू करे.''

अखिल भारतीय हिंदू महासभा के चक्रपाणि ने बताया कि उनके वकील ने अदालत में दलील दी थी कि ये विवाद लंबे अर्से से चल रहा है और याचिकाकर्ता फ़ैसले में व्यवधान उत्पन्न करना चाहता है.

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हिंदू महासभा की ओर से अदालत को आश्वासन दिया गया था कि हाई कोर्ट के फ़ैसले से कोई वैमनस्य उत्पन्न नहीं होगा.

दरअसल रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक़ विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय 24 सितंबर को आना था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने रमेशचंद्र त्रिपाठी की याचिका के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी थी.

अयोध्या मुक़दमे के एक प्रतिवादी रमेश चंद्र त्रिपाठी की दलील थी कि हाईकोर्ट का फ़ैसला टाल कर पक्षकारों को सुलह सफाई का मौक़ा दिया जाए.

उनका कहना था कि अदालत में एक पक्ष की जीत से देश में हिंसा भड़क सकती है.

अटका हुआ फ़ैसला

इससे पहले राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़े लगभग अधिकांश पक्षों ने साफ़ कर दिया था कि अब मामले में आपसी बातचीत से सुलह की कोई गुंजाइश नहीं है.

Image caption अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया था

दरअसल अयोध्या विवाद से जुड़े पक्षों का मानना है कि हाईकोर्ट का फैसला पहली अक्टूबर को जस्टिस धर्मवीर शर्मा के रिटायर होने से पहले आ जाना चाहिए.

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हाईकोर्ट ने इससे पहले 24 सितंबर को फ़ैसले की तारीख़ तय की थी और रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका रद्द कर दी थी, लेकिन त्रिपाठी ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी थी.

हालांकि मामले से जुड़ा एक पक्ष निर्मोही अखाड़ा फैसला टालने का पक्षधर रहा है. जबकि सुन्नी वक्फ़ बोर्ड की राय थी कि अयोध्या विवाद पर फ़ैसला सुना दिया जाना चाहिए.

हिंदू महासभा, विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी पहले ही कह स्पष्ट कर चुके हैं कि कई बार की बातचीत बेनतीजा रही हैं इसलिए अब बातचीत में और समय बर्बाद न किया जाए.

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