फ़ैसला राजनीतिक है: क़ानूनी विशेषज्ञ

अयोध्या
Image caption अयोध्या के विवादित जगह का फ़ैसला आस्था के सवाल पर नहीं हो सकता

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने अयोध्या के विवादित स्थल को लेकर जो फ़ैसला दिया है वह राजनीतिक है, क़ानूनी नहीं.

सुप्रीम कोर्ट में यदि काबिल जजों के सामने यह फ़ैसला जाता है, तो ख़ासी संभावना है कि यह फ़ैसला उलट जाएगा. इस फ़ैसले का कोई आधार नहीं है.

विवादित ज़मीन के मालिकना या क़ानूनी हक़ किसके पास है वह इस बात से तय नहीं किया जा सकता कि रामचंद्र जी का जन्म कहाँ हुआ था, जन्म को लेकर लोगों में आस्था है या नहीं, चार सौ या पाँच सौ साल पहले वहाँ मंदिर था या नहीं.

आज इन बातों से मालिकाना हक़ का सवाल तय नहीं किया जा सकता. चार सौ, पाँच सौ साल पहले मंदिर था या नहीं उस बात से मालिकाना हक़ नहीं तय किया जा सकता.

कानून ये कहता है कि 30 साल से यदि किसी और का उस ज़मीन पर कब्ज़ा है और 30 साल तक आप उस पर अपना हक़ नहीं जता पाए तो आपका हक़ उस पर से ख़त्म हो जाता है.

ये सब सवाल क़ानून के नज़रिए से अप्रासंगिक है अदालत में ये सारे सवाल उठने ही नहीं चाहिए थे.

किसी की भवना के नज़रिए से यह एक सवाल भले हो, लेकिन अदालत की नज़र में यह सवाल नहीं है.

रामचंद्र जी का जन्म वहाँ हुआ था या नहीं इसका ज़मीन के मालिकाना हक़ से क्या लेना देना? यदि राजनीतिक फ़ैसला होता तो वे भले ही इस बात का ध्यान रखते, लेकिन ज़मीन को तीन हिस्सों में बांटने का फ़ैसला आधारहीन है.

(बीबीसी संवाददाता बृजेश उपाध्याय से बातचीत पर आधारित)

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