अदालत में फ़ैसले की कार्रवाई शुरू

लखनऊ की सड़कें
Image caption फ़ैसला आने से पहले लखनऊ की सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ है

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच आज देश भर में अभूतपूर्व सुरक्षा बंदोबस्त के बीच अयोध्या के राम जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद के चार मुक़दमों पर अपना फैसला सुना रही है.

मुकदमें से जुड़े वकील और उनके मुवक्किल कोर्ट नंबर 21 में फैसला सुनने के लिए अंदर जा चुके हैं.

फ़ैसले के बाद तीनों जजों के फ़ैसलों की एक एक प्रति मीडिया को सौंप दी जाएगी.

अदालत को चारों मामलों में विवाद के कुल सौ से अधिक बिंदुओं पर अपना फैसला देना है.

भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में यह न केवल साठ साल तक यानि सबसे लंबा चलने वाला, बल्कि एक ऐसा विवाद है, जिसके चलते देश में कई बार राजनीतिक और सामाजिक उथल - पुथल हो चुकी है, क्योंकि यह मामला ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े नहीं बल्कि हिंदू–मुस्लिम दोनों समुदायों की धार्मिक आस्थाओं और संविधान के मूल सिद्धांतों से जुड़ा है.

चारों मुकदमों में कुल मिलाकर लगभग तीस पक्षकार हैं, जिन्होंने न केवल मौखिक बल्कि दस्तावेजी सबूत, क़ानूनी, धार्मिक और साहित्यिक पुस्तकों से हज़ारों पन्नों के उद्धरण दिए हैं.

अदालत ने मामले की तह में जाने के लिए पहली बार पुरातत्व सर्वेक्षण से खुदाई करवाकर एक विशेषज्ञ रिपोर्ट भी प्राप्त कर ली, जिसमे कहा गया है कि ज़मीन के अंदर 11 वीं शताब्दी में उत्तर भारत में पाए जाने वाले मंदिरों जैसे विशिष्ट अवशेष मिले हैं.

किसी मुक़दमे के सिलसिले में पहली बार इस तरह पुरातत्व विभाग की मदद ली गई है.

इस विवाद को आपसी सहमति से सुलझाने की कई कोशिशें बेकार हो चुकी हैं. अब पूरे देश में लगभग आम सहमति है कि हाईकोर्ट दोनों के दावों पर अपना फ़ैसला सुना दे.

माना जाता है कि यह फैसला इस मामले का एक अहम कानूनी पड़ाव होगा , अंतिम निर्णय नही, क्योंकि इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील का विकल्प खुला रहेगा.

लेकिन आज जब फ़ैसला आएगा तब मुक़दमे के प्रारंभ से जुड़े अनेक व्यक्ति उसे सुनने के लिए जीवित नही हैं. उनके उत्तराधिकारी अब अपने बाप दादों के मुक़दमे का फैसला सुनेंगे.

संयम की अपील

Image caption जयपुर में सभी धर्मों के प्रतिनिधियों ने शांति मार्च में हिस्सा लिया.

मुक़दमा लड़ने वाले दोनों पक्षों, उनके समर्थकों, धार्मिक सामाजिक नेताओं राजनीतिक दलों, केंद्र और राज्य सरकारों ने लोगों से हर हाल में संयम बनाए रखने और जीत या हार पर अपनी भावनाएं सार्वजनिक तौर पर प्रकट न करने की अपील की हैं.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बुधवार को लोगों से अदालत के फ़ैसले को स्वीकार करने और शांति बनाए रखने की अपील की है.

सोनिया गांधी ने कहा, "हम जानते हैं कि इस संवेदनशील मुद्दे पर न्यायापालिका की निष्पक्षता पर भरोसा जताते हुए लगभग सारे देश ने अदालत के फ़ैसले को स्वीकार करने की इच्छा ज़ाहिर की है."

प्रशासन ने एहतियातन आतिशबाजी और शराब की दुकानों को बंद रखने के आदेश दिए हैं.

संभवतः पहली बार मीडिया से जुड़े संगठनों ने भी समाचार कवरेज में सावधानी और संयम के लिए विशेष दिशा निर्देश जारी किये हैं. इसलिए न केवल भारत बल्कि विदेशों में भी लोग सांस रोक कर फैसले का इंतज़ार कर रहे हैं.

फ़ैसले के कारण एक बार फिर कहीं साम्प्रदायिक टकराव न हो, इसलिए न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे भारत में शान्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिए हज़ारों की तादाद में पुलिस और अर्धसैनिक बल सुरक्षा के लिए लगाए हैं.

कड़ी सुरक्षा

Image caption देश भर में और विशेषकर उत्तर प्रदेश में सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं.

इन बलों ने अपने अपने इलाकों के रास्ते पहचानने और लोगों को भरोसा दिलाने के लिए फ्लैग मार्च किया है. अधिकारियों का कहना है कि आंतरिक सुरक्षा में मदद के लिए भारतीय सेना और वायु सेना भी तैयार है. ऊपर से हालत सामान्य लगते हैं, लेकिन अंदर से लोग सहमे हुए हैं.

अयोध्या के हर गली कूचे में फ़ोर्स तैनात होने के बावजूद प्रशासन हेलीकाप्टरों के जरिये आसमान से भी निगाह रख रहा है.

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से मुख्यमंत्री मायावती ने देर रात एक बयान जारी करके केंद्र पर आरोप लगाया है कि सुरक्षा व्यवस्था के लिए अर्ध सैनिक बालों की 642 कम्पनियाँ मांगी गयी थीं, जबकि केवल 52 उपलब्ध कराई गयी हैं. इसलिए फ़ोर्स की कमी से अगर कोई गडबडी होती है तो इसके लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार होगी.

Image caption अयोध्या में कोने-कोने सुरक्षा बल तैनात हैं.

ख़बरों के अनुसार केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार सतीश चंद्र मिश्र को फ़ोन कर हर सहायता देने आश्वासन दिया है. चिदम्बरम के अनुसार उत्तर प्रदेश में विभिन्न पुलिस बलों के एक लाख नब्बे हजार जवान तैनात किए गए हैं.

राजधानी लखनऊ में हाईकोर्ट के दोनों ओर की सड़कों की बैरीकेडिंग कर दी गयी है. केवल उन्ही वकीलों और मुवक्किलों को हाईकोर्ट परिसर में जाने की अनुमति होगी, जिनके मुक़दमों की तारीख़ आज लगी है.

फ़ैसले को लेकर कोई अफ़वाह न फैले इसलिए है हाईकोर्ट कोर्ट के पास ही ज़िला कलेक्ट्रेट में एक मीडिया सेंटर बनाया गया है. हाईकोर्ट प्रशासन ने फ़ैसले का सारांश तुरंत इन्टरनेट वेब साईट पर डालने का इंतज़ाम किया है.

मुसलमान पक्ष के वकीलों की अपील

मुसलमान गुटों की ओर से मुक़दमा लड़ने वाले तीन वरिष्ठ वकीलों ज़फ़रयाब जिलानी, मुश्ताक़ अहमद सिद्दिकी और सैय्यद इरफ़ान अहमद ने एक लिखित बयान जारी करके कहा है कि आज का दिन अपने देश के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के लिए एक ऐतिहासिक दिन है.

बयान में आगे कहा गया है कि इस जजमेंट से संविधान के मूलभूत तत्त्वों को मज़बूती मिलेगी और न्यायपालिका और क़ानून के शासन पर आम लोगों, विशेषकर अल्पसंख्यकों का विश्वास बढ़ेगा.

अदालत में मुसलमान पक्ष के वकीलों ने अपने बयान में कहा है ये केस दो समुदायों के बीच का नहीं है बल्कि देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरुप का मामला है.

बयान में कहा गया है, "इस मामले में भगवान राम का व्यक्तित्व कतई किसी विवाद में नहीं है जिन्हें अल्लामा इक़बाल जैसे कवियों ने इमाम-ए-हिंद की पदवी दी थी. ये विवाद बाबर के शासन से भी संबंधित नहीं है जिसने इब्राहीम लोधी को हराकर देश पर अपना शासन स्थापित किया था."

और अंत में उन्होंने अपील की है कि फ़ैसला चाहे किसी के पक्ष हो, कोई ख़ुशी या ग़म प्रकट करने की ज़रुरत नहीं क्योंकि हारने वाले पक्ष के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का मौक़ा खुला हुआ है.

इस बयान के अंत में इस बात का ख़ास ज़िक्र है कि बाबरी मस्जिद के दावे के समर्थन में अनेक हिंदु इतिहासकारों, वकीलों और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने मदद की.

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