दलित तज रहे हीनता सूचक नाम

रैली
Image caption भारत का दलित समुदाय लंबे समय तक हीन नामों की पालकी ढोता रहा था

उत्तर भारत के दलित समाज में बच्चों के नामकरण में बड़ा परिवर्तन आया है. दलितों ने अपने अधिकारों के प्रति चेतना के साथ हीनता सूचक नामों को तिलांजलि दे दी है.

अब वे अपने बच्चों का नामकरण ख़ुद करते हैं. इसलिए अब दलित बच्चों के नाम वैसे ही मनभावन हैं जैसे ऊँची जातियों के.

दलित कार्यकर्ता कहते हैं कि पहले वे नाम के लिए पुरोहितों पर निर्भर रहते थे, इसलिए उनके हिस्से ख़राब नाम आते रहे हैं.

मगर पुरोहित कहते हैं कि इसके लिए पंडित -पुरोहित को दोष देना ठीक नहीं है.

हिन्दू समाज में मंत्रोच्चार और धार्मिक विधि-विधान के बीच नवजात का नामकरण किया जाता रहा है.

मगर जब नामों का बँटवारा होता है तो ना जाने क्यों दलित के हिस्से ऐसे नाम आते हैं जो हीनता का बोध कराते हैं.

कोई ऊँची जात का है, उम्रदराज़ है, तो भी उसे सत्तर साल की आयु हो जाने पर भी ‘नवीन’ नाम से पुकारा जा सकता है.

लेकिन दलित के घर पैदा हुआ नवजात, दुनिया के लिए नवीन है.

मगर उसे नाम मिला बोदू राम. बोदू यानि पुराना.

दलित का बच्चा सुंदर सलोना है, लेकिन उसे नाम मिला कोजा राम, कोजा यानि बदसूरत या कुरूप.

पर ये ही नाम ऊँची जात तक जाते जाते स्वरूप हो जाता है.

इन हीन नामों की पालकी ढोते रहे दलितों ने अब इससे मुक्ति पा ली है.

बदलाव

Image caption दलित समुदाय हाल के वर्षों में अपने अधिकारों को लेकर काफ़ी सचेत हुआ है

जयपुर जिले में चक्वाडा के दलित कार्यकर्ता बदुलाल कहते है,”हाल के वर्षो में बड़ा बदलाव आया है.हम अब नाम के लिए दलित पंडे-पुरोहितों के पास नहीं जाते. इसलिए अब हमारे बच्चों के नाम मुकेश, सुरेश, अमित और विवेक जैसे मिलेंगे.

"पहले ऐसा नहीं होता था. हमारे बच्चो को कजोड़,गोबरी लाल,नात्या और धूलि लाला जैसे नाम दिए जाते थे. अब कोई नाम से ये नहीं पहचान नहीं सकता है कि ये दलित है. सरनेम पता लगने के बाद तो और बात है.लेकिन नाम से पता नहीं किया जा सकता है."

हिन्दू नामों की फेहरिस्त कहती है पुरुषार्थ और शौर्य से जुड़े नाम क्षत्रिय लोगो के लिए आरक्षित हैं.

मसलन पराक्रम सिंह,संग्राम सिंह ,युद्धवीर सिंह जैसे नाम शासक जातियों के लिए तय हो गए .

समाज के निचले हिस्से को नाम के साथ कभी 'सिंह' नसीब नहीं हुआ.

मगर क्षत्रिय जाति में शेर-सिंह, यानी एक ही व्यक्ति अपने नाम में दो-दो शेर लगा सकता है.

व्यापार करने वाली जातियों ने ऐसे नाम चुने जो अर्थशास्त्र का आभास कराते हों - जैसे लाभचंद,धनराज और लक्ष्मी नारायण.

फिर बुद्धिमता की बात आई तो विवेक ध्वनित करने वाले नाम विप्र लोगो ने अपने साथ रख लिए.

आधार

जयपुर में धर्म शास्त्रों के ज्ञाता कलानाथ शास्त्री हिन्दू धर्म में नाम रखने के आधारों के बारे में जानते है .

वो कहते हैं,”नामकरण के तीन आधार हैं. एक तो ये कि नाम का पहला अक्षर वो हो जो उसके नक्षत्र के अनुरूप हो. दूसरा जो आस्तिक है वो अपने आराध्य भगवन और देवता के नाम पर अपने बच्चो का नाम रखते है जैसे कृष्ण को मानने वाले अपने संतान का नाम किशन रख लेते है.

तीसरा सिद्धांत है माता-पिता बच्चे की जैसी परिकल्पना करते हैं वैसा ही नाम रख लेते है. चौथा आधार अन्धविश्वासों पर टिका है. इसमें माँ-बाप को लगता है कि बच्चे के ग्रह ठीक नहीं हैं, लिहाजा कजोड़ी लाल जैसे नाम रख लेते हैं. उन्हें भरोसा होता है कि बुरे नाम रखने पर ग्रह टल जाएगा.

मगर शास्त्रों में अच्छा आधार बताया गया है कि नाम या तो देवता के नाम पर या फिर प्राक्रतिक ऋषि मुनियों के नाम पर हो. हाँ इतना जरूर कहा गया कि क्षय मूलक नाम नहीं होने चाहिए.

भारत में ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित साहित्य का बड़ा नाम है. मैंने उनसे पूछा दलितों के नाम घसीटा, गोबरी लाल और, घासी जैसे क्यों होते हैं.

श्री वाल्मीकि कहते हैं,"ये नाम ऐसे इसलिए होते हैं क्योंकि हमने नहीं रखे ,हमें ऐसे नाम के लिए बाध्य किया गया. अगर हमने किसी का नाम झंडा सिंह रखा तो उसे झंडु कर दिया गया. आज करके बताए, आज मेरा नाम बदल कर बताए.

"मैंने जान बूझकर वाल्मीकि उपनाम रखा .ताकि मेरी जात कोई ना पूछे. अगर मैं न लिखता तो ढूँढ़ कर पूछते कि तुम जाति से कौन हो. वे एक्स-रे मशीन लगा लगा कर ढूंढते हैं किस जाति के हो."

अंग्रेज़ी के नामी कवि शेक्सपियर ने कभी कहा था कि नाम में क्या रखा है. वो भारत में होते तो कहते नाम में सब कुछ रखा है.

जयपुर में एक दलित विद्यार्थी प्रीति कहती है," नाम बदल गया तो क्या. अब हर जगह आपका जाति नाम या सरनेम पूछा जाता है.

"जब मैं प्रीति नाम बताती हूँ तो पूछते है आगे क्या लगाती हो, वो सरनेम जानना चाहते हैं."

बचाव

ज्योतिष मंथन के संपादक सतीश शर्मा कहते हैं हीनता बोधक नामों के लिए पुरोहित या पंडितों को दोष देना ग़लत है.

वे कहते हैं,''विप्र कही जाती व्यवस्था को पुष्ट करने के लिए तो ज़िम्मेदार कहे जा सकते हैं, मगर ऐसे नामों के लिए उन्हें दोष देना ठीक नहीं है. दरसल कुछ जातियों में हीनता का भाव भरा है. अब उसमें सुधार आ रहा है.

"मेरे पास कई दलित माता-पिता अपने बच्चों के नामकरण के लिए आते है, हम कभी ऐसे नहीं सोचते कि कौन किस जाति से है. हम कभी जाति के आधार पर नाम में भेद नहीं करते हैं."

समाज ने जब संसाधनों का बँटवारा किया तो दलित के हिस्से जमीन का टुकड़ा नहीं आया. रिहाईश का मौक़ा आया तो उसे गाँव से बाहर बसेरा मिला. मंदिरों में भी उसे आखिरी छोर में ठौर मिला.

सदियों से उसके हिस्से ऐसे नाम आते रहे जो दासता का भाव भरते थे. अब वो बीती बात है क्योंकि दलित अपनी हस्ती और हैसियत ख़ुद बनाने लगा है.

संबंधित समाचार