मौक़ा तलाश करने वाला गठबंधन

Image caption लालू, पासवान--कितने पास, कितने दूर?

जब कर्पूरी ठाकुर जीवित थे तो रामविलास पासवान को हमेशा शिकायत होती थी कि कर्पूरी ठाकुर क्यों उन्हें प्रमोट नहीं करते. क्यों नहीं उन्हें एक दलित मुख्यमंत्री के रुप में प्रस्तुत किया जाता. रामविलास पासवान युवा थे, प्रतिभाशाली थे और रिकॉर्ड वोटों से जीतकर लोकसभा में पहुँचे थे. इस तरह से उनकी शिकायत सही थी.

यह समझने की ज़रुरत है कि रामविलास पासवान की शिकायत आख़िर क्या थी. दरअसल वो लालू प्रसाद यादव की शिकायत कर रहे थे. वो कहना चाह रहे थे कि उन्हें लालू की तरह क्यों नहीं प्रस्तुत किया जाता.

इस तरह से देखें तो लालू और रामविलास कभी स्वाभाविक मित्र नहीं रहे.

वे एक साथ छात्र आंदोलन में काम करते रहे लेकिन व्यक्तित्व की टकराहट तब भी दिखाई देती रही. यह टकराहट आज भी दिखाई देती है--राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और लोकजनशक्ति पार्टी (लोजपा) के गठबंधन के बावजूद.

गठबंधन

जहाँ तक लालू का सवाल है तो वे नीतीश से अलग होने के बाद पहली बार सहज महसूस कर रहे हैं क्योंकि उसके बाद से पहली बार कोई मज़बूत नेता उनके साथ खड़ा है.

लालू की मजबूरी थी कि वे पासवान को अपने साथ लें क्योंकि अगर पासवान कांग्रेस के साथ चले जाते तो लालू मुश्किल में पड़ जाते. हो सकता था कि अकेले चुनाव में जाने पर लालू की पार्टी का प्रदर्शन पिछले चुनाव से भी बुरा होता.

लेकिन धीरे-धीरे पासवान इतने प्रभावशाली हो गए हैं कि लालू किसी मीटिंग में उनसे छोटे भाई की तरह व्यवहार नहीं कर पाते. उन्हें पासवान को एक बड़े और बराबरी के नेता के रुप में ही संबोधित करना पड़ता है.

Image caption "लालू की राजनीतिक बुनावट में गंभीरता नहीं रही है."

जहाँ तक पासवान का सवाल है तो वे इस गठबंधन में रहने के बावजूद अपनी सारी पूंजी लालू के हवाले नहीं करना चाहते. वे लालू को इतनी छूट नहीं देना चाहते कि प्रचार के दौरान लालू उनका जैसा चाहें उपयोग करने लगें.

तो यह गठबंधन एक निश्चित दूरी बनाकर मित्रता निभाने और अपनी-अपनी शर्तों के साथ साथ चलने जैसा है. दिल खोलकर एक दूसरे से मिलने वाली बात नहीं है.

यह बात जनता को भी समझ में आ रही है. जनता जब महसूस करती है कि दोनों दल भविष्य में अलग-अलग भी हो सकते हैं तो वह गठबंधन को शंका की नज़र से देखती है. ख़ासकर तब जब जदयू और भाजपा की गठबंधन सरकार बिना किसी समस्या के पाँच साल चल चुकी हो तो ऐसे किसी अस्थाई गठबंधन पर भरोसा जगाना थोड़ा कठिन दिखता है.

जहाँ तक इस गठबंधन की राजनीतिक ताक़त का सवाल है तो एक बात यह है कि इस गठबंधन ने नीतीश कुमार को चिंतित ज़रुर किया है.

अगर ये दोनों अलग-अलग होते तो नीतीश दोनों को निपटा लेते. लेकिन अब मामला आसान नहीं है. डर है कि अब मतों का ध्रुवीकरण हो सकता है. मुसलमान-यादव (एम-वाई) के साथ अब दलित भी आ सकते हैं.

राजनीतिक व्यक्तित्व

मैं यह बात बिल्कुल भी नहीं मानता कि लालू का कोई बहूत बड़ा राजनीतिक क़द रहा है. लालू की राजनीतिक बुनावट में गंभीरता कभी नहीं रही.

शायद यही कारण है कि लोकसभा में लगभग बराबरी की ताक़त होने के बावजूद जब कभी किसी ग़ैर-कांग्रेसी राजनीतिक गठबंधन में प्रधानमंत्री बनाने की बात आई तो मुलायम सिंह यादव का नाम तो उभरा लेकिन लालू का नाम कभी नहीं आया.

लालू का नाम राष्ट्रीय स्तर पर किसी बड़े नेता के रुप में किसी ने स्वीकार नहीं किया. वे अपनी संख्याबल के बावजूद अपने आपको गंभीर राजनीतिक व्यक्तित्व के रुप में स्थापित ही नहीं कर पाए. राष्ट्रीय राजनीति में गंभीरता की ज़रुरत होती है, वहाँ हँसी ठठ्ठा से काम नहीं चलता.

लालू ने बिहार की राजनीति में भी यह गंभीरता नहीं दिखाई. यह सवाल पूछा जा सकता है कि ऐसे में कैसे वे 15 साल तक सरकार में बने रहे तो मुझे लगता है कि कई बार लोग अपने शौक को पेशा बना बैठते हैं उसी तरह लालू के चुटकी लेने वाली बातें सुनकर लोगों ने उन्हें एकाधिक बार जितवा दिया.

लेकिन अब वहाँ बातें अलग हैं. पिछले पाँच सालों में बिहार में वोट देने वालों की एक पूरी पीढ़ी बदल गई है. अब कंप्यूटर और इंटरनेट चलाने वाले और अर्थव्यवस्था के समीकरण समझने वाले लोगों को वोट देना है. ऐसे में नीतीश से तुलना करके देखें तो लालू ने अपने आपको ज़्यादा नहीं बदला है. हो सकता है कि लालू को इसका नुक़सान हो.

पिछला चुनाव हारने के बाद लालू चुप नहीं बैठे हैं. उन्होंने बहुत काम किया है. उपचुनावों के नतीजे इसका गवाह हैं. यह काम उनको इन चुनावों में भी फ़ायदा दिला सकता है.

Image caption कंप्यूटर और इंटरनेट पीढ़ी के हिसाब से नीतीश ने जैसे अपने को तैयार किया है, लालू उसमें पिछड़े हुए हैं.

जहाँ तक रामविलास पासवान का प्रश्न है तो वे बिहार के सबसे बड़े दलित नेता हैं यह हर कोई जानता है. लेकिन इतिहास ने उन्हें बार-बार मौक़ा दिया कि वे अपने आपको राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित कर लें लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके.

बाबू जगजीवन राम की जो जगह ख़ाली हुई थी उस स्थान को भरने के लिए पासवान एक उचित व्यक्ति थे लेकिन वे असफल रहे. इसकी वजह शायद यह रही कि एक तो उनकी कार्यशैली में वैसी जनपक्षधरता नहीं थी और दूसरे उनका दृष्टिकोण उतना बड़ा नहीं था.

लेकिन बिहार में उनकी राजनीतिक ज़मीन मज़बूत है इससे कोई इनकार नहीं कर सकता.

भविष्य

लालू-पासवान का या कहें कि राजद-लोजपा का गठबंधन सिर्फ़ बिहार का गठबंधन है. इसका कोई अस्तित्व बिहार के बाहर नहीं है.

इस गठबंधन का कोई भविष्य भी नहीं दिखता.

दोनों नेता सोच रहे हैं कि अगर चुनाव परिणाम अच्छे आ गए तो ये कांग्रेस के साथ मोलभाव करके सरकार बनाने का प्रयास कर सकते हैं.

अब राजनीति में एक बड़ा बदलाव दिख रहा है और पार्टी की बजाय बात व्यक्तित्व पर आ रही है. गुजरात में भाजपा छह के छह नगर निकायों में फिर से जीतकर आ गई है. यह भाजपा का नहीं नरेंद्र मोदी का प्रभाव है.

बिहार में जो लोग पासवान को वोट देते हैं, हो सकता है कि वे उनकी पार्टी लोकजनशक्ति पार्टी को जानते भी न हों.

ऐसे में पार्टियों का गठबंधन कितना कारगर होगा यह देखना होगा.

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