राम जन्म स्थान पर जजों का फ़ैसला

Image caption विवादित स्थान पर भगवान राम के जन्म स्थान को लेकर जजों ने फ़ैसले में विस्तार से व्याख्या की है

अयोध्या मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ का फ़ैसला आने के कई दिनों बाद भी लोगों में फ़ैसले को लेकर बड़ी उत्सुकता है.

आखिर बेंच के तीनों जज किस सबूत के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि राम कोट इलाक़े में लगभग 1500 वर्ग मीटर का वह विवादित स्थल और विशेषकर बीच वाले गुम्बद के नीचे ही भगवान राम का जन्म स्थान है.

जस्टिस एस यू खान ने अपने जजमेंट के पेज 232 पर सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी द्वारा अदालत में 22 अप्रैल 2009 को सिविल प्रोसीजर कोड के तहत दर्ज कराये गए एक बयान का उल्लेख किया है जिसमें जिलानी ने कहा कि मुस्लिम पक्ष इस बात पर आपत्ति नहीं कर रहे हैं कि भगवान राम अयोध्या में पैदा हुए थे.

उनकी आपत्ति सिर्फ इस बात में है कि भगवान राम विवादित परिसर में पैदा हुए थे. उसी रोज अन्य मुस्लिम पक्षकारों की और से एमए सिद्दीकी और सैयद इरफ़ान अहमद ने भी ऐसे ही बयान दर्ज कराए.

जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने अपने जजमेंट के पैरा 4394 में एक 'महत्वपूर्ण' दस्तावेज का उल्लेख किया है जो अयोध्या निवासी मोहम्मद असगर द्वारा 30 नवंबर सन 1858 को प्रशासन को लिखा गया पत्र है. इस पत्र में उन्होंने कहा है कि विवादित मस्जिद के भीतरी आँगन में हिंदू लोग सैकड़ों साल से पूजा करते रहे हैं.

जन्म स्थान

अगले पैराग्राफ में जस्टिस अग्रवाल कहते हैं, ''भगवान राम का जन्म स्थान अयोध्या में कहीं और नहीं खोजना है, बल्कि वह विवादित परिसर या आसपास ही है.''

जस्टिस अग्रवाल के अनुसार मुस्लिम पक्ष ने यह बताने का प्रयास किया है कि राम जन्म स्थान मंदिर विवादित परिसर में न होकर उसके बगल उत्तर दिशा में 200 मीटर पर स्थित एक दूसरा मंदिर है.

इस संबंध में जस्टिस अग्रवाल ने मुक़दमे में मुस्लिम पक्षों के ही एक लिखित वक्तव्य का हवाला दिया है.

थार्नटन के गजेटियर में डाक्टर बुकानन के हवाले से दर्ज है कि वहाँ स्थित खंडहर को लोग अब भी रामगढ़ या राम का किला मानते हैं. यह भी कहा गया कि राम के स्वर्गारोहण के बाद अयोध्या वीरान हो गई.

वहाँ जंगल उग आए और उज्जैन के विक्रमादित्य ने ईसा युग प्रारम्भ होने से पचास साल पहले उसे पुनः बसाया और तीन सौ मंदिर बनाए.

तीनों जजों ने गजेटियर के उस अंश का विशेष उल्लेख किया है, जिसमें लिखा है कि विवादित परिसर में जमीन से पांच या छह इंच उठा एक चौकोर पत्थर है जिसकी हिंदू तीर्थ यात्री बहुत इज्जत करते हैं और जिसे विष्णु के सातवें अवतार राम के जन्म का स्थान / पालना माना जाता है.

जस्टिस खान के सवाल और उत्तर

Image caption सभी जज इस बात से सहमत हैं कि अयोध्या भगवान राम का जन्म स्थान था

इन तमाम विवरण का उल्लेख करते हुए जस्टिस खान अपने फ़ैसले में जन्म स्थान को लेकर कई सवाल उठाते हैं और फिर स्वयं ही उनका उत्तर देते हैं.

वह कहते हैं कि सामान्य रूप से जन्म स्थान का मतलब उस गाँव, कस्बे या शहर से होता है जहां किसी का जन्म होता है.

जस्टिस खान लिखते हैं, ''बहस के दौरान हिंदू पक्षों के वकीलों से पूछा गया कि उनके अनुसार जन्म स्थान या जन्म भूमि का क्या मतलब है? क्या यह वह स्थान है जहां भगवान राम की माँ कौशल्या ने उन्हें जन्म दिया ( वह पांच या दस वर्ग मीटर की बहुत छोटी जगह होगी.) या फिर इससे उस कमरे से मतलब है जहां जन्म हुआ या फिर इसका मतलब उस महल से है जहां भगवान राम की माँ रहती थीं. कोई भी वकील इस सवाल का कोई सटीक उत्तर नहीं दे सका.''

जस्टिस खान आगे लिखते हैं, "राजा दशरथ एक सम्राट थे. पुराने जमाने में जमीन की इतनी मांग नही थी. कई किताबों और गजेटियर्स में लिखा है कि राजा दशरथ का किला बहुत बड़ा था. भगवान राम की माँ उनकी तीन या चार रानियों में सबसे प्रिय थीं. इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि वह केवल 1500 वर्ग गज के महल में रहती थीं.''

जस्टिस खान के अनुसार, "केवल एक बात का अनुमान लगाया जा सकता है और यह एक सदियों पुराने मामले का पता लगाने में एक सुविचारित अनुमान होगा कि आम हिंदू एक बड़े इलाक़े को भगवान राम का जन्म स्थान मानते थे. वे मानते थे कि उसी बड़े इलाके में भगवान राम पैदा हुए. लेकिन वे जन्म स्थान का ठीक - ठीक पता लगाने में असमर्थ थे. और उस बड़े इलाक़े में कई मदिरों के खँडहर थे और उन्हीं में से किसी एक छोटे स्थान पर बाबर ने प्रश्नगत मस्जिद का निर्माण कराया."

केन्द्रीय गुम्बद के नीचे

जस्टिस खान कहते हैं कि कई हिंदुओं और कुछ मुसलमानों के बयानों में (जिनका विवरण ब्रदर जस्टिस सुधीर अग्रवाल के फ़ैसले में है ) यह बात आई है कि हिंदू विश्वास करते हैं कि भगवान राम के जन्म स्थान का सबसे सुनिश्चित स्थान मस्जिद के केन्द्रीय गुम्बद के नीचे है.

जस्टिस खान की बात को आगे बढ़ाते हुए जस्टिस सुधीर अग्रवाल कहते हैं कि 1992 में मिले एक शिला लेख में, बाबर के आने से बहुत पहले, गहड़वाल शासकों द्वारा ग्यारहवीं या बारहवीं शताब्दी में अयोध्या में विष्णु हरि मंदिर बनवाने का उल्लेख है.

सिक्ख धर्म का हवाला देते हुए जस्टिस अग्रवाल ने लिखा है, "सन 1510 अथवा 1511 में गुरु नानक देव ने अपनी अयोध्या यात्रा में राम जन्म स्थान के दर्शन का उल्लेख किया है. इसके बाद ब्रिटिश व्यापारी विलियम फिंच ने सन 1608 में जिक्र किया है कि वहाँ राम का किला खंडहर हो गया था, फिर भी लोग एक विशेष स्थान पर जाकर पूजा करते थे."

जस्टिस अग्रवाल के अनुसार, इससे एक बात साबित है कि लोग उसे राम जन्म स्थान मानते हुए उसकी पूजा करते थे.

इसके बाद वह 1766-71 में आस्ट्रिया से आए पादरी का हवाला देते हैं, जिनकी किताब लैटिन भाषा में छपी थी और अदालत के आदेश से उसका अंग्रेजी अनुवाद हुआ.

टीफेनथेलर की किताब

टीफेनथेलर की किताब का हवाला देते हुए जस्टिस अग्रवाल कहते हैं कि उन्हें स्थानीय लोगों ने साफ़-साफ़ बताया था कि विवादित इमारत एक मंदिर को तोड़कर बनायी गयी जिसे लोग राम जन्म स्थान मानते थे.

जस्टिस अग्रवाल कहते हैं, "किसी से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह आज की तरह ठीक-ठीक निवास स्थान के पते की तरह भगवान राम के जन्म स्थान को खोज देगा, लेकिन हमें उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के अंदर तर्कसंगत और विश्वसनीय तरीके से निर्णय करना है जो असंभव भी नहीं है."

जस्टिस अग्रवाल कहते हैं कि अगर केवल दो ऐसे शिलालेखों के आधार पर यह इतिहास लिखा जाता है कि विवादित इमारत मीर बाकी ने 1528 में बनवायी थी, जिनके बारे में कोई नहीं जानता कि स्वयं मीर बाकी ने लगवाई थी या बाद में किसी ने जालसाजी करके, तो फिर ढाई सौ साल पहले एक ऐसे व्यक्ति द्वारा लिखी बात पर विश्वास क्यों न किया जाए, जो स्थानीय भाषा से भलीभांति परिचित था और वह तथ्य लिखने में जिसकी नीयत पर कोई शक नहीं किया जा सकता.

जस्टिस अग्रवाल कहते हैं, "हम यह समझने में असमर्थ हैं कि अगर कोई कारण न रहा होता तो हिंदू लोग विवादित स्थल के बारे में लगातार अपनी आस्था बनाए न रखते, विशेषकर तब जबकि उस समय मुस्लिम शासन था और उनसे समर्थन की उम्मीद कम ही थी."

संघर्ष

Image caption अयोध्या मसले ने हिंदू और मुसलमानों के बीच संघर्ष को भी जन्म दिया

जस्टिस अग्रवाल 1853 से 55 के बीच अयोध्या में हुए भीषण हिंदू मुस्लिम संघर्ष का जिक्र करते हैं, जिसमें सैकड़ों जानें गईं.

वह कहते हैं कि वहाँ जरुर कोई गंभीर बात थी कि हिंदू अपना दावा नहीं छोड़ सके. और इसीलिए तमाम बाधाओं के बावजूद वे विवादित स्थल पर अपना हक़ जताते रहे.

जस्टिस अग्रवाल मुस्लिम पक्षों की एक दलील का उल्लेख करते हैं जिसमें कहा गया है कि विवादित परिसर से दो सौ मीटर उत्तर पहले से भगवान रामचंद्र की जन्म भूमि पर एक मंदिर कायम है. वह कहते हैं कि इस बात को स्वीकार करने का मतलब हुआ कि राम जन्म स्थान इसी इलाक़े में स्थित है.

आस्ट्रियन पादरी टीफेनथेलर द्वारा विवादित मस्जिद परिसर में ही हिंदुओं द्वारा बेदी यानि राम जन्म स्थान की पूजा, परिक्रमा और साष्टांग दंडवत के उल्लेख का हवाला देते हुए जस्टिस अग्रवाल कहते हैं, "मुस्लिम पक्षों के वकील इस बात का उत्तर नहीं दे पाए कि यह बेदी विवादित परिसर में कैसे स्थित थी."

जस्टिस अग्रवाल कहते हैं, "उस जमाने में लोगों ने उस स्थान पर पूजा जारी रखने की लगातार कोशिश की, जिसे वह राम जन्म स्थान समझते थे. हम उनकी कठिनाई आसानी से समझ सकते हैं क्योंकि वे मुस्लिम शासन के अधीन थे और उस समय की व्यवस्था, संस्कृति और परम्पराएं बिलकुल भिन्न थीं."

विश्वास को मान्यता

बाद में जब परिस्थितियाँ आसान हुईं तो हिंदू आंशिक रूप से अपना दावा कायम करने में कामयाब रहे और अंग्रेजों ने बीच में दीवार खींच कर उन्हें बाहरी आँगन में पूजा की अनुमति दे दी. यह अलग बात है इससे दोनों समुदायों में विवाद हल हुआ या नहीं, लेकिन कम से कम हिंदुओं के इस अधिकार और विश्वास को मान्यता मिली कि विवादित स्थल राम जन्म स्थान है.

जस्टिस अग्रवाल लिखते हैं कि इस विभाजन के बाद भी हिंदू न केवल भीतर वाले आँगन में घुस जाते थे, बल्कि वे विवादित इमारत के कसौटी के खम्भों पर बनी मूर्तियों और उस स्थान की भी पूजा करते थे.

जस्टिस अग्रवाल कहते हैं, "यह तो नहीं मालूम कि विवादित मस्जिद से पहले स्थित मंदिर का ढांचा कैसा था लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि बीच वाले गुम्बद के प्रवेश द्वार में कसौटी के खम्भे लगे होने से हिंदू इसे राम जन्म स्थान का केंद्र मानकर पूजते थे."

जस्टिस अग्रवाल कहते हैं कि गजेटियर्स और दूसरे रिकार्ड्स में विवादित इमारत को राम के किला का हिस्सा बताया गया है. लोगों के विश्वास के अनुसार पूरा किला ही भगवान राम का था. परम्परा और व्यवहार के अनुसार यह बहुत पवित्र स्थान था.

वो लिखते हैं, "अगर उसमें किसी विशेष स्थान को हिंदू लोग भगवान राम का आजन्म स्थान मानकर पूजते थे तो फिर जब कि अयोध्या में कहीं और कोई दूसरा राम जन्म स्थान नहीं है तो फिर हम ऐसा कोई कारण नहीं देखते कि इस विश्वास को स्वीकार और मान्य क्यों न करें."

निष्कर्ष में जस्टिस अग्रवाल कहते हैं कि इस तरह हिंदुओं की परम्परा के मुताबिक भगवान राम मध्य गुम्बद के नीचे उस छोटे से स्थान पर पैदा हुए थे, जिसे हिंदू लोग गर्भ गृह कहते हैं (यानि जहां मूर्तियां रखी हैं ) और इस गर्भ गृह समेत बाकी विवादित स्थान पर राम जन्म भूमि मंदिर की इमारत बनी थी.

पैरा 4418 में जस्टिस खान और अपनी तरफ से जस्टिस अग्रवाल लिखते हैं, "हम इस बात से संतुष्ट हैं और निर्णय देते हैं कि जन्म स्थान विवादित परिसर के भीतर वाले आँगन में तीन गुम्बद वाली इमारत के मध्य गुम्बद के नीचे वह जगह है जिसे हिंदू जन्म स्थान मानकर पूजते हैं."

जस्टिस धर्म वीर शर्मा

जस्टिस धर्म वीर शर्मा ने कुछ और दस्तावेजों , किताबों और रेवेन्यू रिकार्ड्स का हवाला दिया है. इनमें उस इलाक़े को राम कोट, राम का किला अथवा राम जन्म स्थान लिखा गया है और हिंदुओं की ओर से बराबर संघर्ष और पूजा का जिक्र है.

सन 1870 की पी कार्नेगी रिपोर्ट का उल्लेख है जिसमें हिंदुओं के लिए अयोध्या का वही महत्व बताया गया है जो मुसलमानों के लिए मक्का और यहूदियों के लिए यरुशलम का है.

जस्टिस शर्मा ने इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका का हवाला दिया है जिसमें लिखा गया है कि सोलहवीं शताब्दी में मुग़ल बादशाह बाबर ने वहीं मस्जिद बनवाई जो परंपरागत रूप से राम जन्म स्थान माना जाता था और जहां एक पुराना राम जन्म भूमि मंदिर स्थित था.

जस्टिस शर्मा के अनुसार राम जन्म भूमि हिंदू धर्म का अभिन्न अंग है और वहाँ पूजा करना हिंदू धर्म का मौलिक अधिकार.

विलियम फिंच, विलियम फ़ॉस्टर और टीफेनथेलर के ऐतिहासिक विवरण के आधार पर जस्टिस शर्मा कहते हैं कि हिंदू लोग जन्म स्थान को ही देवता मानकर पूजा करते थे.

जस्टिस शर्मा के अनुसार, "इस बात के प्रबल सबूत हैं कि विवादित संपत्ति ही राम जन्म भूमि का स्थान है. इसकी पुष्टि धार्मिक अभिलेखों, धार्मिक पुस्तकों और शिला लेखों से होती है."

जस्टिस शर्मा के अनुसार हिंदू धर्म में पूजा के स्थान को ही देवता माना जा सकता है भले ही वहां मूर्तियां हों या न हों. इस संबंध में उन्होंने गंगोत्री, यमुनोत्री, गया, केदारनाथ और अमरनाथ जैसे तीर्थ स्थानों का जिक्र किया है.

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