मधुबनी के चुनावी चित्र बड़े विचित्र

मधुबनी
Image caption मधुबनी के मतदाताओं का रुख़ स्पष्ट नहीं दिख रहा है

बिहार के मिथिलांचल का केंद्र मधुबनी ज़िला इस बार विधानसभा चुनाव में राज्य के सत्ताधारी जदयू -भाजपा गठबंधन के लिए ख़ासा चुनौती भरा इलाक़ा माना जा रहा है.

वर्ष 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में 11 में से 8 सीटें जीत लेने वाले इस गठबंधन को विपक्षी राजद-लोजपा गठबंधन इस बार ज़िले की कुल 10 सीटों में से 8 पर कड़ी टक्कर देने की स्थिति में दिख रहा है.

वैसे किसी-किसी सीट पर कांग्रेस,सीपीआई और निर्दलीय उम्मीदवार की भी मज़बूत पकड़ मानी जा रही है. लेकिन ख़ास मधुबनी सीट पर लालू प्रसाद की पार्टी राजद ने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा की नींद उड़ा दी है.

इसका कारण ये है कि इस बार यहाँ मुस्लिम-यादव समीकरण वाला पुराना लालू फ़ार्मूला असर दिखा रहा है. साथ ही ज़िले में जदयू की पिछली जीती हुई पाँच सीटों पर इस दफ़ा पहले जैसा लालू-विरोध भी नहीं रह गया है.

जदयू-भाजपा गठबंधन की सबसे बड़ी उम्मीद के रूप में जो कुछ साफ़-साफ़ दिखता है, वो है नीतीश सरकार का विकास का मुद्दा और सवर्ण समाज, ख़ासकर ब्राह्मणों का लालू-विरोध.

यहाँ आम मतदाताओं में महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर रोष तो बहुत है, लेकिन उसे मुद्दा बनाकर किसी के पक्ष या विरोध में वोट देने जैसा कोई स्पष्ट मत वो नहीं बना पा रहे हैं.

मधुबनी ज़िले के बंद पड़े उद्योग-धंधे, ख़ासकर सूत और चीनी मिल को भी यहाँ चुनावी मुद्दा नहीं बनाया गया है. अगर कोई मसला मुख्य रूप से चर्चा में है, तो वो है ये सवाल कि सवर्ण, मुस्लिम, पिछड़ा या दलित समाज इस बार के चुनाव में किधर जाएगा?

मधुबनी पेंटिंग के लिए विश्व-विख्यात मधुबनी में ऐसे विचित्र चुनावी चित्र को समझना आसान नहीं है.

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