बिहार चुनाव में विरासत की राजनीति

भारतीय चुनाव में परिवारवाद पर चर्चा करना मानो ये कहना है कि फ़्लू है तो बदन मे दर्द होगा ही.ये वाकई ऐसा रुझान नहीं है कि लोगों की भौएं तन जाएँ, लोग अवाक हो जाएँ और मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह जाए.

इतनी नाटकीयता की उम्मीद भारतीय राजनीति में परिवारावाद से नहीं की जा सकती है. लेकिन इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में विरासत की राजनीति एक अभूतपूर्व स्तर तक पहुंच गई है.

इस बार अस्सी से भी अधिक राजनीतिक परिवारों की फ़ौज चुनाव मैदान में उतर गई है. मामला केवल पिता-पुत्र या पति-पत्नि तक ही सीमित नहीं रहा है.

इसका दायरा समधि समधिन, देवर भौजाई, ननद-भाभी तक फैल चुका है. मज़ेदार बात ये है कि पति एक पार्टी से सांसद है, पत्नी विरोधी पार्टी के टिकट पर लड़ रही है और बेटा किसी और ही पार्टी से.

‘कांग्रेस है दोषी’

जनता दल यूनाइटेड के सांसद मोनाज़िर हसन की पत्नी राष्ट्रीय जनतादल की टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं. पिता जगनानंद राजद के सांसद हैं तो पुत्र सुधाकर सिंह भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं.

जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद शिवानंद तिवारी इसे विकृति तो मानते है पर इस ट्रेंड को सभी राजनीतिक पार्टियों का कांग्रेसीकरण का नाम भी देते हैं.

शिवानंद तिवारी कहते हैं, “देश की राजनीति में जो विकृति है उस विकृति का कारण है काग्रेंस पार्टी. सबसे पुरानी पार्टी, सत्ताधारी पार्टी. उसने जैसे अपने आपको कंडक्ट किया है उसका प्रभाव तमाम राजनीतिक पार्टियों पर पड़ा है और कांग्रेसीकरण हुआ है पूरे देश का और यही सबसे बड़ा संकट.जदयू का भी कांग्रेसीकरण हुआ है.”

इस दौड़ मे जनता दल यूनाइटेड और कांग्रेस सबसे आगे है. दोनों पार्टियों ने परिवारों के नाम पर 22 टिकटें काटी हैं. वहीं राष्ट्रीय जनता दल में ये संख्या 16 है और भारतीय जनता पार्टी में 10 सीटे राजनीतिक परिवारों को दी गई है.

‘ ख़तरनाक रूप’

जाने माने चिंतक और गांधीवादी रज़ी अहमद बिना लाग लपेट के कहते हैं कि राजनीति का ये रूप काफी ख़तरनाक है.

वे कहते हैं, “ये चुनावी संस्थाएँ सेवा की चीज़ हुआ करती थीं पर आज ये मुनाफ़े की चीज़ हो गई है. तो इसीलिए लोगों की कोशिश होती है किसी भी तरह संसद में, विधानसभा में पहुंच जाएं तो फिर मौज मस्ती ही है. अब तो किसी भी पार्टी में लोकतंत्र नहीं है. अब बस बाबा नाम केवलम का हिसाब है. किसी भी पार्टी में वो ढांचा नहीं है जिसका ज़मीन से ताल्लुक हो.”

उन्हीं लोगों का ज़मीन से टूटता रिश्ता जो उसकी नुमाईंदगी का दावा करते हैं, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का तमगा उनके गले लटकता है जो अपनी पार्टियों को अपनी बपौती समझने में हिचकिचाते नहीं है.

दिलचस्प बात ये भी है कि इस परिवारवाद ने विरोधियों की दूरी को पाट दिया है. अब इसे कहते हैं न एक ही थैली के चट्टे बट्टे.

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