इसे विकास नहीं बस आस कहिए

बिहार का एक स्कूल (फ़ाइल)
Image caption स्कूल की चर्चा होते ही बाक़ी लोग भी बहस में जुट जाते हैं.

विकास की सच्ची कसौटी अंतिम व्यक्ति है. शायद ये विचार हमें सुपौल ज़िले की कनौली पंचायत के मुसहर टोले तक ले गया होगा. भौगोलिक और सामाजिक हाशिए का अंतिम छोर.

इस गांव से आगे नेपाल शुरु हो जाता है. दरअसल मुसहर टोले तक पहुंचने के लिए भारत की सीमा चौकी पार कर एक पक्के-कच्चे रास्ते से वापिस आना पड़ता है. मानो सामाजिक सीढ़ी के अंतिम पायदान पर खड़े इस समुदाय को देश के बाहर ठेलने की कोशिश हो.

एक पोखर के ईर्द-गिर्द बसे इस टोले में कुल सत्तर घर हैं. राज्य सत्ता की उपस्थिति को दर्ज करवाता दो कमरे का एक प्राथमिक विद्यालय है और उसके सामने खड़ा सामुदायिक भवन जो आंगनबाड़ी का काम करता है. कुछेक सूअरों और आवारा कुत्तों को छोड़ मवेशियों की कमी विपन्नता के एहसास को गहरा करती है.

अधिकांश पुरुष मज़दूरी करते हैं...जब मिले तब. 'जॉब कार्ड' सबका बना है. ये कार्ड रोज़गार गांरटी योजना में मज़दूरी के लिए अनिवार्य होता है.

लेकिन सरकार ने एक-दो दिन छोड़कर काम नहीं खोला है. बस्ती में तीन-चार लड़के मैट्रिक पास कर गए हैं लेकिन किसी को नौकरी नहीं मिली है. रोज़गार का कोई पुख़्ता साधन है तो दिल्ली-पंजाब.

तीरछाप के साथ

Image caption नीतीश कुमार से विकास की आस है.

उपेंद्र दिल्ली से कमाई कर आजकल घर आए हैं. बातचीत में आत्मविश्वास झलकता है.बड़े शहरों की गुमनामी ने सामाजिक दंश से मुक्ति दिलाई है. बाहरी लोगों से बातचीत की शुरुआत वही करते हैं.

"यहां सभी लोग तीरछाप के साथ हैं." कारण पूछने पर वह पिछले पांच साल के काम गिनवाना शुरु कर देते हैं. टोले के अधिकांश परिवारों को बीपीएल कार्ड मिला है, अनाज-राशन मिलता है. कई परिवारों के इंदिरा आवास का पैसा मिला है. बिचौलिए पांच-दस हज़ार खा जाते हैं, फिर भी मकान बनाना शुरु करने के लिए पैसा है. कुछ परिवारों को ज़मीन का पट्टा देने के लिए ज़मीन खोजी जा रही है.

स्कूल की चर्चा होती है तो बाक़ी लोग भी जुट जाते हैं. टोले के लगभग सभी बच्चे स्कूल जाते हैं, बाहर के बच्चे भी इसी स्कूल में आते हैं. कोई ढाई सौ बच्चे, छह अध्यापक. कमरे भले ही दो हों लेकिन वो कोई बात नहीं. गुरुजी पेड़ों के नीचे बच्चों के साथ बैठ जाते हैं.

बाक़ी गांवों में अध्यापकों की योग्यता को लकर भारी असंतोष था लेकिन यहां ऐसी नफ़ासत के लिए फ़ुर्सत नहीं थी.

Image caption बच्चों को स्कूल में खाना मिलता है और वर्दी भी.

तीसरी कक्षा के बच्चे को तीन का पहाड़ा सुनाते देख उनकी मां खिले जा रही थी. स्कूल में खाना मिला है, मां हर दिन का मेनू गिनाना चाहती है. उनकी अपनी बड़ी बेटी को खाना पकाने का काम जो मिला है.

बच्चों को बूट, मोजा और पोशाक मिली है. (बाक़ी गांवों में पोशाक के पैसे मिले हैं.)हर स्कूल की तरह यहां भी बच्चों को सभी किताबों का सेट मिला है.दसवीं पास करने पर लड़कियों को साईकिल मिलती है ये पता है. लेकिन अभी इस टोले की कोई लड़की उसके आस-पास नहीं है.

अस्पताल में सुधार की चर्चा चारों ओर थी लेकिन इस कोने में किसी ने डॉक्टर या सरकारी दवाखाना नहीं देखा था.

ग़रीब को इज़्ज़त

टोले के 'भक्त जी'(समाज के अपने पंडित) कुल मिलाकर हालात से असंतुष्ट नहीं हैं.

Image caption भक्त जी कहते हैं कि लालू यादव ने ग़रीबों को इज़्ज़त दी.

उन्हें अपने मां-बाप का ज़माना याद है. तफ़सील में नहीं जाते, सिर्फ़ इतना कहते हैं कि उन दिनों की यदा करने पर आंखों में आंसू और ख़ून छलकता है. उसकी तुलना में आज की मज़दूरी में भी गरिमा है.

ये बदलाव कब हुआ और क्यों? वे पिछले बीस साल के दौर को चिन्हित करते हैं - जबसे दिल्ली-पंजाब जाना शुरु हुआ. इसी दौर में तो लालू यादव सत्ता में भी आए थे. ये याद दिलाने पर वे खुले मन से स्वीकारते हैं कि लालू यादव ने सबसे पहले ग़रीब को इज़्ज़त दी, उसे सर उठाने की हिम्मत दी. लेकिन उसके बाद तो हम लोगों के लिए और कुछ नहीं किया. अब नीतीश बाबू कुछ कर रहे हैं.

जाते-जाते बिजली का प्रसंग छिडा़. नौजवान शिकायत करते हैं कि सौर-लाइट पड़ोस के टोले में की गई लेकिन उनके टोले में नहीं. भक्त जी आशवस्त करते हैं - इस बार नीतीश वापिस आएंगें तो पूरी बिजली ही आएगी, हमें इस सौर लैट वाले झरोखे की क्या ज़रुरत?

कनौली से लौटते हुए मैं सोचता रहा. विकास बहुत भारी शब्द है. अंतिम व्यक्ति तक विकास भले न पहुंचा हो,आस ज़रुर पहुंची है. ये क्या कम है !

(जानेमाने राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव बिहार चुनाव का जायज़ा लेने के लिए वहाँ के दौरे पर हैं. वह समय-समय पर बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के पाठकों से अपने अनुभव बांटते रहेंगे. पढ़िए उनकी डायरी का यह दूसरा पन्ना. )

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