बिहार में पहले चरण का मतदान ख़त्म

बिहार मे चुनाव
Image caption गांवों में भारी भीड़ देखी गई लेकिन शहरों में शायद उतना उत्साह नहीं था.

चुनाव का पहला दौर आम तौर पर शांतिपूर्ण रहा. कई जगहों पर वोट डालने वालों की लम्बी क़तारें दिखीं.

फिर भी मतदान का प्रतिशत बहुत ज़्यादा नहीं बढ़ा. लगभग 55 प्रतिशत मतदान होने की ख़बर है.

इस बार एक ख़ास बदलाव मैनें कोसी अंचल में ये देखा कि पिछड़े और दलित तबक़े के लोग ज़्यादा उत्साह के साथ अच्छी-ख़ासी तादाद में मतदान केन्द्रों पर पहुंचे थे.

ख़ासकर ग्रामीण इलाक़े में ऐसी क़तारें सुबह से ही लगी थीं, जबकि शहरी क्षेत्र में ऊंचे तबक़े के मतदाताओं में ऐसा उत्साह दिखा.

दलितों में भी महादलित का जो वर्गीकरण बिहार की नीतीश सरकार ने किया है, उसका चुनावी असर यहाँ सरकारी दलों (जदयू-भाजपा) के अनुकूल दिख रहा था. लेकिन इस महादलित वर्ग से अकेले अलग कर दिए गए 'पासवान' दलित समुदाय में इन सरकारी दलों के ख़िलाफ़ मत देने की उग्रता राजद-लोजपा गठबधन के हक़ में जा रही थी.

इसके दो उदहारण मुझे सहरसा से कुछ दूर दो अलग-अलग मतदान केन्द्रों पर मिले. एक था सुलिन्दाबाद में और दूसरा दिवारी थान में.

सुलिन्दाबाद के महादलित महिला और पुरुष मतदाता ने पहले कहा '' क्यों बताएं कि हम किस छाप में वोट देंगे?'' फिर थोड़ा घुमा- फिरा कर पूछने पर खोलकर कह दिया '' हमलोग महादलित बस्ती के हैं और हम नीतीश सरकार को ठीक समझकर उधर ही वोट देगे. ''

वहाँ से सिर्फ एक किलोमीटर दूर दिवारी थान के पिछड़ा वर्ग के मतदाता नीतीश सरकार के प्रति अपना रोष खुलकर ज़ाहिर करने लगे - '' हम इस सरकार को बदलना चाहते हैं क्योंकि विकास-उकास सब फोकसबाज़ी है, सड़क-बिजली का बुरा हाल है और हमलोग इस राज में त्राहि-त्राहि कर रहे है.''

तो इस चुनाव के जातीय समीकरण का यह एक ऐसा सच है, जो बाक़ी अन्य विकास या विनाश वाले आरोप-प्रत्यारोप पर भारी है.

जहाँ तक मतदान के दौरान सुरक्षा व्यवस्था की बात है, तो प्रायः सभी बूथों पर सशस्त्र बल दिखे और कहीं-कहीं छिटफुट झडपों को छोड़, कोई बड़ी हिंसक घटना नहीं घटी.

संबंधित समाचार