जात न पूछो रेणु की

बिहार में चुनाव
Image caption चुनावी राजनीति एक 'वेल्डिंग मशीन' है, जो रिश्तों को काट रही है, जोड़ रही है.

फणीश्वरनाथ रेणु की जाति क्या थी? सवाल फारबिसगंज छोड़ने के 48 घंटे बाद मन में आया. फारबिसगंज मेरे मन में एक काल्पनिक शहर का नाम है जो रेणु के उपन्यासों में बसा है.

ज़ाहिर है सपने का फारबिसगंज मेरे सपने का बोझ न ढो सका.फिर भी अररिया जाते समय रेणु का दीवाना मेरा मन उनके गांव को देखने की ज़िद करने लगा. हाइवे से सटा सीमेंट का सादा सपाट-सा द्वार,जिसे रेणु द्वार कहा जाता है.सिमराहा में किसी महामहिम के कर कमलों से अनावृत रेणु की सुनहरी आदमकद प्रतिमा.

और फिर ईंट के रास्ते से होते हुए रेणु का गांव औराही हिंगना.

रेणु के बेटे चुनावी समर में

रेणु के घर में कुछ था, जो मन को छू गया.शायद उनके परिवार का आत्मीय व्यवहार. शायद उनके अपने कमरे का साक्षात दर्शन. शायद रास्ते में लहलहाते हुए खेल, आंखों में गढ़ती हुई हरियाली, खेतों के बीच पेड़ों के गुलदस्ते. शायद इसी पगडंडी पर लाल पान की बेग़म अपनी बैल गाड़ी में बैठकर इतराई होगी.

Image caption नज़र विकास पर, फिर भी चश्मा जातीय

शायद यहीं किसी टोले में 'पंच लाइट' आई होगी. आग रेणु के घर के बाहर खड़ी जीपों और वहां लगे बैनर को न देखता तो ये भूल ही जाता कि रेणु के बेटे पद्म पराग वेणु इस बार चुनाव लड़ रहे हैं और वो भी भाजपा के टिकट पर.

इस विडंबना को मन से धकेला ही था कि अगले दिन फारबिसगंज विधानसभा क्षेत्र का चुनावी विश्लेषण पढ़ा.अख़बार के मुताबिक वेणु को टिकट देते समय भाजपा ने जातीय समीकरण को ध्यान में रखा है. इस क्षेत्र में उनके स्वजातीय 'मंडल' समुदाय के अमुक हज़ार मतदाता है.

तभी ये सवाल कौंधा - 'मंडल' यानि कौन-सी जाति? फलीश्वरनाथ रेणु की जाति क्या थी? फ़ॉरवर्ड थे कि बैकवर्ड? मैंने पहले कभी ये सवाल क्यों नहीं पूछा? आख़िर इस बारे में सोच ही क्यों रहा हूं?

इस दुविधा में फिर रेणु का ही दामन थामा. 'परती परिकथा' के गांव में चकबंदी के लिए सर्वे का काम हो रहा है. 'बाउंडी' खींची जा रही है. ये 'बाउंडी' गांव के हर रिश्ते के बीच में खींची जा रही है. भाई-भाई को बांट रही है. दोस्तों को दुश्मन बना रही है. स्थापित समीकरणों को उलट-पुलट रही है. नए-नए रिश्ते व अजीबोग़रीब दोस्तियां गढ़ रही है.

नज़र विकास पर, फिर भी चश्मा जातीय

चुनावी राजनीति भी तो ऐसी ही एक 'वेल्डिंग मशीन' है, जो रिश्तों को काट रही है, जोड़ रही है. कल तक राजनीति के उत्तर और दक्षिण ध्रुव ब्राह्मण और राजपूत को फ़ॉरवर्ड के खेमें में एक साथ बैठने को मजबूर करती है.

Image caption बिहार में मुसलमान एक अविभाजित इकाई नहीं हैं.

उधर बैकवर्ड को पिछड़े व अति पिछड़े में बांटती है. गोप व ग्वाल को यादव लेबल से जोड़ती है, तो चर्मकार और मुसहर को महादलित की गोंद से जोड़ती है. अगर आप मान बैठें कि इस खेल में मुसलमान एक अविभाजित इकाई है तो किसी भी ढाबे पर आपको मुसलमान समाजशास्त्र का ककहरा पढ़ा दिया जाएगा.

सैयद, शेख़, कुलैया,बधिया, सुरजापुरी....'मैला आंचल' और 'परती परिकथा' दोनों आधुनिक विकास के हसीन सपने की कहानियां हैं. लेकिन रेणु की पैनी दृष्टि हमें हर क़दम पर आगाह करती है कि हर गांव का हर टोला विकास के सपने को अपने जातीय चश्में से देखता है.

यही शायद बिहार के इस चुनाव की कहानी है.

नज़र सबकी विकास पर है, लेकिन जाति का चश्मा अभी उतरा नहीं है. रेणु की कहानी में अंतत: विकास की जीत होती है. लेकिन सुखांत के साथ-साथ दुखांत भी जुड़ा होता है.

इस रूपक को बिहार के चुनाव में ढालते-ढालते मुझे फिर याद आया,आख़िर फणीश्वरनाथ रेणु की जाति क्या थई? मैंने तय किया कि मुझे अब इस सवाल का उत्तर नहीं चाहिए.

(जानेमाने राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव बिहार चुनाव का जायज़ा लेने के लिए वहाँ के दौरे पर हैं. वह समय-समय पर बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के पाठकों से अपने अनुभव बांटते रहेंगे. पढ़िए उनकी डायरी का यह तीसरा पन्ना. )

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