रहस्यमय बुख़ार से चिंता का माहौल

लखनऊ

लखनऊ के खदरा और बांसमंडी मोहल्ले गोमती नदी के किनारे बसे हैं.

मेडिकल कालेज भी यहाँ से पास है और घनी आबादी वाला यही वह इलाक़ा है, जहाँ पिछले कई हफ़्तों से सैकड़ों लोग एक रहस्यमय बुख़ार से पीड़ित हैं. कई परिवारों में लोगों की मौतें भी हो चुकी हैं.

सरकार इस रहस्यमय बुख़ार से मौतों का आँकड़ा देने से कतरा रही है, लेकिन स्थानीय अख़बारों के मुताबिक़ मरने वालों की तादाद 21 से 58 के बीच है.

हम सीतापुर रोड पर खड़े होकर बस यह पूछ ही रहे थे कि किस तरफ़ लोग ज़्यादा बीमार हैं. तभी कुछ परेशान महिलाएँ दिखाईं पड़ी.

देखते-देखते और भी बहुत से लोग आ गए. उनके साथ हम मोहल्ले के अंदर गलियों में गए. इस मोहल्ले में ग़रीब लोगों की तादाद ज़्यादा है.

गलियों के दोनों ओर नालियां बजबजा रही थी. कई बच्चे वहीं खुले में नाली पर ही टट्टी कर रहे थे. मोहल्ले के लोगों ने बताया कि हर घर में कई-कई लोग बीमार हैं.

अपने घर के बाहर उदास बैठी अधेड़ उम्र की फ़ातिमा ने बताया कि बाईस साल का उनका बेटा मोहम्मद अयूब बुख़ार से मरा.

इसी गली में रहने वाली युवती बिलकीस की दो साल की बेटी आलिया की रविवार को मौत हुई. आलिया की नानी वहीदन बिलख-बिलख कर रो रही थी.

अख़बारों में छपा था कि सरकार के सफ़ाई की देखरेख के लिए लखनऊ में सौ विशेष अधिकारी तैनात किए हैं, लेकिन पुरानी बांस मंडी के इस इलाक़े में अभी कोई नही पहुँचा.

गंदगी

कई लोगों ने अपने पड़ोसियों की इस आदत की शिकायत की कि वे घर का कचरा नाली में डाल देते हैं या सीधे नाली में ही टट्टी बहा देते हैं.

Image caption कई इलाक़ों में गंदगी ऐसे ही फैली रहती है

लोग समझते हैं कि गंदगी सी बीमारी फैलती है, लेकिन सारी ज़िम्मेदारी सरकार और नगर निगम पर डालते हैं.

सड़क की दूसरी ओर खदरा मोहल्ला है. बीमार और मरने वालों की संख्या यहाँ और भी ज़्यादा है.

इसलिए सरकार ने कई रोज़ से यहाँ एक विशेष मेडिकल कैंप लगाया है. चार-पाँच डॉक्टरों को 20-25 लोग घेरे हैं.

मेज़ पर तरह-तरह की ढेर सारी दवाइयाँ रखी हैं. बलराम अस्पताल के डॉक्टर एससी सिन्हा का कहना है कि मौसम बदलने के इस सीजन में अक्सर बुख़ार आता ही है. डॉक्टर सिन्हा के अनुसार ज़्यादातर मरीज़ों को वायरल फीवर के लक्षण है.

खदरा के बगल में मशालची टोला, त्रिवेणी नगर, बड़ी पकड़िया और फैजुल्लागंज भी विचित्र बुख़ार की इस बीमारी से परेशान हैं.

लखनऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर एके शुक्ल का कहना है कि कहना है कि ख़ून के जो 272 नमूने जाँच के लिए भेजे गए थे, उनमें किसी में मलेरिया या डेंगू की पुष्टि नही हुई.

डॉक्टर शुक्ल कहते हैं कि हो सकता है यह कोई नया वायरस हो, जिसकी पहचान अभी नही हो पाई.

सरकारी तौर पर उत्तर प्रदेश में इस साल अब तक लगभग 600 लोग मस्तिष्क ज्वर, मलेरिया, डेंगू और दूसरे तरह के दिमाग़ी बुख़ार से मर चुके हैं.

इनमें पूर्वी उत्तर प्रदेश में इन्सेफलाइटिस से मरने वाले भी शामिल हैं. लेकिन अख़बारों ने अपने संवाददाताओं से प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ 1200 से अधिक लोगों के मरने की ख़बरें छपी हैं.

सबसे चिंता की बात यह है कि लखनऊ में फैले बुख़ार का सही कारण भी अभी तक पता नही चला. लखनऊ मेडिकल कालेज के डॉक्टर प्रोफ़ेसर कौसर उस्मान को संदेह है कि कही डेंगू बीमारी के वायरस में ही कोई परिवर्तन न हो गया हो.

लक्षण

डॉक्टर क़ौसर उस्मान कहते हैं, "ये वायरल बुख़ार है या इसे डेंगू जैसा बुख़ार कह सकते हैं."

Image caption कई परिवार को अपने प्रियजनों को गँवाना पड़ा है

डॉक्टर क़ौसर ने बताया, "अभी इस बीमारी का ठीक-ठीक कारण तब तक नहीं बता सकते, जब तक वायरस की पहचान न हो जाए, इसके लक्षण इस तरह के हैं जैसे बहुत तेज़ बदन दर्द, जाड़े के साथ बुख़ार, सरदर्द, उल्टी, मतली, चकत्ते पड़ जाना या ख़ून बहना. यह लक्षण डेंगू के भी हैं. हो सकता है कि वायरस का स्ट्रेन चेंज हो गया हो या फिर उसमे म्यूटेशन या परिवर्तन हो गया हो, जिसकी वजह से डेंगू पॉजिटिव न आता हो."

वहीं संजय गांधी स्नातकोत्तर मेडिकल इंस्टीच्यूट लखनऊ में माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफ़ेसर डॉक्टर टीएन ढोल यक़ीन के साथ कहते हैं कि खदरा इलाक़े में डेंगू भरा पड़ा है. इसकी पुष्टि पिछले दिनों आए नमूनों में हो चुकी है.’

डॉक्टर ढोल कहते हैं कि अगर नमूना समय से न लिया जाए या जाँच ठीक से न हो तो यह संभव है कि मरीज़ को डेंगू होते हुए भी जाँच में डेंगू की पुष्टि न हो.

डॉक्टरों का कहना है कि लोग बीमारी से ज़्यादा डेंगू के ख़ौफ़ से परेशान हैं.

डॉक्टरों की सलाह है कि बुख़ार होने पर केवल पैरासिटामॉल लें और पानी ख़ूब पिएँ. अपने मन से दर्द की या कोई एंटीबायोटिक दवा न लें.

दर्द की दवा लेने से ख़ून में प्लेटलेट कम हो सकते हैं. मरीज़ को बाक़ी घरवालों से अलग रखें. डॉक्टर की सलाह लें और ब्लड में अगर प्लेटलेट थोड़ा कम हो जाए तो भी तब तक परेशान न हों जब तक ख़ून बहने के लक्षण न हों.

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