'बिहार में काम मिलता तो यहां क्यों आते'

भरत पासवान

भरत पासवान दिल्ली में मज़दूरी करते हैं और अपने ठेला पर सामान भी ढोते हैं.

बिहार विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र हम उन लोगों के अनुभव आपसे साझा कर रहे हैं जो बिहार से बाहर रह रहे हैं. उन्होंने बिहारी होने के कारण क्या देखा, सोचा और जाना. इसी शृंखला में मज़दूरी करने वाले भरत पासवान के अनुभव

"बिहार में काम काज नहीं था तो पेट की आग शांत करनी थी तो दिल्ली आ गए. हमारा घर समस्तीपुर के हरिहरपुर के पास पड़ता है. पेट जला तो घर से निकले थे कमाने. पहले कलकत्ता में भी काम किए कुछ दिन.

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दिल्ली में सात साल हो गए. कभी मज़दूरी करते हैं. कभी बेलदारी (मिट्टी खोदना) भी करते हैं. कुछ दिन से अब ठेला है तो सामान ढोते हैं. कभी काम मिलता है कभी नहीं मिलता है. रोज़ी रोटी चल जाता है.

भरत की पत्नी ममता घरों में रसोई बनाने का काम करती हैं.

जब बेलदारी करते थे तो कई बार पैसा नहीं देते थे मालिक. मार पीट के भगा देते थे. बहुत बार लोग कह देते हैं. साला बिहारी है ढंग नहीं है कैसे बोलता है..गुस्सा आता है लेकिन हम हट जाते हैं कुछ बोलते नहीं हैं. ये सब बदतमीजी तो होता ही है.

अब हम मज़दूरी नहीं करते हैं. ठेला है उसी पर सामान ढोने का आर्डर मिलता है तो कमाई होती है. पत्नी लोगों के घर में काम करती है. तो थोड़ी आमदनी हो जाती है.

यहां रुखी सूखी रोटी मिल जाती है. यही सूखी रोटी मिल जाए तो बिहार में क्यों नहीं काम करेंगे लेकिन वहां कुछ काम ही नहीं मिल पाता है.

घर में परिवार का आदमी मर जाता है पता नहीं चलता है. यहां कोई दोस्त संबंधी नहीं है. हम लोगों का कोई संगठन भी नहीं है. बात करने के लिए कोई नहीं है.

कौन रहना चाहता है दूसरे देस में. बिहार क्यों नहीं जाना चाहेंगे. काम मिले. रोटी मिले. भूखे नहीं रहें तो ज़रुर चले जाएंगे. यहां तो बस दो रोटी के चक्कर में पड़े रहते हैं.

मज़दूरी करते करते पैर में दिक्कत हो गया है. पैर में दर्द रहता है तभी ठेला का काम लिए हैं. इसमें थोड़ी आमदनी होती है. क्या बोलेंगे हम लोग. हम लोगों के लिए कुछ होता कहां है".

भरत पासवान की पत्नी ममता भी कहती हैं कि दिल्ली में बिहार का होने के कारण लोग बेइज्जती करते हैं. वो कहती हैं कि थोड़े पैसे हों तो वो बिहार वापस जाना चाहेगी ताकि अपने लोगों के बीच रह सके.

(बीबीसी संवाददाता सुशील झा से बातचीत पर आधारित)

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