'अपने लोग ही मदद नहीं करते'

संजीव झा

संजीव का मानना है कि बिहार के लोग अपने ही लोगों की मदद नहीं करते.

बिहार विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र हम उन लोगों के अनुभव आपसे साझा कर रहे हैं जो बिहार से बाहर रह रहे हैं. उन्होंने बिहारी होने के कारण क्या देखा, सोचा और जाना. इसी शृंखला में मुंबई की फ़िल्मी दुनिया में संघर्ष कर रहे संजीव झा के अनुभव

"मैं मुंबई में स्क्रिप्ट लेखक हूं और कह सकते हैं कि संघर्ष के दौर से गुज़र रहा हूं.पहले दिल्ली में कुछ समय रहा और अब पिछले एक साल से मुंबई की खाक छान रहा हूं.

बिहारी होने के कारण अपमानित तो नहीं होना पडा है लेकिन ये बात ज़रुर दुःख पहुंचाती रही है कि अपने राज्य को छोड़कर जब बाहर आया तो किसी ने हाथ नहीं थामा.

क्लिक करें संजीव के अनुभव: ऑ़डियो सुनिए

मुंबई में बिहार के कई लोग सफल रहे हैं. मेरी शिकायत उन बिहारियों से ही है जो बड़े-बड़े पदों पर हैं, जिन्होंने अपना मुकाम बना लिया है. जिनके पास साधन है, जो हमारी मदद कर सकते हैं. लेकिन जो हमसे मिलने और बात करने से कतराते हैं.

मुझे तो कई बार ये लोग देवराज इंद्र जैसे लगते हैं, जिनका आसन हम जैसे संघर्षशील लोगों के तप से हिलने लगता है. मुंबई में हम नए लेखकों की हैसियत ठीक वैसी ही है, जैसे एक ज़माने में कबीरदास.

मैं किसी का नाम नहीं लूंगा लेकिन मैं जब किसी ( बिहार के सफल लोग) से काम मांगने गया तो उन्होंने यही कहा कि कुछ कर लो तब काम दूंगा. कोई समर्थन नहीं मिला क्योंकि नया हूं. हर आदमी नया होता है हर फील्ड में. मौका तो मिले

संजीव झा, संघर्षरत लेखक

मैं किसी का नाम नहीं लूंगा लेकिन मैं जब किसी ( बिहार के सफल लोग) से काम मांगने गया तो उन्होंने यही कहा कि कुछ कर लो तब काम दूंगा. कोई समर्थन नहीं मिला क्योंकि नया हूं. हर आदमी नया होता है हर फील्ड में. मौका तो मिले.

मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि ऐसा क्यों करते हैं बिहार के लोग. एक बार सफल हो जाए तो फिर अपने राज्य के लोगों की तो जैसे मदद नहीं करने की ठान लेते हैं.

फिल्म लाइन की देखें तो टेक्नीकल क्षेत्र में महाराष्ट्र के लोग हैं वो अपने लोगों को मदद करते हैं.

बुरा इसलिए लगता है क्योंकि अगर आप महाराष्ट्र के लोगों को देखें, असम, बंगाल के लोगों को देखें तो अगर उनका कोई स्ट्रगलर आता है तो यहां उन राज्यों के लोग समर्थन करते हैं काम देते हैं. यहां तक कि राजस्थान के लोग भी अपने राज्यों के लोगों की मदद करने से नहीं चूकते. लेकिन बिहार वाले अपने ही लोगों की मदद नहीं करते.

मैं क्षेत्रवाद नहीं फैला रहा हूं लेकिन यह बात मन को कचोटती ज़रुरी है कि हम बिहारी ही बिहारियों के नहीं हुए तो किसी और से कैसे उम्मीद की जाए".

(बीबीसी संवाददाता सुशील झा से बातचीत पर आधारित)

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