क्या ख़ास है मणि भवन में?

ओबामा मणि भवन में चालीस मिनट बिताएँगे

छह नवंबर से शुरू हो रही अमरीका के राष्ट्रपति की भारत यात्रा में पहला पड़ाव होगा मुंबई. अपनी मुंबई यात्रा के दौरान वे ऐतिहासिक मणि भवन भी जाएँगे जहाँ महात्मा गांधी ने काफ़ी समय गुज़ारा था.

ओबामा के आने की घोषणा के बाद यहाँ पुलिस तैनात कर दी गई है, सुरक्षा एजेंसियों के लोग भी यहाँ घूमते दिखाई दे जाते हैं. ग्रांट रोड रेलवे स्टेशन से थोड़ी दूर पर स्थित इस दो मंज़िला इमारत को गांधी संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है.

वर्ष 1917 और 1934 के दौरान महात्मा गाँधी जब भी मुंबई आए, यहीं रहे.

बराक ओबामा महात्मा गाँधी को प्रेरणास्रोत मानते हैं. उनके सेनेट कार्यकाल के दौरान उनके दफ़्तर में महात्मा गाँधी की तस्वीर टंगी होती थी.

चालीस साल से मणि भवन की देख-रेख कर रहे मेघश्याम अजगाँवकर से मैंने पूछा कि यहाँ आने पर ओबामा को क्या सीखना चाहिए, तो उनका कहना था, "वे महात्मा गाँधी के सत्य, प्रेम, अहिंसा जैसे विचार यहाँ से ले जा सकते हैं".

अजगाँवकर ने बताया कि ओबामा करीब 40 मिनट मणि-भवन में रुकेंगे.

मणि भवन में गांधी 1917 से 1934 के बीच कई बार ठहरे थे

वे मणि भवन से जुड़ी एक और खास बात बताते हैं, "वर्ष 1959 के मार्च महीने में मार्टिन लूथर भारत की यात्रा पर मुंबई पहुँचे. उनके ठहरने का इंतज़ाम ताजमहल होटल में किया गया था. मणि-भवन पहुँचने के बाद उन्होंने वहाँ ट्रस्टी से अनुरोध किया कि उन्हें एक रात वहाँ रुकने दिया जाए तो मणि भवन के दूसरे तल पर उनके रुकने का इंतज़ाम किया गया. उस वक्त वहाँ गेस्ट रुम्स थे. ओबामा के लिए यहाँ आने का ये कारण भी है और वो इस बात को जानते हैं".

मार्टिन लूथर किंग की पत्नी कोरेटा किंग ने मणि भवन के बारे में लिखा,"मणिभवन में कुछ दिन रहना जैसे गांधीजी के साथ रहने जैसा अनुभव है. मुझे ये अनुभव प्रदान करने के लिए आपका शुक्रिया.''

अफ़गानिस्तान और इराक़ में लड़ाई लड़ रही अमेरिकी सेना के सर्वोच्च कमांडर राष्ट्रपति ओबामा अहिंसा के पाठ का कितना इस्तेमाल करते हैं, ये तो नहीं पता लेकिन मणि-भवन के लोग ओबामा की यात्रा को लेकर उत्साहित हैं.

मणि-भवन का इतिहास

महात्मा गाँधी ने स्वतंत्रता का आंदोलन यहाँ से चलाया. वर्ष 1917 से 1934 का वक़्त देश के स्वतंत्रता संग्राम के लिए बेहद महत्वपूर्ण था जब असहयोग आंदोलन, डांडी यात्रा, सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसे आम लोगों से जुड़े आंदोलन चले.

इस दौरान इस घर में कई बैठकें हुईं जिसमें देश के बड़े नेताओं ने हिस्सा लिया. जब गर्मी होती थी, तो बैठकों का दौर छत पर चलता था.

मणि भवन में गांधी जी का कमरा

वर्ष 1917 में मणि भवन के पास रोज़ आने वाले एक व्यक्ति से महात्मा गाँधी ने रूई धुनने के पहले पाठ सीखे. इसके अलावा उन्होंने चरखा कातना भी यहीं सीखा. वर्ष 1919 में जब उनकी तबीयत ख़राब थी तब कस्तूरबा गाँधी के आग्रह पर उन्होंने यहीं बकरी का दूध पीना शुरू किया.

यहीं से उन्होंने अंग्रेज़ी ‘यंग-इंडिया’ और गुजराती ‘नवजीवन’ साप्ताहिक पत्रों के संचालन की ज़िम्मेदारी संभाली. यहाँ अपने निवास के दौरान उन्होंने कई उपवास रखे और साथियों के साथ सलाह-मशवरे किए.

चार जनवरी 1932 को बड़े सवेरे गाँधीजी मणि भवन के छत पर उनके तंबू में से गिरफ़्तार किए गए. जून 27 और 28, 1934 को कांग्रेस कार्यकारिणी की एक और बैठक यहाँ हुई. यह महात्मा गाँधी का मणि-भवन में अंतिम प्रवास था.

मणि-भवन के ज़मीनी तल पर एक लाइब्रेरी है जिसमें महात्मा गाँधी और उनके विचारों से जुड़ी करीब 50 हज़ार किताबें हैं. पहले तल की सीढ़ियाँ चढ़ते समय आपको दीवारों पर महात्मा गाँधी की कई तस्वीरें टंगी दिखेंगी. पहले तल पर एक छोटा सा ऑडिटोरियम या प्रेक्षागृह है.

महात्मा गाँधी दूसरे तल पर बैठा करते थे. उस जगह को अब शीशे से सील कर दिया गया है. शीशे के पार देखें तो वहाँ चरखे, उनका टेलीफ़ोन और एक छोटा सा हाथ से झलने वाला पंखा नज़र आता है. हालांकि यहाँ रखा गद्दा और तकिया नया है.

महात्मा और पत्नी कस्तूरबा का काता हुआ सूत यहाँ रखा है. कमरे के साथ ही लगी हुई है एक गैलरी जहाँ खड़े होकर वो लोगों का अभिवादन स्वीकार करते थे.

इसके अलावा साथ ही बड़े हॉल में एक प्रदर्शनी लगी हुई है जिसमें महात्मा गाँधी के जीवन से जुड़ी विभिन्न घटनाओं की झांकियाँ प्रस्तुत की गई हैं. साथ ही के एक कमरे में रवींद्रनाथ टैगोर को लिखी चिट्ठी है. उसके बगल में साफ़ अक्षरों में सुभाष चंद्र बोस की लिखी चिट्ठी रखी हुई है.

अजगाँवकर बताते हैं कि ये इमारत रेवाशंकर जगजीवन झवेरी की थी जो महात्मा गाँधी के दोस्त थे, साथ ही मुंबई में उनके मेज़बान थे. इसका निर्माण वर्ष 1912 में हुआ था.

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