बेघर लोगों और जनजातियों की भी होगी गिनती

Image caption जनजातियों की गिनती करने के लिए खास उपाय

भारत के छह लाख से ज़्यादा गांवों और 7,000 शहरों में बसी सौ करोड़ से ज़्यादा की आबादी की गणना की जा रही है.

खास तौर पर शहरों में बसने वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जिनके पास रहने को घर नहीं हैं.

इन बेघर लोगों की गिनती के लिए जनगणना विभाग ने ख़ास तैयारी की है.

जनगणना आयुक्त सी चन्द्रमौली से बातचीत सुनने के लिए क्लिक करें

बीबीसी से विशेष बातचीत में जनगणना आयुक्त, च. चन्द्रमौली ने कहा, "क्योंकि इन लोगों का दिन में कोई एक ठिकाना नहीं होता, इसलिए इनकी गणना के लिए रात का समय तय किया गया है."

उन्होंने बताया कि जनगणना की प्रक्रिया 28 फरवरी 2011 को खत्म होगी, और उसी रात देश भर में सर्वेक्षक, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और रास्ते की पटरियों पर बेघर लोगों की गिनती करेंगे.

जनजातियों की गणना

अंडमान निकोबार द्वीप समूह जैसे इलाकों में ऐसी जनजातियां रहती हैं जो इंसानों से मेलजोल नहीं रखतीं और उनसे सम्पर्क रखना भी प्रतिबंधित है.

लेकिन इनकी गिनती भी ज़रूरी है, इसलिए सर्वेक्षक उन इलाकों के स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर कुछ अलग रास्ता निकालते हैं.

जनगणना आयुक्त चन्द्रमौली ने बताया कि, अक्सर इन द्वीपों की तरफ नाव के ज़रिए कम्बल और नारियल जैसे तोहफे भेजे जाते हैं.

इनसे आकर्षित हों जनजातियों के सदस्य द्वीप से पानी की तरफ आते हैं, तभी उनकी गणना हो पाती है.

पहाड़ी इलाकों में रहने वाले कई लोग अपनी भेड़-बकरियों को लेकर कई महीनों तक पहाड़ों के ऊपरी हिस्सों में कई महीनों तक रहने के लिए चले जाते हैं.

ऐसे इलाकों में पहले से सम्पर्क बनाकर इन लोगों तक इस प्रक्रिया की जानकारी पहुंचाई जाती है.

एक दिन और समय निर्धारित कर, इनकी गणना के लिए खास शिविर लगाए जाते हैं.

फरवरी में पूरी होगी जनगणना

अप्रैल 2010 में शुरू हुई इस प्रक्रिया में अब तक घरों के सूचीकरण और उनमें बिजली-पानी जैसी सुविधाओं की उपल्ब्धता की जानकारी जुटाई गई है.

इसके अलावा सुख-सुविधा के उपकरणों, जैसे टीवी, फ्रिज, कूलर, स्कूटर, कार इत्यादि का ब्यौरा भी लिया गया है.

अब मूल रूप से जनगणना 9 फरवरी से 28 फरवरी 2011 के दौरान की जाएगी.

इसमें हर नागरिक की शिक्षा, रोज़गार और धर्म इत्यादि के बारे में पूरी जानकारी ली जाएगी.

जातीय जनगणना इसके बाद अप्रैल या मई 2011 में की जाएगी.

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