कश्मीर, फुटबॉल और फ़िल्म

बशारत

बशारत के पिताजी चरमपंथी थे जिसके कारण उन्हें पासपोर्ट मिलने में दिक्कत हुई थी लेकिन अब उनके पास ब्राज़ील जाने का मौका है.

कश्मीर का ज़िक्र होते ही या तो बात होती है चरमपंथियों की, सुरक्षा बलों की या फिर ख़ूबसूरत वादियों की लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि फुटबॉल और कश्मीर का एक नया रिश्ता बना है.

कश्मीरी युवा अब ब्राज़ील और स्पेन जा रहे हैं फुटबॉल का प्रशिक्षण पाने. ऐसे ही एक युवा बशारत बाबा की आपबीती पर फ़िल्म भी बनी है.

इंशाअल्लाह फुटबॉल नाम से बनी फ़िल्म एक कश्मीरी फुटबॉलर की कहानी के ज़रिए कश्मीरी लोगों की आम ज़िंदगी बयां करने की कोशिश करती है.

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भारत में भले ही लोग क्रिकेट को लेकर दीवाने हों लेकिन पूरी दुनिया में फुटबॉल का खेल सबसे लोकप्रिय माना जाता है. ज़ाहिर है यह खेल कश्मीरी युवाओं को भी अत्यंत प्रिय है.

कश्मीर एक अच्छा विकल्प था क्योंकि यहां फुटबॉल बहुत लोकप्रिय है और यहां के बच्चों में प्रतिभा है. मैंने दिल्ली में कोचिंग दी थी लेकिन बहुत अच्छा नहीं रहा था. मुझे कश्मीर के हालात पता थे. लोगों ने मना किया लेकिन हम आए और अब हमारी एकेडेमी से बच्चे स्पेन और ब्राज़ील भी जा रहे हैं

मार्को, फुटबॉल कोच

शायद इसीलिए अर्जेंटीना के निवासी और ब्राज़ील में फुटबॉल कोच रहे मार्को ने कोचिंग देने के लिए कश्मीर को ही चुना. वो कहते हैं, ‘‘कश्मीर एक अच्छा विकल्प था क्योंकि यहां फुटबॉल बहुत लोकप्रिय है और यहां के बच्चों में प्रतिभा है. मैंने दिल्ली में कोचिंग दी थी लेकिन बहुत अच्छा नहीं रहा था. मुझे कश्मीर के हालात पता थे. लोगों ने मना किया लेकिन हम आए और अब हमारी एकेडेमी से बच्चे स्पेन और ब्राज़ील भी जा रहे हैं.’’

मार्को की ही एकेडेमी में खेलने आया एक 20 साल का लड़का भी जिसका नाम था बशारत. वो कहते हैं, ‘‘मैं मोहन बागान की एकेडेमी से लौटा था 2006 में तो मार्को के बारे में पता चला. मैं वहां गया. खेला तो मार्को ने इजाज़त दी आगे एकेडेमी में रहने की.’’

बशारत फुटबॉल खेलते हुए

बशारत फुटबॉल के बेहतरीन खिलाड़ी हैं

बशारत का खेल ज़बर्दस्त था लेकिन वो कश्मीरी भी था. कुछ समय पहले जब बशारत को ब्राज़ील में क्लब स्तर पर खेलने का न्योता आया तो उसे खुशी हुई लेकिन विदेश जाने के लिए उसे पासपोर्ट नहीं दिया गया.

वो कहते हैं, ‘‘ ब्राज़ील और स्पेन से ऑफर था लेकिन पासपोर्ट नहीं था. जब मैंने पासपोर्ट के लिए अप्लाई किया तो अधिकारियों ने कहा कि मुझे पासपोर्ट नहीं मिलेगा क्योंकि मेरे वालिद आतंकवादी थे. मेरे वालिद बशीर 1989 में आतंकवादी थे फिर उन्होंने वो रास्ता छोड़ दिया. मैं 91 में पैदा हुआ. इसमें मेरी क्या ग़लती है. लेकिन पासपोर्ट नहीं मिला.’’

जब अखबारों में ये ख़बर छपी तो मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने नोटिस लिया और बशारत को पासपोर्ट मिल गया लेकिन तब तक ब्राज़ील और स्पेन के ऑफर जा चुके थे.

अब इस साल बशारत के पास फिर से ऑफर आए हैं और वो इंतज़ार कर रहे हैं ज़रुरी कार्यवाही पूरी होने का. वो कहते हैं, ‘‘ अभी ब्राज़ील का ऑफर है. पेपर वर्क हो रहा है. इंशाअल्लाह जल्दी ही वहां खेलने का मौका मिलेगा.’’

जिन दिनों बशारत को समस्या हो रही थी उन्हीं दिनों फ़िल्ममेकर अश्विन कुमार मार्को की एकेडेमी में कश्मीर और फुटबॉल से जुडी़ फ़िल्म पर काम कर रहे थे.

फुटबॉल क्या कोई भी खेल अच्छा होता है. मैं फुटबॉलर हूं तो ये उदाहरण देता हूं. युवा लोगों को खेलना चाहिए. इससे ध्यान हटता है बहुत सारे उन कामों से जो नहीं करना चाहिए. खेल तो अच्छा होता ही है.इससे मांइड डाइवर्ट होता है. ये अच्छी बात है

बशारत, फुटबॉल खिलाड़ी

वो कहते हैं, ‘‘असल में हम लोग हनान मीर और मुसद्दिक मेहराज़ पर डॉक्यूमेंट्री बना रहे थे. ये दोनों बच्चे फुटबॉल खेलने स्पेन जा रहे थे. जब हमने 14-15 दिन शूटिंग की तो बशारत के बारे में पता चला. मुझे लगा कि इस कहानी में अधिक दम है. एक लड़का है जिसको मौका मिला लेकिन वो जा नहीं पा रहा है पासपोर्ट के कारण. फिर हमने बशारत को केंद्र में रख कर फ़िल्म बनाई’’

अश्विन की फ़िल्म इंशाअल्लाह फुटबॉल अब रीलिज़ होने वाली है.

फ़िल्म के बारे में जाने माने अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि ये फ़िल्म खेल से बढ़कर है जबकि तहलका ने भी फ़िल्म की तारीफ़ की है.

अश्विन कुमार

अश्विन इससे पहले लिटिल टेररिस्ट जैसी बेहतरीन फ़िल्म भी बना चुके हैं.

अश्विन कहते हैं, ‘‘ मेरी कोशिश थी कि लोगों को एक बात कही जाए बशारत और उसके पिता के संबंधों के ज़रिए कि कश्मीर के लोग क्या सोचते हैं. उन्हें क्या पसंद है. वो अपने आपको कैसे देखते हैं. एक बात जो एक कहानी के ज़रिए कही जा सकती थी. मैंने बस यही कोशिश की है.’’

कश्मीरियों का और ख़ासकर कश्मीरी युवा की ज़िंदगी आसान तो नहीं कही जा सकती है लेकिन फुटबॉल का कोई और खेल इनके जीवन में एकअलग रंग ज़रुर भरता है.

बशारत कहते हैं, ‘‘ फुटबॉल क्या कोई भी खेल अच्छा होता है. मैं फुटबॉलर हूं तो ये उदाहरण देता हूं. युवा लोगों को खेलना चाहिए. इससे ध्यान हटता है बहुत सारे उन कामों से जो नहीं करना चाहिए. खेल तो अच्छा होता ही है.इससे मांइड डाइवर्ट होता है. ये अच्छी बात है.’’

बशारत की कहानी का तो सुखद अंत होता दिखता है लेकिन कश्मीर में अभी हज़ारों और युवा हैं जिन्हें बंदूक और पत्थरबाज़ी से निकलने के लिए फुटबॉल, क्रिकेट या किसी और खेल का सहारा लेना बाकी है.

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