गंगा ऐक्शन प्लान पर सवाल

गंगा में प्रदूषण

जलपुरूष कहे जानेवाले राजेंद्र सिंह ने गोमुख से गंगासागर तक गंगा पंचायत यात्रा के बाद आरोप लगाया है कि गंगा ऐक्शन प्लान के तहत करोड़ों की लागत से बनाये गये 40 में से एक भी सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट काम नहीं कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि गंगा एक्शन प्लान इसलिए विफल रहा क्योंकि इसमें लोगों की हिस्सेदारी नहीं थी और लोगों को यही लगा कि ये सरकार का काम है.

गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिये राजेंद्र सिंह ने गंगा के लिये तीन स्तरों पर पंचायत बनाने की मांग की है.

उन्होंने कहा, “गांवों के स्तर पर गंगा पंचायत, शहरों के स्तर पर गंगा पालिका और राज्य के स्तर पर गंगा परिषद हो और इन तीनों को मिलाकर एक महापंचायत बने.”

राजेंद्र सिंह के अनुसार, “नदियों को पुनर्जीवित करने का नदियों को शुद्ध सदानीरा बनाने का लक्ष्य तभी पूरा हो सकता है जब भारत का समाज गंगा से जुडकर गंगा पर अपना मालिकाना का भाव रखे, एक तरह से गंगा के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी और हक़दारी पूरी करने का एहसास उसके मन में जागे.”

राजेंद्र सिंह ने गंगा पंचायत यात्रा के तहत गंगा के उदगम गोमुख से गंगासागर और गंगासागर से वापस गोमुख तक यात्रा की और ख़ासतौर पर उत्तराखंड में उन्होंने गंगा पर बन रहे बांधों को रोकने की मांग की.

इसका यहां स्थानीय लोगों द्वारा विरोध भी किया गया जिससे राजेंद्र सिंह को अपने मार्ग बदलने पड़े.

लेकिन राजेंद्र सिंह ने इस विरोध को अनुचित बताते हुए कहा, “गंगा सिर्फ उत्तराखंड की नहीं राष्ट्रीय नदी है और इसकी पवित्रता और शुद्धता के लिये बांधों का निर्माण हर क़ीमत पर रूकना ही चाहिए.”

परियोजनाएँ रुकीं

Image caption राजेंद्र सिंह गंगा पर बिजली परियोजनाओं के ख़िलाफ़ हैं

ग़ौरतलब है कि इसी हफ्ते केंद्र ने उत्तराखंड की तीन बड़ी बिजली परियोजनाओं लोहारीनाग,भैंरोघाटी और पाला मनेरी को रद्द कर दिया गया है.

इन पर 40 फीसदी काम पूरा हो चुका था और 800 करोड़ से अधिक खर्च किए जा चुके थे.

गंगा की अविरलता और आस्था को लेकर चले कई धार्मिक आंदोलनों और पर्यावरणीय कारणों से ये निर्णय किया गया.

कई स्थानीय संगठनों ने इसे भी विकास विरोधी फ़ैसला करार दिया है.

मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने भी इसके एवज में केंद्र से 2000 मेगावाट बिजली मुफ़्त मांगी है.

पानी और बिजली

दरअसल गंगा को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने के बाद से गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का दावा करने वाले अनेक धार्मिक संगठन भी अपने-अपने दावे के साथ गंगा की कथित रक्षा के आंदोलन में दिखाई दे रहे हैं .

राजेंद्र सिंह ने कहा, “धार्मिक आस्था का सवाल आज पर्यावरण पर भारी दिखता है . कुछ राजनीतिक पार्टियों ने इसे अपना एजेंडा बनाया, इसमें राजनीतिक रंग भी दिखता है,जिससे नुक़सान हो रहा है.”

पर्यावरण और आस्था के तमाम सवालों के बीच महत्वपूर्ण बात ये भी है कि उत्तर भारत की अधिकांश छोटी बड़ी नदियाँ उत्तराखंड से निकलती हैं लेकिन यहां पानी और बिजली का असाधारण संकट है.

इस पर टिप्पणी करते हुए राजेंद्र सिंह ने कहा, “जिनका पानी जिनकी ऊर्जा उनको न मिले वो ग़लत है. ये दुर्दशा सरकारी सदिच्छा के अभाव और राजनीतिक खेल के कारण हुई है."

उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि उत्तराखंड का समाज अपने सामुदायिक जल प्रबंधन पर आ जाए तो उत्तराखंड का समाज पूरे भारत को अपनी मुठ्ठी में रखकर पूछ सकता है कि हम तुम्हें पानी दे रहे हैं तुम हमें क्या दे रहे हो?”