'घट रहा है एड्स का ख़तरा'

Image caption पीड़ितों के साथ भेदभाव बरते जाने के एड्स के शिकार लोगों की दिक्क़ते कम नहीं हो रही हैं.

संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएड्स ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि जानलेवा बीमारी एड्स के ख़िलाफ़ लड़ाई में भारत ने पिछले एक दशक में काफ़ी सफलता हासिल की है.

मंगलवार को जेनेवा में जारी रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में एड्स के शिकार होने वाले लोगों में पिछले दस सालों में 50 प्रतिशत की कमी आई है.

यूएनएड्स के कार्यकारी निदेशक माइकल सिडिबे ने कहा कि भारत ने सस्ती दवा बनाकर अफ़्रीक़ा में भी इसके ख़िलाफ़ लड़ाई में काफ़ी मदद की है

सिडिबे ने कहा, '' भारत में एड्स के शिकार लोगों में 50 प्रतिशत की कमी आई है और भारत की दवाई कंपनियों ने सस्ती दवा को ग़रीब देशों में निर्यात कर एड्स के इलाज में एक अहम भूमिका निभाई है. ''

संख्या में कमी

एक अनुमान के मुताबिक़ भारत में पिछले साल तक 24 लाख लोग एचआईवी वायरस से संक्रमित थे जबकि 2001 में ये संख्या 25 लाख थी.

भारत में इस समय एड्स वायरस से पीड़ित छह लाख ऐसे लोग हैं जिनका इलाज नहीं हो पा रहा है.

सिडिबे ने हाल ही में पोप के ज़्ररिए संभोग के समय कंडोम के इस्तेमाल को हरी झंडी दिए जाने की तारीफ़ करते हुए कहा कि इससे एड्स की रोकथाम में काफ़ी मदद मिलेगी.

रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया भर में एचआईवी संक्रमण के शिकार होने वाले और एड्स से मरने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है.

रिपोर्ट के अनुसार ऐसे साफ़ संकेत मिल रहे हैं कि इस बीमारी में कमी आ रही है लेकिन अभी भी इससे पीड़ीत लोगों के प्रति भेदभाव बरते जाने और समाज में इस बीमारी के बारे में एक ख़ास क़िस्म का नज़रिया रखने के कारण एड्स के शिकार लोगों की दिक्क़ते कम नहीं हो रही हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक़ इस वक़्त दुनिया भर में तीन करोड़ 30 लाख लोग एचआईवी एड्स के शिकार हैं.

पिछले साल 26 लाख लोग इस संक्रमण के शिकार हुए थे.1999 के मुक़ाबले में जब ये बीमारी अपने चरम सीमा पर थी इसमें 20 प्रतिशत की कमी आई है.

साल 2009 में एड्स से जुड़ी बीमारियों के कारण 18 लाख लोगों की मौत हो गई थी. जबकि साल 2004 में 21 लाख लोग एड्स की वजह से मौत के आग़ोश में चले गए थे.

दवाओं का इस्तेमाल बढ़ा

रिपोर्ट का कहना है कि इसके उपचार के लिए एंटीरेट्रोवायरल दवाओं का इस्तेमाल बढ़ा है.2004 में जहां सात लाख लोग इसका प्रयोग करते थे और 2009 में पांच लाख लोगों ने एंटीरेट्रोवायरल दवाओं का इस्तेमाल किया.

यूएनएड्स ने चेतावनी दी है कि अफ़्रीक़ा अभी भी इस बीमारी से सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाला क्षेत्र बना हुआ है.

इस संक्रमण के शिकार होने वाले नए लोगों में लगभग 70 प्रतिशत लोग अफ़्रीक़ी देशों से आते है.

लेकिन ख़ुशी की बात ये है कि दक्षिण अफ़्रीक़ा, ज़ांबिया, ज़िंबाब्वे और यूथोपिया में संक्रमण का दर घट रहा है.

दुनिया के दूसरे भागों में भी इसी तरह की मिले जुले ख़बरे आ रही हैं.

पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया में एड्स तेज़ी से फैल रहा हैं और इनसे मरने वालों की संख्या में इज़ाफ़ा हो रहा है.

जारी रहें प्रयास

एशिया में कुछ आकंड़ो के मुताबिक़ इसकी रोकथाम में काफ़ी उत्साहवर्धक नतीजे मिले हैं जबकि दूसरे कुछ इलाकों से मिली जानकारी के अनुसार इस बीमारी को रोकने के लिए अभी बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है.

दक्षिण एशिया में एड़्स के शिकार होने वालों बच्चों और इससे मरने वालों की तादाद में कमी आ रही है.

एशिया में अलग अलग देशों में अलग अलग कारणों से ये बीमारी फैल रही है.

थाईलैंड और वियतनाम में नशीली दवा लेने वाले इसके ज़्यादा शिकार हो रहे है जबकि

बर्मा, इंडोनेशिया और दक्षिण भारत में पुरुषों का पुरूषों के साथ यौन संबंध रखने वालों से ये बीमारी तेज़ी से फैल रही है.

बर्मा में हर पांच महिला यौन कर्मी में से एक एचआईवी की शिकार है.

ख़त्म हो भेदभाव

वैश्विक आर्थिक संकट के कारण पिछले दो साल में एड्स की रोकथाम के लिए किए जा रहे ख़र्च में कमी आई है. यूरोप के अमीर देशों ने एड्स के लिए दी जाने वाली सहायता राशी में लगभग 60 करोड़ डॉलर की कमी कर दी है जिसके कारण छोटे और ग़रीब देशों को ख़ुद ही पैसे का इंतज़ाम करना पड़ा है.

भारत ने एड्स की रोकथाम के लिए पिछले साल कुल एक अरब 40 करोड़ डॉलर ख़र्च किए थे जबकि 2008 में उसने एक अरब 50 करोड़ डॉलर ख़र्च किए थे.

संस्था के मुताबिक़ एशिया में एड्स की रोकथाम के लिए उठाए जा रहे क़दमों मे सबसे बड़ी बाधा उन देशों के क़ानून हैं जहां एड्स से ग्रसित लोगों से भेदभाव किया जाता है.

एशिया में ज़्यादातर देशों में समलैंगिकता और वेश्यावृति एक अपराध है और नशीली दवा लेने वालों के लिए क़ानून बहुत सख़्त है जिस कारण उनलोगों तक पहुंचना बहुत मुश्किल हो जाता है.

लेकिन यूएनएड्स के कार्यकारी निदेशक माइकल सिडिबे ने कहा कि कड़ी कार्रवाई और सावधानी से उठाए गए क़दमों के कारण इसकी रोकथाम में सफलता मिल रही है.

एड्स की रोकथाम के लिए जितना ख़र्च किया जा रहा है उसके बेहतर नतीजे मिल रहे हैं लेकिन ये कामयाबी अभी भी थोड़ी है और अब चुनौती इस बात की है कि इसमें और अधिक सफलता पाने के लिए हम सभी लोग एक साथ मिलकर कैसे काम करे.

संबंधित समाचार