'ज़रुरतों से लड़ने की ताकत होनी चाहिए'

Image caption खेले हम जी जान से की म्यूज़िक रिलीज़ पर कलाकारों के साथ दिलीप देव

मुंबई फ़िल्मोद्योग में किसी समय जाने-माने घरानों और चर्चित परिवारों के सदस्य छाए हुए थे. लेकिन अब छोटे शहरों के लोग भी धीरे धीरे वहाँ अपना मुकाम बना रहे हैं. इस शृंखला में आपको मिलवाएँगे ऐसे ही कुछ लोगों से जो संघर्ष की सीढ़ी चढ़ कर फ़िल्मोद्योग में सफल हुए हैं.

इस कड़ी में पहले मिलिए दिलीप देव से जो रांची के रहने वाले हैं और इस समय आशुतोष गोवारीकर कि फ़िल्म खेले हम जी जान से का फ़िल्म संपादन कर रहे हैं.

दिलीप फ़िल्म इंडस्ट्री में कैसे आना हुआ और क्या पहले से सोचा था कि इसी क्षेत्र में आना है.

मैं रांची का रहने वाला हूं. मैंने सेंट ज़ेवियर्स में पढ़ाई की. हम लोग वहां थिएटर किया करते थे. तो रुचि थी लेकिन मेरे लिए एक बात साफ़ थी कि मुझे फ़िल्म एडीटर ही बनना है. कई लोगों से मिला और इन्हीं मुलाक़ातों के दौरान मुझे सतीश कौशिक जी ने काम दिया. मेरे पास रहने की जगह नहीं थी पैसे भी बहुत नहीं थे. सतीश जी ने 'इन हाउस अप्रेंटिस' जैसा काम दिया. उस समय एक फ़िल्म का काम चल रहा था - बधाई हो बधाई - वहीं से काम करना शुरु किया.

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कैसा संघर्ष रहा आपका एक छोटे शहर से होने के नाते.

जब लोग छोटे शहरों से आते हैं तो मुंबई या बंबई कहिए जहां रहने खाने की समस्या होती है. लेकिन यह निर्भर करता है आपके सपने पर. सपने आपको समस्याओं में भी लड़ने की शक्ति देते हैं. मेरे करियर में अभी तक ऐसा दौर नहीं आया जब मुझे ये लगा कि मुझे वापस लौटना चाहिए.

इसकी कोई ख़ास वजह

हां, असल में जब भी मैं कोई फ़ैसला करता हूं तो कई जानकार लोगों से राय लेता हूं.ये लोग हमेशा कहते थे कि कोशिश करो उन लोगों के साथ रहने की जिनमें पॉजिटिव एनर्जी हो. मैं ऐसा ही करता था तो हमेशा पॉजिटिव सोचता हूं. जब ऐसी सोच संघर्ष में आती है तो संघर्ष संघर्ष नहीं रह जाता बल्कि एक यात्रा हो जाती है.

बड़ी फ़िल्म का ब्रेक कैसे मिला और क्या अनुभव रहे

देखिए मेरे साथ एक अच्छी बात हुई कि सतीश कौशिक जी के प्रोडक्शन से जुड़े होने के कारण कई लोगों से मुलाक़ातें होती गईं. लोग काम देखते थे. बोनी कपूर जी ने मेरा काम देखा था. उनकी फ़िल्म थी - वॉंटेड. बोनी जी को मुझ पर भरोसा था और उन्होंने वांटेड के संपादन का काम मुझे दिया. फ़िल्म के निर्देशक प्रभुदेवा को भी मेरा काम पसंद था. मैंने कुछ अलग से किया संपादन जो उन्हें पसंद आया. वॉंटेड आई और लोगों ने पसंद की फ़िल्म हिट हो गई.

आशुतोष गोवारिकर के साथ भी आप काम कर रहे हैं.

आशुजी के साथ मैं पहले भी काम कर चुका हूं. जोधा अकबर में मैं चीफ असिस्टेंट एडीटर था. उन्होंने मुझे अपनी नई फ़िल्म ‘खेले हम जी जान से’ दी है.

गोवारीकर जी की फ़िल्में लंबी बहुत होती हैं तो इसमें क्या आपका यानी एडीटर का काम बढ़ जाता है.

बढ़ता नहीं है ये हमारा काम ही है कि पोस्ट प्रोडक्शन में जो मैटर मिला है उसका ऐसा संपादन हो जो निर्देशक के विज़न के अनुसार हो. आशुतोष जी की फ़िल्मों का अपना विज़न है जो एक अवधि में ही पूरी तरह दिखाया जा सकता है. आप नई फ़िल्म में भी देखेंगे कि भले ही लंबी लगें लेकिन लोग बोर नहीं होगे क्योंकि इसी में चरित्रों के साथ न्याय हो पाएगा.

रांची से मुंबई का सफ़र कैसा रहा

मैं नहीं मानता कि अब स्थापित हो गया हूं. अभी तो ये पड़ाव हैं. मेरी यात्रा शुरु हुई है. छोटे शहरों से लोग आते हैं. मुझे बहुत सपोर्ट था परिवार का और दोस्तों का भी. अभी और बहुत कुछ करना है. जो भी करियर चुनें उसमें सोचना चाहिए कि जिस रास्ते पर जा रहे हैं उसमें किस तरह की समस्याएं आएंगी. जो समस्याएं आएं उनसे लड़ने के साधन कहां से आएंगे. उनके लिए तैयार रहना चाहिए. लक्ष्य तय करना चाहिए और ज़रुरतों को जान लें तो इससे लड़ने की ताकत अपने आप मिल जाती है.