'अपना मुहावरा गढ़ना है'

प्रवेश भारद्वाज
Image caption प्रवेश कहते हैं कि अगर उनकी अपनी फ़िल्म बीस साल बाद उनके पसंदीदा फ़िल्मों की लिस्ट में आए तो बड़ी बात होगी तस्वीरें-मानसी पिंगले

मुंबई फ़िल्मोद्योग में छोटे शहरों के लोग अब धीरे धीरे अपना मुकाम बना रहे हैं. इस शृंखला में आपको मिलवाएंगे ऐसे ही कुछ लोगों से जो संघर्ष की सीढ़ी चढ़ कर फ़िल्मोद्योग में सफल हुए हैं. प्रवेश भारद्वाज को सफलता थोड़ी देर से मिली लेकिन अब उनके पास काम की कमी नहीं है. उनकी कहानी उन्हीं की ज़ुबानी.

मैं लखनऊ, उन्नावं, बरेली में रहा हूं. हमारा परिवार फ़िल्म प्रेमी कहा जा सकता है. हम लोग फ़िल्में खूब देखते थे.जब मैं 1992 में मुंबई आया था तब टीवी वगैरह का इतना ताम झाम नहीं था.

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मैं बचपन से ही फ़िल्मों में आना चाहता था. मुझे याद है जब मैं छोटा था और फ़िल्म देख कर आता था तो क्लास के बच्चों को फ़िल्म की कहानी की बजाय अपनी कहानी बना कर सुना देता था. बाद में बच्चों को अगर मेरी वाली कहानी फ़िल्म में नहीं मिली तो पिटाई हो जाती थी.

मैं मां बाप से झगड़ के नहीं आया था मुंबई. मां पापा ने बहुत सपोर्ट किया. मैं बस 21-22 साल का था. पापा ने कहा कि कोई कोर्स करोगे तो भी पैसे देने ही हैं तो जाओ छह महीने देख लो. सीमित खर्चा तो दिया जाएगा.

मैंने मुंबई आकर कोई और करियर नहीं देखा. चूंकि घर का सपोर्ट था तो मैंने फ़िल्मों में ही काम खोजा. सबसे पहला काम श्याम बेनेगल जी के साथ मिला. उनकी फ़िल्म थी सूरज का सातवां घोड़ा. उसमें सहायक निर्देशक की तरह काम करना सीखा.

इसके बाद कई और लोगों के साथ काम करने का मौका मिला. गोविंद निहलानी के साथ हज़ार चौरासी की मां में सहायक निर्देशक था. अरुणा राजे, हेमा जी के साथ भी काम किया.

Image caption प्रवेश की फ़िल्म मिस्टर सिंह मिसेज मेहता की शूटिंग लंदन में हुई है. तस्वीरें- मानसी पिंगले

तब समझ में आया कि लिखना भी ज़रुरी है. कहानी होना ज़रुरी है.

1999 में सोनी के लिए एक धारावाहिक बनाया शाहीन. सीरियल चला नहीं और टीवी चैनल ने निकाल दिया.

कुछ पैसे थे तो बैठ कर स्क्रिप्ट लिखी और इस कहानी को लेकर लोगों के पास गया. और भी स्क्रिप्टें लिखीं. किसी को एक कहानी पसंद आई और फिर यही कहानी आगे चलकर बनी मिस्टर सिंह मिसेज़ मेहता.

मैं साठ सत्तर लोगों के पास गया था यह फ़िल्म लेकर लेकिन एक ने ही पैसा लगाया. लंदन में शूट हुई फ़िल्म 2010 में रीलिज़ हुई.

अभी एक फ़िल्म कर रहा हूं नियति जो बिहार में होने वाली ज़बरिया शादी पर है. यथार्थवादी बैकग्राउंड है इस फ़िल्म का. उम्मीद है लोगों को पसंद आएगी.

छोटे शहर का होने की सबसे बड़ी मुश्किल ये होती थी कि कोई जानता नहीं था. अगर मेरा भी कोई चाचा, मामा, ताया मुंबई में होता तो शायद काफ़ी मदद मिल जाती. कम से कम रहने की, खाने की और शहर का भूगोल समझने में दिक्कत नहीं होती.

काफ़ी समय तो मेरा यही खोजने में निकल जाता था कि कौन सा स्टूडियो कहां है. कैसे मिलना है. मुंबई का होता तो शायद थोड़ी आसानी मुझे ज़रुर होती इसमें कोई शक नहीं.

जहां तक हिट फ़िल्मों का सवाल है लोगों की रुचि का सवाल है तो ये देखने वाली बात है कि जिनकी फ़िल्में पाँच साल पहले सुपर हिट होती थीं उनके पास काम नहीं है. कई निर्देशक ऐसे हैं.

बड़ी बड़ी फ़िल्मों के बारे में कुछ नहीं कह सकता क्योंकि उस स्तर पर नहीं हूं. उनका एक अलग पूरा का पूरा सेट अप होता है. मार्केटिंग आदि आदि...मैं कह नहीं सकता.

जहां अभी पहुंचा हूं उसके बारे में क्या कह सकता हूं. फ़िल्म बन गई ये ही बहुत बड़ी बात है. हां ये ज़रुर चाहता हूं मैं फ़िल्मों में अपना एक अलग सुर बना सकूं.

इससे ये मतलब है कि जैसे अगर आप किसी को पसंद करते हैं तो उस व्यक्ति का अपना निजी मुहावरा होता है.. सारी लड़ाई मेरी इसी से है कि मैं अपना निजी मुहावरा गढ़ पाऊं और उसे साबित कर पाऊं.

अगर आज से बीस साल बाद ऐसी फ़िल्म बना पाऊं जो मेरी फेवरिट फ़िल्मों में आ जाए तो क्या ही बात होगी.