पंचायत चुनाव के दूसरे चरण में 67 प्रतिशत मतदान

झारखंड में चुनाव
Image caption माओवादियों के बहिष्कार के बावजूद अबतक पंचायत चुनाव शांतिपूर्ण रहे हैं.

माओवादियों के चुनाव बहिष्कार के आहवान और बर्फ़ीली हवाओं के बावजूद झारखण्ड में हो रहे पंचायत के चुनाव के दूसरे चरण का मतदान शांतिपूर्ण रहा.

दूसरे चरण के लिए सोमवार को राज्य के 24 में से 23 जिलों में मतदान हुआ और इस दौरान 67.04 प्रतिशत वोट पड़े.

चूँकि झारखण्ड के सभी 24 ज़िले नक्सल प्रभावित हैं इस लिए यहाँ मतदान का समय सुबह सात बजे से दोपहर तीन बजे तक निर्धारित किया गया. दूसरे चरण में 23 ज़िलों के 71 ब्लाक की 1291 पंचायतों के विभिन्न पदों के लिए मतदान हुआ जिसमें कुल मिलकर 47,406 उम्मीदवार मैदान में थे. इनमें से 50 प्रतिशत महिलाएं थीं. राज्य निर्वाचन आयोग के सचिव मनोज झा नें पत्रकारों को बताया कि छिटपुट घटनाओं को छोड़,दूसरे चरण का मतदान शांतिपूर्ण रहा. इस चुनाव का सबसे अहम पहलु है कि नक्सल प्रभावित गिरिडीह जिले में 75 प्रतिशन मतदान दर्ज किया गया है.

नक्सली प्रभाव

Image caption झारखंड के सभी ज़िले नक्सल प्रभावित हैं

हांलाकि माओवादियों नें पंचायत चुनाव का बहिष्कार करने का आहवान किया है मगर ऐसे आरोप लग रहे हैं कि 27 नवम्बर को पहले चरण के मतदान के बाद कम से कम तीन हज़ार उम्मीदवार ऐसे हैं जिन्हें निर्विरोध चुन लिया जाएगा.

कहा जा रहा है कि इनमे से ज़्यादातर उम्मीदवारों को या तो नक्सलियों का समर्थन है या फिर किसी स्थानीय नक्सली नेता के रिश्तेदार हैं.

दूसरे चरण में भी ऐसी ही खबरें मिल रहीं हैं. उधर दिल्ली में एक सेमिनार में भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम ने भी नक्सलियों के चुने जाने की आशंका ज़ाहिर की. लेकिन वे इस बात से चिंतित नहीं दिखे.

पी चिदंबरम ने सोमवार को दिल्ली में कहा, "ये संभव है कि कुछ नक्सली इन चुनावों में जीत जाएं. संभव है कि पंचायत के ग्रामीण और ब्लॉक स्तर पर नक्सलवादी कब्ज़ा कर लें. लेकिन तो क्या...कम से कम वो लोगों के प्रति जवाबदेह तो होंगे."

अरसे बाद चुनाव

झारखण्ड में पंचायत के चुनाव 32 साल बाद हो रहे हैं. पिछली बार इन इलाक़ों में पंचायत के चुनाव वर्ष 1979 में हुए थे जब झारखण्ड अविभाजित बिहार का हिस्सा था.

संविधान की पांचवी अनुसूची का राज्य होने के कारण झारखंड में पंचायत चुनाव 'पंचायत राज एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरिया एक्ट ' यानी के "पेसा" के तहत कराये जा रहे हैं. पेसा के प्रावधानों के अनुसार पंचों के पदों में से प्रमुख के पद अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित किया गया है. इस मुद्दे को लेकर झारखण्ड में काफी विरोध भी हुआ था और मामला उच्चतम न्यायलय पहुँच गया था. बाद में उच्चतम न्यायलय के निर्देश पर ही चुनाव पेसा के तहत ही कराये जा रहे हैं.

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