नामी स्कूलों की मनमानी

Image caption कैग का आंकलन है कि शिक्षा विभाग की कमज़ोर निगरानी की वजह से स्कूल फ़ीस बढ़ाते गए

कैग ने दिल्ली के 25 पब्लिक स्कूलों के वित्तीय खातों की जांच में पाया है कि छठे वेतन आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने के एवज़ में स्कूलों ने फ़ीस बढाकर छात्रों पर अतिरिक्त वित्तीय भार डाला, जबकि स्कूलों के पास पहले से ही धन मौज़ूद था.

नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानि कैग ने इन 25 स्कूलों में दिल्ली के कई नामी स्कूल शामिल हैं. कैग ने दिल्ली के शिक्षा विभाग की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि शिक्षा विभाग की कमज़ोर निगरानी की वजह से स्कूल फ़ीस बढ़ाते गए.

कैग ने पाया कि 25 में से 22 स्कूलों के पास इतना धन मौजूद था कि वो बढे़ हुए ख़र्चों को वहन कर सकें लेकिन फिर भी इन स्कूलों ने फ़ीस में बढोत्तरी की. फ़ीस बढाने से पहले इन स्कूलों ने अभिभावक संघ (यानी पीटीए) को भी विश्वास में नहीं लिया.

इन में से अधिकतर स्कूलों ने गरीब बच्चों के लिए आरक्षित सीटों को भरने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, ना ही इस कोटे की ख़ाली बची सीटों का ब्यौरा शिक्षा विभाग को भेजा गया.

सिर्फ़ तीन स्कूलों नें ख़ाली बची सीटों का ब्यौरा शिक्षा विभाग को भेजा, लेकिन शिक्षा विभाग ने भी उन सीटों को भरने के लिए किसी को नामांकित नहीं किया.

इस रिपोर्ट में उन स्कूलों की भी सूची दी गई है जिनके पास सबसे ज़्यादा धन है, इस सूची में पाँच शीर्ष स्कूल हैं, दिल्ली पब्लिक स्कूल, समरफिल्ड स्कूल, वसंत वैली स्कूल, मॉडर्न स्कूल और एएसएन स्कूल.

अधिक फ़ीस वसूली

कैग ने अधिक फ़ीस वसूल कर सबसे ज्यादा धन अर्जित करने वाले स्कूलों की भी लिस्ट बनाई है. इस सूची में जीडी गोयनका स्कूल, सचदेवा स्कूल, वसंत वैली स्कूल, माउंट कार्मल स्कूल और कॉनवेंट ऑफ जीजस मैरी स्कूल शामिल हैं.

दिल्ली के पब्लिक स्कूलों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था ‘एक्शन कमेटी फॉर अनएडेड रेकोग्नाईज़्ड प्राईवेट स्कूल’ के अध्यक्ष एसके भट्टाचार्य स्कूलों का बचाव करते हुए कहते हैं, " ये तय कर पाना मुश्किल है कि कौन सा पैसा स्कूल के पास रिज़र्व है? अगर स्कूल ने एक ऑडिटोरियम बनाने के लिए पाँच करोड़ रुपये इकट्ठे किए हैं तो ये कैसे कह सकते हैं कि ये पैसा स्कूल के पास अतिरिक्त है."

कैग ने पाया कि कई स्कूलों के खर्चे, आमदनी के मुताबिक थे और फ़ीस बढाने की कोई ज़रुरत नहीं थी.

पैसे का ग़लत भुगतान

क़ानूनों की अनदेखी करते हुए इनमें से नौ स्कूलों ने अपनी सोसाइटियों को पैसे का भुगतान किया.

सरदार पटेल विद्यालय नें 2 करोड़ 33 लाख रुपये गुजरात एजुकेशन सोसाईटी को दिए, जबकि बिरला विद्या निकेतन ने 5 करोड़ 33 लाख रुपये अपनी एक सोसाईटी को किराए के रुप में दिए.

जीडी गोईनका स्कूल ने तो 'जीडी गोईनका एजुकेशन सोसाईटी' को 4 करोड़ 10 लाख रुपये का कर्ज़ दे दिया वो भी बिना ब्याज़, जबकि खु़द स्कूल ने 12.5 प्रतिशत ब्याज़ पर 6 करोड़ 33 लाख रुपये का कर्ज़ पर लिय़ा हुआ है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि दस स्कूलों ने विकास शुल्क को आमदनी के तौर पर लिया और स्कूल का विकास करने के बजाय स्कूल के आम ख़र्चों में इस फ़ंड का इस्तेमाल किया.

विकास फ़ंड को आम खर्चों में खपाया

कैग ने माना कि स्कूल ने ये सब मौजूदा फ़ड को खपाने के लिए किया ताकि आगे फिर से बच्चों से विकास फ़ंड हासिल किया जा सके.

रिपोर्ट में एक जगह लिखा गया है कि समर फ़ील्ड स्कूल ने 3 कारोड़ 51 लाख के विकास फ़ंड और 1 करोड़ 41 लाख के विज्ञान और परिवहन फ़ंड को स्कूल के आम फ़ंड में डाल दिया ताकि इनके नाम पर फिर से वसूली की जा सके.

जब बीबीसी ने समर फील्ड के इस लेनदेन पर एसके भट्टाचार्य से सवाल किया तो उन्होने कहा "अगर कैग द्वारा कही गई बात सही है तो ये ग़लत है."

सालाना निरीक्षण नहीं

रिपोर्ट में एक और अनियमितता का जिक्र करते हुए कहा गया है कि डीपीएस आरके पुरम ने पीटीए फ़ंड में 1 करोड़ 7 लाख रुपये होते हुए भी स्कॉलरशिप फ़ंड के नाम पर 2008-09 में 86 लाख 23 हज़ार रुपये वसूल किए, जबकि दोनों फ़ंड का मक़सद एक है.

इन 25 स्कूलों में से 2006-07 और 2007-08 सत्र में शिक्षा विभाग ने दोनों साल तीन-तीन स्कूलों में ही सालाना निरीक्षण किया. जबकि हर स्कूल का सालाना निरीक्षण ज़रुरी है.

सिर्फ 15 स्कूलों ने 2008-09 में अपने खातों की जानकारी शिक्षा विभाग को सौंपी. जबकि 2007-08 में 20 और 2006-07 में 17 स्कूलों ने अपने खातों की जानकारी दी. शिक्षा विभाग ने इन पर कोई टिप्पणी नहीं की और ना ही स्कूलों को कोई सुझाव दिया गया.

वसंत वैली स्कूल और एएसएन स्कूल ने तो 2008-09 में घाटे में होते हुए भी बीएमडब्लयू और होंडा अकोर्ड जैसी महंगी कारें खरीदीं.

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