मार्क को न्याय का इंतज़ार

Image caption मार्क उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए भारत आए थे

कोई पंद्रह साल पहले अफ्रीका में युगांडा से ऊँची तालीम का सपना लेकर भारत आए मार्क के साथ बहुत बुरा हुआ. वो एक फौजदारी मामले में ऐसा उलझा कि ज़िंदगी कोर्ट कचहरी और पुलिस के चक्कर काटने में ही गुज़र रही है.

उसे ज़मानत मिल गई, वो जेल से बाहर है मगर पराये देश में गुज़र-बसर कैसे करे. अब मार्क ने अदालत से दया याचना की है कि उसे जेल भेज दिया जाए ताकि उसे रोटी मिल सके.

जयपुर की सड़कों पर खाक छान रहे मार्क के लिए ज़िंदगी बहुत दुश्वार है. आपबीती सुनाते-सुनाते मार्क की आंखें सजल हो गईं, कहने लगा, "मैंने पंद्रह साल से अपनी सरज़मीन नहीं देखी, बहन-भाइयों को देखे अरसा हुआ, इस दौरान मेरी माँ इस दुनिया से चली गई, मुझे मेरे वतन जाने दिया जाए".

मार्क के वकील सुधीर के अनुसार पुलिस अब तक उसके खिलाफ़ कोई आरोप पत्र नहीं दाखिल कर सकी है.

मार्क के वकील कहते हैं, "ये बहुत ही वेदना भरी कहानी है, मार्क जयपुर में फुटपाथ पर सोता है, वो पैदल घूम घूम कर घड़ियाँ बेचता है, अब उसने अदालत से प्रार्थना की है कि उसे जेल भेज दिया जाए ताकि वो अपना पेट भर सके."

पुलिस की भ्रष्टाचार विरोधी शाखा ने कोई डेढ़ दशक पहले राजस्थान विश्वविद्यालय के कुछ कर्मचारियों के विरुद्ध उत्तर पुस्तिकाओं में हेराफेरी का मामला दर्ज किया था.

वापसी की उम्मीद

इसमें मार्क को सह-आरोपी बनाया गया था लेकिन इन कर्मचारियों के खिलाफ़ अभियोजन की स्वीकृति नहीं मिली. फिर पुलिस की एंटी-करप्शन शाखा ने इस मामले में अंतिम रिपोर्ट पेश कर दी, जिसके मुताबिक़ कोई अपराध नहीं बनता है.

मगर भारतीय दंड संहिता के तहत आरोप यथावत रहे . इस पर ही इंसाफ की सुई अटक गई. इसके साथ मार्क की ज़िंदगी वहीं ठहर गई.

मार्क को वर्ष 2007 में अदालत ने कुछ शर्तों के साथ विदेश जाने की अनुमति दे दी लेकिन मार्क के जीवन में अभी वतन की मिट्टी छूने का लम्हा नहीं लिखा था लिहाजा अधिकारियो के समय पर अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी न करने से मार्क अपने देश नहीं जा सके.

वकील सुधीर का कहना था ये अपने-आप में नस्ली भेदभाव है. यूरोपियंन नागरिक की तुरंत सुनवाई होती है मगर मार्क एक तीसरी दुनिया के देश का नागरिक है.

युगांडा से कोई देश दशक पहले मार्क ने जब भारत के लिए रुख किया तो उसकी आँखों में भविष्य के ढेर सारे ख्वाब थे अब तो उसे सिर्फ़ इस बात का आसरा है कि किसी तरह उसे न्याय मिले और वह अपने देश जा सके.