बीबीसी विशेष: वेदांता ने की सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना

बाल्को में निर्माण कार्य (फ़ाइल फ़ोटो)

बीबीसी के पास उपलब्ध दस्तावेज़ों से पता चलता है कि वेदांता रिसोर्सेस की सहयोगी संस्था स्टरलाइट इंडस्ट्रीज़ (इंडिया) लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए कई एकड़ वन भूमि पर पेड़ों की कटाई की है.

यह कटाई छत्तीसगढ़ के कोरबा में स्टरलाइट के नियंत्रण वाली भारत अल्यूमिनियम कंपनी (बाल्को) में हुई है.

वहाँ सिर्फ़ पेड़ों की कटाई ही नहीं हुई है बल्कि बाल्को क़ानून का उल्लंघन करते हुए एक नया स्मेल्टर प्लांट और एक बिजली घर भी बना रहा है. इसी निर्माणाधीन बिजली घर की चिमनी पिछले साल सितंबर में गिर गई थी जिसमें कम से कम 40 लोग मारे गए थे.

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी रही बाल्को में अब स्टरलाइट का हिस्सा 51 फ़ीसदी है. दस्तावेज़ बताते हैं कि बाल्को ने 1751 एकड़ की वन भूमि पर कब्ज़ा कर रखा है जिसका भू-स्वामित्व उसके पास नहीं है. इस भूमि पर बिना पूर्व अनुमति के बहुत सी ग़ैर-वन गतिविधियाँ भी चलाई जा रही हैं.

स्टरलाइट के अधिकारी इन आरोपों का खंडन करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने सिर्फ़ उसी भूमि पर पेड़ों की कटाई की है जो निजी भूमि है न कि सरकारी वन भूमि.

लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार के दस्तावेज़ बताते हैं कि बाल्को में सरकारी वन भूमि पर पेड़ों की कटाई हुई और बहुत सी ऐसी गतिविधियाँ हुईं जिससे वन को नुक़सान पहुँच सकता है. उदाहरण के तौर पर कोरबा के तहसीलदार ने 26 अक्तूबर 2010 को जारी पत्र में और कोरबा के वन मंडलाधिकारी ने दो जून 2008 को जारी पत्र में इसके विवरण दिए हैं.

वेदांता रिसोर्सेस का नाम हाल ही में उड़ीसा के नियामगिरी को लेकर चर्चा में आया था. वहाँ पर्यावरण को होने वाले नुक़सान को लेकर सरकार ने बॉक्साइट के खनन की अनुमति वापस ले ली थी.

सुप्रीम कोर्ट की अनदेखी

Image caption बाल्को : तीन मार्च, 2008 को सुप्रीम कोर्ट की रोक के तुरंत बाद का सैटेलाइट चित्र
Image caption बाल्को: दो जून, 2010 को लिया गया चित्र जिसमें वन/वनस्तपतियों की कमी स्पष्ट दिख रही है

बाल्को में वेदांता की ओर से सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की जाँच ख़ुद सुप्रीम कोर्ट भी करवा रहा है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की वन मामलों की समिति, सेंट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी (सीईसी) की एक रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 29 फ़रवरी, 2008 को बाल्को के कब्ज़े वाली भूमि पर किसी भी तरह से पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी थी.

लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि बाल्को ने सु्प्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए उस भूमि पर भी पेड़ों की कटाई की जो सरकारी रिकॉर्ड में वन भूमि है और वहाँ भी पेड़ों की कटाई की जिसे उसने निजी भू-स्वामियों से हासिल किया था.

इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट में दो जनहित याचिकाएँ दायर की गई थीं. एक कोरबा के स्वयंसेवी संगठन सार्थक की ओर से और दूसरा छत्तीसगढ़ के कांग्रेस पार्टी के नेता भूपेश बघेल की ओर से.

इस जनहित याचिका के अलावा याचिकाकर्ता भूपेश बघेल ने सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का भी एक मामला दायर किया है. इस याचिका में उन्होंने बाल्को के अधिकारियों को अवमानना के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है जिसमें वेदांता के प्रमुख अनिल अग्रवाल शामिल हैं.

जब बीबीसी हिंदी ने भूपेश बघेल से संपर्क किया तो उन्होंने कहा, "मैंने सीईसी के समक्ष पर्याप्त सबूत पेश कर दिए हैं जिससे यह ज़ाहिर होता है कि बाल्को में सुप्रीम कोर्ट के रोक की अनदेखी की गई. यह स्पष्ट तौर पर सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना का मामला है."

उन्होंने कहा, "अब यह सीईसी पर है कि वह सबूतों की जाँच करे."

जबकि सार्थक के संचालक लक्ष्मी चौहान ने बीबीसी हिंदी से कहा, "यह बड़ा मामला है और सीईसी को ख़ुद बाल्को आकर देखना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना हुई है."

खंडन और सबूत

Image caption बाल्को में संयंत्र के विस्तार के लिए निर्माण कार्य तेज़ी से चल रहा है

स्टरलाइट या वेदांता के अधिकारियों ने बीबीसी हिंदी के सवालों का कोई जवाब नहीं दिया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में और सीईसी में प्रस्तुत दस्तावेज़ों में उसने इन आरोपों का खंडन किया है.

वेदांता के अधिकारियों का कहना है कि पेडों की कटाई ज़िला अधिकारियों की अनुमति से और निजी भूमि पर ही हुई है और सुप्रीम कोर्ट ने निजी भूमि पर पेड़ों की कटाई पर कोई रोक नहीं लगाई थी.

उनका कहना है कि वन भूमि पर कोई कटाई नहीं हुई है.

लेकिन बीबीसी हिंदी के पास वो दस्तावेज़ उपलब्ध हैं जो इस दावे को ग़लत साबित करते हैं.

हैदराबाद स्थित एक निजी एजेंसी ने रिमोट सेंसिंग टेक्नालॉजी की मदद से बाल्को संयंत्र के क्षेत्र का आकलन किया है.

इसके लिए एजेंसी ने बाल्को संयंत्र क्षेत्र के 14 दिसंबर, 2006 के सैटेलाइट चित्र और इंडियन रिसर्च ऑर्गेनाइज़ेशन (इसरो) के तीन मार्च, 2008 और दो जून, 2010 के सैटेलाइट चित्रों की तुलना की है.

दोनों चित्रों की तुलना करने पर पता चलता है कि बाल्को संयंत्र क्षेत्र में इस दौरान पेड़ों की संख्या में बहुत कमी आई है.

इस एजेंसी ने सैटेलाइट से मिले आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद अपनी रिपोर्ट में लिखा है, "29 फ़रवरी 2008 और दो जून, 2010 के बीच वन/वनस्पतियों को नुक़सान पहुँचा है. यह नुक़सान 35.79 हेक्टेयर या लगभग 90 एकड़ के क्षेत्र में हुआ है."

एजेंसी अपनी रिपोर्ट में कहती है, "वन/वनस्पतियों को नुक़सान बाल्को संयंत्र परिसर के उत्तरी इलाक़े में हुआ है जो मुख्य रुप से 'दो पेड़ों'के प्रतीकों से दर्शाया गया है. "

'दो पेड़ों' का प्रतीक सरकार के राजस्व रिकॉर्डों में बड़े झाड़ के जंगल के लिए उपयोग में लाया जाता है.

याचिकाकर्ताओं के अनुसार ये सारे सबूत अब सुप्रीम कोर्ट के वन मामलों की समिति सीईसी के पास है जिसने अवमानना के मामले में सुनवाई पूरी कर ली है और अब वह अंतिम रिपोर्ट तैयार कर रही है.

वन भूमि पर कब्ज़ा और कटाई

पहले बाल्को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हुआ करती थी. वर्ष 2001 में भारत सरकार ने बाल्को का विनिवेश करने का फ़ैसला किया था. वेदांता की भारतीय सहयोगी कंपनी स्टरलाइट ने 551 करोड़ रुपए में बाल्को के 51 फ़ीसदी शेयर ख़रीद लिए थे.

इस सौदे के ज़रिए स्टरलाइट को बाल्को में एक लाख टन के एक स्मेल्टर प्लांट, एक अल्यूमिनियम रोलिंग प्लांट, 270 मेगावॉट के एक कैप्टिव पॉवर प्लांट और 2,780 एकड़ भूमि पर कब्ज़ा मिल गया था.

Image caption सरकारी अधिकारी कहते हैं कि जहाँ निर्माणाधीन चिमनी गिरी वह सरकारी ज़मीन है और वहाँ जंगल दर्ज है

ऐसा प्रतीत होता है कि बाल्को ने इस सौदे के समय भूमि के स्वामित्व की ठीक तरह से जाँच नहीं की क्योंकि जो भूमि उसे कब्ज़े में मिली उसमें निजी और वन भूमि भी थी.

लेकिन जब भू-स्वामित्व का विवाद सामने आया तो छत्तीसगढ़ सरकार ने इसकी जाँच के लिए एक समिति का गठन किया. वर्ष 2005 में अपनी रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ सरकार की समिति ने कहा था कि कुल 1,751 एकड़ भूमि राजस्व वनभूमि है और बाल्को को पास इसके उपयोग की कोई अनुमति नहीं है.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में दोनों जनहित याचिकाएँ दायर की गईं जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीईसी से इस मामले की जाँच करने को कहा.

सीईसी ने 17 अक्तूबर को अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया कि बाल्को के पास भू-स्वामित्व नहीं है लेकिन उसे इस मामले में 'पोस्ट फ़ैक्टो क्लियरेंस' यानी आधिपत्य के आधार पर उपयोग की अनुमति दी जा सकती है. लेकिन बाल्को ने सीईसी की रिपोर्ट को स्वीकार करने की जगह इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फ़ैसला किया.

इस चुनौती याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 29, फ़रवरी, 2008 में बाल्को में पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगा दिया.

इस समय बाल्को में संयंत्र के विस्तार का कार्य चल रहा है. वहाँ एक नया स्मेल्टर प्लांट और एक नए बिजली घर की स्थापना की जा रही है.

दस्तावेज़ बताते हैं कि इस विस्तार कार्य के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की है जिसमें वन भूमि के पेड़ भी शामिल हैं.

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