बिनायक सेन देशद्रोह के दोषी

बिनायक सेन
Image caption बिनायक सेन उस क़ानून के मुखर विरोधी रहे हैं जिसके तहत उन पर मुक़दमा चलाया गया

छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता बिनायक सेन को देशद्रोह का दोषी पाया है.

अदालत ने उन्हें नक्सलियों के साथ साँठगाँठ और उनकी सहायता के आरोप में राजद्रोह और विद्रोह का दोषी पाया है.

उनके साथ नक्सल समर्थक नारायण सान्याल और कोलकाता के व्यवसायी पीयूष गुहा को भी विद्रोह का दोषी पाया गया है.

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में थोड़ी देर बाद उन्हें सज़ा सुनाई जाएगी. अदालत के आदेश पर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया है.

डॉ. बिनायक सेन को मई, 2007 में बिलासपुर से गिरफ़्तार किया गया था. वे दो वर्षों तक जेल में रहे और आख़िर मई, 2009 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उन्हें ज़मानत मिल सकी थी.

बिनायक शुरु से राज्य सरकार के आरोपों का खंडन करते रहे हैं और कहते रहे हैं कि वो नक्सलियों का साथ नहीं देते लेकिन वो साथ ही राज्य सरकार की ज्यादतियों का भी विरोध करते रहे हैं.

भारत के लगभग सभी मानवाधिकार संगठनों और दुनिया के कई नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने उनकी गिरफ़्तारी का विरोध किया था.

सलवा जुड़ुम का विरोध

उन पर राज्य पुलिस ने जनसुरक्षा अधिनियम के तहत मुक़दमा चलाया गया. उन्होंने प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार के इसी जनसुरक्षा अधिनियम का सख़्त विरोध किया था और कहा था कि इसका सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के ख़िलाफ़ ग़लत इस्तेमाल हो सकता है.

Image caption बिनायक सेन की रिहाई के लिए दुनिया भर से आवाज़ें उठी थीं

डॉ बिनायक सेन मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ शाखा के पदाधिकारी रहे हैं.

इस संस्था के साथ काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ में भूख से मौत और कुपोषण जैसे मुद्दों को उठाया और कई ग़ैर सरकारी जाँच दलों के सदस्य रहे.

उन्होंने अक्सर सरकार के लिए असुविधाजनक सवाल खड़े किए और नक्सली आंदोलन के ख़िलाफ़ चल रहे सलमा जुड़ुम की विसंगतियों पर भी गंभीर सवाल उठाए.

सलवा जुड़ुम के चलते आदिवासियों को हो रही कथित परेशानियों को स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया तक पहुँचाने में भी उनकी अहम भूमिका रही.

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाक़े बस्तर में नक्सलवाद के ख़िलाफ़ चल रहे सलवा जुड़ुम को सरकार स्वस्फ़ूर्त जनांदोलन कहती रही है जबकि इसके विरोधी इसे सरकारी सहायता से चल रहा कार्यक्रम कहते हैं. सलवा जुड़ुम आंदोलन की मानवाधिकार संगठनों ने निंदा की और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सवाल उठाए और आख़िर में छत्तीसगढ़ सरकार को इसे बंद करना पड़ा है.

पेशे से चिकित्सक डॉ बिनायक सेन ने समाजसेवा की शुरुआत सुपरिचित श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी के साथ की और श्रमिकों के लिए बनाए गए शहीद अस्पताल में अपनी सेवाएँ देने लगे.

इसके बाद वे छत्तीसगढ़ के विभिन्न ज़िलों में लोगों के लिए सस्ती चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के उपाय तलाश करने के लिए काम करते रहे.

स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके योगदान को उनके कॉलेज क्रिस्चन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर ने भी सराहा और पॉल हैरिसन अवॉर्ड दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य और मानवाधिकार के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए जोनाथन मैन सम्मान दिया गया.

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